24.5.09
दिल्ली से ब्लूलाइन की विदाई शीघ्र
राजधानी दिल्ली में ब्लूलाइन बसों को अलविदा कहने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। दिल्ली सरकार ने बस मार्गे को समूह में बांटकर प्राइवेट ऑपरेटर को ठेके पर देने की शुरूआत कर दी है। प्रयोग के तौर पर 30 मार्गे पर बसों के संचालन का जिम्मा स्थानीय कंपनी स्टारलाइन बस सर्विस को दिया है। इस करार पर आगामी 26 मई को सरकार और कंपनी के बीच करार होने जा रहा है।
परिवहन विभाग के अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, सभी 657 बस मार्गे को 17 अलग-अलग इलाकों में बांटकर बसों के संचालन प्राइवेट कंपनियों को दिया जा रहा है। योजना के तहत सबसे पहले दक्षिण व मध्य दिल्ली के 32 रूट को प्राइवेट ऑपरेटर को दिया जाना है। इसके लिए कुल 7 कंपनियों ने टेंडर भरे थे जिनमे से स्टारलाइन का चयन हुआ है। कंपनी को ऑफर लेटर दिया जा चुका है। इन 32 रूटों पर बसें चलाने के लिए आगामी 26 मई को कंपनी और सरकार के बीच औपचारिक करार होना है।
करार के तहत स्टारलाइन को 5 करोड़ रुपये बतौर गारंटी मनी जमा करने होंगे। स्टारलाइन बस सर्विस फिलहाल दिल्ली में ब्लूलाइन बसें चलाने के अलावा टूरिस्ट कैरेज सर्विस भी देती है। कंपनी अंबेडकर नगर, मूलचंद, लाजपत नगर, निजामुद्दीन, ओखला, मोरी गेट, लाल किला, कमला मार्केट, आनंद पर्वत, आनंद विहार, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, जेएलएन स्टेडियम, वसंत कुंज, मिंटो रोड, धौलाकुंआ और बदरपुर बॉर्डर के इलाकों से गुजरने वाले मार्गो पर बस चलाएगी। इसके लिए कंपनी को 300 से ज्यादा बसों की जरूरत होगी।
मुनाफे पर नजर रख नई रणनीति बनाने में जुटे डेवलपर्स
बदले आर्थिक माहौल में रियल एस्टेट कंपनियां अपने प्रोजेक्ट को लेकर नए सिरे से रणनीति तय करने में जुट गई हैं। व्यावसायिक इस्तेमाल वाली इमारतों की मांग में कमी, अपेक्षाकृत सस्ते मकानों की मांग और फंड की किल्लत के चलते रियल एस्टेट कंपनियों को अपनी रणनीति में बदलाव करने पड़ रहे हैं। इसके चलते डेवलपर्स की ओर से लैंडयूज (भू-उपयोग) में बदलाव की कोशिशों में भी तेजी दिखी है।
जमीन के प्रस्तावित इस्तेमाल को बदलने के सिलसिले में सेज परियोजनाएं मुख्य हैं। देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ लिमिटेड आईटी और बीपीओ कंपनियों के दफ्तर की मांग में कमी को वजह बताते हुए चार आईटी सेज की मंजूरी वापस लेने की मांग कर चुकी है। उधर, नई दिल्ली में डीएलएफ के आईटी सेज की जगह भी हाउसिंग प्रोजेक्ट आ सकता है।
नोएडा में 5000 करोड़ रुपये में भूखंड खरीद कर धूम मचाने वाले बीपीटीपी डेवलपर्स ने भी माहौल को देखते हुए प्लॉट का बड़ा हिस्सा वापस करने का फैसला किया है। बाकी बचे छोटे हिस्से पर अब होटल बनाने की योजना है।
नोएडा अथॉरिटी ने भी बदले माहौल में डेवलपर्स को लैंडयूज बदलने और सौदा वापस करने के मामलों में कई तरह की छूट दी है। लैंडयूज और योजनाओं में बदलाव के अलावा फंड जुटाने के लिए भी डेवलपर्स की कोशिशें लैंड बैंक पर आ टिकी हैं। डीएलएफ नॉन-स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट और जमीन से बाहर होने की घोषणा कर चुकी है।
देश भर में बड़े पैमाने पर होटल प्रोजेक्ट डेवलपर्स की बदली रणनीति से प्रभावित हुए हैं। अगले सात वर्षे में देश भर में करीब 100 होटल खोलने जा रही पाश्र्वनाथ डेवलपर्स ने इन प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण का काम रोक दिया है।
रिटेल प्रॉपर्टी के बजाय सस्ते मकानों की बढ़ती मांग की वजह से भी कई डेवलपर्स लैंडयूज में बदलाव करने में जुट गए हैं। मेरठ के प्रमुख गाडविन ग्रुप के एमडी जितेंद्र सिंह बाजवा का कहना है कि हाल ही में कई मॉल्स की बुरी दशा देखकर उन्होंने मॉल बनाने का इरादा छोड़कर मध्य वर्ग के लिए मकान बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने वाली दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल कमेटी से मिली जानकारी के मुताबिक डीएलएफ समेत कई नामी डेवलपर्स ने कमर्शियल अथवा रेजीडेंशियल प्रोजेक्ट के लिए मंजूरी मांगी है।
12.5.09
केंद्र-राज्यों की रस्साकशी में फंसी बसों की खरीद
केंद्र सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश के 54 शहरों में 14 हजार नई बसें चलाने में देरी हो रही है। केंद्र सरकार के जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) कार्यक्रम के तहत होने वाली बसों की इस खरीद को राज्य सरकारों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार की ओर से पहली किस्त जारी हो जाने के बाद भी ज्यादातर राज्यों ने बसों की खरीद के ऑर्डर नहीं दिए हैं। जिन चार राज्यों ने ऑर्डर दिए हैं वहां की सरकारों ने बस निर्माताओं को अग्रिम भुगतान नहीं किया है।
केंद्रीय शहरी विकास सचिव एम. रामाचंद्रन ने राज्य के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा है कि दूसरे राहत पैकेज में घोषित 14,240 बसों की खरीद की योजना सिर्फ 30 जून 2009 तक खुली है। इसके लिए खरीद के ऑर्डर 31 मार्च 2009 तक दिए जाने थे। उधर, बस निर्माता कंपनियों के संगठन सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (सियाम) का कहना है कि बंगलुरू जैसे एक-दो शहरों को छोड़कर 20 मार्च तक किसी भी शहर के लिए बसों का ऑर्डर नहीं मिला था।
ऐसी स्थिति में बस निर्माताओं के लिए 30 जून 2009 तक 14,000 बसों की आपूर्ति कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय मेंविशेष कार्याधिकारी (एमआरटीएस) एस.के. लोहिया की ओर से राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में साफ कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से बसों की खरीद के लिए फंड की पहली किस्त जारी हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकारों के हिस्से का पैसा जारी नहीं किया जा रहा है। बस निर्माता कंपनियों को किसी भी ऑर्डर में अग्रिम राशि का भुगतान नहीं हुआ है। गौरतलब है कि दूसरे राहत पैकेज के तहत इन 14,240 बसों की खरीद के लिए तकरीबन 5000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज दिए गया था।
केंद्र सरकार के दबाव के बावजूद अभी तक सिर्फ चार राज्यों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल ने बसों की खरीद के ऑर्डर दिए हैं। वहीं, दूसरी ओर दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात ने अभी तक बसों के ऑर्डर नहीं दिए हैं। कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में जेएनएनयूआरएम को अपनी अहम उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। हालांकि, जेएनएनयूआरएम के तहत केंद्र सरकार सिर्फ 50 फीसदी पैसा ही खर्च करती है। बाकी पैसा राज्य सरकारों और स्थानीय निकाय को खर्च करना पड़ता है।
कई राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय कांग्रेस के फ्लैगशिप यानी मुख्य कार्यक्रम में आधा या आधे से ज्यादा पैसा देने से हिचकचा रहे हैं। जिस आक्रामक रुख के साथ कांग्रेस ने भारत निर्माण कार्यक्रम का प्रचार किया है उस वजह से भी कई राज्यों से समर्थन मिलने की गुंजाइश कम हो गई है। इसके अलावा कई स्थानीय निकायों की आर्थिक स्थिति भी आड़े आ रही है।
4.5.09
प्रोमेट्रिक को 200 करोड़ रुपये में ऑनलाइन कैट का ठेका
भारतीय कंपनियों को पछाड़ते हुए अमेरिकी कंपनी प्रोमेट्रिक ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) की प्रवेश परीक्षा को ऑनलाइन कराने का ठेका हासिल कर लिया है। कम्बाइंड एडमिशन टेस्ट (कैट) को 33 साल बाद बगैर पैन और पेपर के आयोजित कराने के लिए इस कंपनी को करीब 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा। इस ठेके के मिलने की पुष्टि होने के साथ ही प्रोमेट्रिक ने अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियोंको बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी है।
आईआईएम बेंगलुरू की ओर से कैट के लिए प्रोमेट्रिक के चयन की घोषणा कर दी गई है। इस ठेकेके लिए कितनी धनराशि दी गई इसका खुलासा नहीं किया गया है। कैट ग्रुप के सदस्य और आईआईएम लखनऊ की प्रवेश परीक्षा समिति के चेयरमैन हिमांशु राय ने बिजनेस भास्कर को बताया कि इस बारे में अगले एक दो दिन में आधिकारिक तौर पर जानकारी दी जाएगी।
राय ने माना कि प्रोमेट्रिक को ठेका मिलना लगभग तय है। उधर, प्रोमेट्रिककी ओर से बिजनेस भास्कर को भेजे गए ई-मेल में 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 200 करोड़ रुपये में आईआईएम की ओर से कैट को कम्प्यूटराइज्ड करने का ठेका मिलने का दावा किया गया है।
प्रोमेट्रिक एजुकेशन टेस्ट कराने के मामले में दुनिया की जानी-मानी कंपनी एजुकेशन टेस्ट सर्विस (ईटीएस) की सहायक कंपनी है, जो विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए जरूरी टोफेल व जीआरई जैसे टेस्ट कराती है। ईटीएस भारत में पहले से ही कई शहरों में टेस्ट सेंटर चला रही है। इसके लिए इसने एनआईआईटी से तालमेल कर रखा है।
कैट को ऑनलाइन कराने के लिए कुल 30 कंपनियों ने दावेदारी पेश की थी। अंतिम दौर में चुनी गई 4 कंपनियों में प्रोमेट्रिक के अलावा ब्रिटेन की एक और 2 भारतीय कंपनियां शामिल थी। ब्रिटेन की पियरसन वीयूई और प्रोमेट्रिक के बीच कड़ा मुकाबला था। पियरसन भी जी-मैट नाम की अंतरराष्ट्रीय परीक्षा आयोजित कराती है। बिट्स पिलानी का ऑनलाइन टेस्ट कराने वाली बेंगलुरू की एडुक्यूटी करियर टेक्नोलॉजी और एप्टेक की टेस्टिंग डिवीजन एटटेस्ट की दावेदारी इन दिग्गज कंपनियों के सामने नहीं टिक पाई।
उधर, आईआईएम ने ऑनलाइन परीक्षा के लिए एडमिशन टेस्ट फीस में करीब 50 फीसदी तक बढ़ोतरी के संकेत दिए हैं। फिलहाल सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कैट की फीस 1,300 रुपये है। पिछले साल आईआईएम को सिर्फ प्रोस्पेक्टस की बिक्री से ही करीब 22 करोड़ रुपये की आमदनी हुई थी।
बटर ऑयल के आयात से डेयरी उद्योग के सामने नई मुश्किलें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बटर ऑयल की कीमतों में गिरावट के चलते भारतीय डेयरी उद्योग व दुग्ध उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से बटर ऑयल के आयात का फैसला किया गया है। भारतीय बाजार में जहां घी की कीमतें 180 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास हैं, वहीं विदेश से आयात होने वाले सस्ते बटर ऑयल से बना घी 120-130 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव बेचा जा सकता है। हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय ने दो कंपनियों को 4,000 टन बटर ऑयल के आयात का लाइसेंस दिया है। वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक नोवा ब्रांड घी बेचने वाली स्र्ट्िलग एग्रो इंडस्ट्रीज और करन ब्रांड घी की मालिक करनाल मिल्क फूड्स को 4,000 टन बटर ऑयल के आयात का लाइसेंस मिला है। इसके लिए कृषि मंत्रालय के डेयरी एवं पशुपालन विभाग की सहमति भी मिल गई है।
फिलहाल ग्लोबल बाजार में बटर ऑयल का भाव 1500 से 1600 डॉलर प्रति टन यानी 75-80 रुपये प्रति किलो है। इस पर 35.2 फीसदी आयात शुल्क चुकाने के बाद भी आयातित बटर ऑयल से घी बनाकर उसे 120-130 रुपये प्रति किलो के भाव बेचा जा सकता है। यही भारतीय डेयरी उद्योग के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। घरेलू बाजार में घी की कीमत फिलहाल 180 रुपये प्रति किलोग्राम है। ऐसे में घरेलू दुग्ध उत्पादक कीमतों के मामले में विदेश से आए बटर ऑयल का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। यही स्थिति एसएमपी के मामले में भी है।
एसएमपी (स्किम्ड मिल्क पाउडर) का घरेलू बाजार में भाव करीब 90 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका भाव 1600 डॉलर प्रति टन (करीब 80 रुपये प्रति किलो) है। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) को 10,000 टन तक एसएमपी के शुल्क मुक्त आयात की मंजूरी मिली है। एनडीडीबी अगर एसएमपी का आयात करने का फैसला करता है तो भी घरेलू उद्योग को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। यूरोपीय संघ की ओर से बटर ऑयल का आधिकारिक न्यूनतम मूल्य 2200-2300 डॉलर प्रति टन तय किया गया है, लेकिन निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए वहां जनवरी से सब्सिडी दी जाने लगी है।
डेयरी उद्योग के सामने नई मुश्किलें
इसके चलते यूरोपीय निर्यातक 1500-1600 डॉलर प्रति टन के भाव पर बटर ऑयल का निर्यात करने में सक्षम हैं। यूरोपीय संघ की ओर से एसएमपी पर अधिकतम 265 डॉलर प्रति टन और बटर ऑयल पर 750 डॉलर प्रति टन की सब्सिडी दी जा रही है। इसके विपरीत भारत सरकार ने पिछले साल अप्रैल में 10 हजार टन तक एसएमपी पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 15 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी और बटर ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 40 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दिया था।
ग्लोबल बाजार में पिछले दो वर्षे के दौरान बटर ऑयल और एसएमपी की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। वर्ष 2007-08 के सितंबर माह में बटर ऑयल के मूल्य 5000-6000 डॉलर प्रति टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे, जो अब गिरकर 1500-1600 डॉलर प्रति टन के स्तर पर आ गए हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से भी 1650-1700 डॉलर प्रति टन की दर से बटर ऑयल का निर्यात किया जा रहा है। मालूम हो कि यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड विश्व के कुल डेयरी निर्यात में तकरीबन 80 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं।
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