2.8.09
शिक्षा के अधिकार विधेयक में खामियों की भरमार
नई दिल्ली. राज्यसभा में पास हो चुके मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार विधेयक को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। प्रस्तावित कानून में खास सरकारी स्कूलों जैसे केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों को पूरी तरह शिक्षा के अधिकार के दायरे में नहीं रखा गया है।
इन स्कूलों में सिर्फ 25 फीसदी सीटों पर शिक्षा के अधिकार के तहत समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी। मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिलाने पर आने वाले खर्च और जवाबदेही को लेकर प्रस्तावित कानून में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई हैं। इसे लेकर प्रस्तावित कानून की आलोचना हो रही है।
शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल प्रस्तावित कानून को शिक्षा का अधिकार छीनने वाला कानून करार देते हुए कहते हैं कि इसके जरिए स्कूलों की विभिन्न श्रेणियों को वैधानिक मान्यता दी जा रही है। कानून में स्कूलों की चार श्रेणियां बनाई गई हैं। केंद्रीय विद्यालय, सैनिक स्कूल और नवोदय विद्यालयों को विशेष श्रेणी के स्कूलों का दर्जा दिया गया है।
इन स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों की तरह सिर्फ 25 फीसदी सीटें शिक्षा के अधिकार के तहत उपलब्ध होंगी। ऐसे प्रावधान कर बहु-परती व भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को बरकरार रखा जा रहा है। सद्गोपाल के मुताबिक, राज्यसभा में पास हुए विधेयक में और भी कई आपत्तिजनक प्रावधान हैं, जिनमें छह साल से कम उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा के अधिकार के दायरे से बाहर करना प्रमुख है।
इसके अलावा मुफ्त शिक्षा क्या होगी यह भी सरकार तय करेगी जबकि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। सद्गोपाल के मुताबिक, देश में 6 से 14 साल की उम्र के करीब 20 करोड़ बच्चे हैं, जिनमें से 4 करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनमें से सिर्फ 25 फीसदी यानी 4 करोड़ में से सिर्फ एक करोड़ बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार मिल पाएगा।
शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा के अधिकार के लिए कानून बनना अच्छा कदम है, लेकिन प्रस्तावित कानून के कई प्रावधान संविधान में दिए गए समानता, सामाजिक न्याय और शिक्षा के अधिकार के खिलाफ हैं। अच्छे सरकारी स्कूलों और सामान्य स्कूलों को अलग-अलग श्रेणी में रखकर सरकार खुद शिक्षा के आधार पर भेदभाव को बढ़ाने का काम कर रही है।
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