2.8.10
अमूल पर भाजपा का वर्चस्व
एशिया और प्रशांत क्षेत्र की सबसे बड़ी डेयरी अमूल में वर्चस्व की जंग चार साल बाद ठीक उसी मोड़ पर आ पहुंची जहां से इसके संस्थापक और तीन दशक तक सर्वेसर्वा रहे डॉ. वर्गीज कुरियन की विदाई हुई थी। इस बार भी अमूल के ब्रांड नाम से दूध-उत्पादों की मार्केटिंग करने वाली संस्था गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) के अध्यक्ष पार्थी भाई भाटोल पर इस्तीफे का दबाव था लेकिन एक दिन के भीतर पलटी बाजी में अमूल की सत्ता पर भाजपा ने अपना दबदबा साबित कर दिया। भाजपा नेताओं की मदद से पार्थी भाटोल अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे और प्रबंध निदेशक बीएम व्यास को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। प्रबंध निदेशक और चेयरमैन के बीच चली रस्साकशी में अमूल ब्रांड ख्याति के इस सहकारी संघ में राजनीतिकरण का नया अध्याय शुरू हो गया है। अमूल नाम के जिस सहकारी आंदोलन की बुनियाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और मोरारजी देसाई ने रखी और डॉ. वर्गीज कुरियन ने जिसे आकार दिया,उसमेंं सत्ता की चाबी अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में जा पहुंची है।
अमूल में हालिया रस्साकशी की शुरुआत तब हुई जब इसके 13 बोर्ड सदस्यों, जो गुजरात की 13 जिला डेयरी यूनियनों के अध्यक्ष भी हैं, ने फेडरेशन चेयरमैन पार्थी भाई भाटोल पर पद छोडऩे का दबाब बनाना शुरू किया। डॉ. कुरियन को भी ठीक ऐसे ही हालात में फेडरेशन का अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ा था और बनास डेयरी यूनियन के अध्यक्ष भाटोल चेयरमैन बने थे। भाटोल के इस्तीफे की शर्त रखते हुए ज्यादातर सदस्यों ने 8 मई और 25 मई को हुई बोर्ड बैठकों का बहिष्कार तक किया। इस बीच अमूल के खातों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से ऑडिटर की नियुक्ति का विरोध करते हुए फेडरेशन के प्रबंधन निदेशक बी.एम. व्यास ने इस्तीफा दे दिया। हांलाकि ब्यास का कार्यकाल 30 नवंबर को पूरा होने वाला था लेकिन समय से पहले दिए इस इस्तीफे ने भाटोल की मुश्किलें और बढ़ा दीं। व्यास के इस्तीफे के फैसलों को साजिश करार देते हुए भाटोल ने इसे उनके तख्तापटल की कोशिश करार दिया। भाटोल ने आरोप लगाया कि व्यास का इस्तीफा उस साजिश का हिस्सा है जिसके तहत वह गुजरात के पूर्व गृहमंत्री विपुल चौधरी को फेडरेशन अध्यक्ष बनवाकर बदले में अपने कार्यकाल का विस्तार करना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि विपुल चौधरी भाजपा के केशुभाई पटेल के मंत्रिमंडल में रहे और फिर शंकर सिंह वाघेला के साथ भाजपाई बागियों में भी शामिल थे। विपुल चौधरी फिलहाल फेडरेशन के तहत आने वाली प्रमुख डेयरी दुग्धासागर डेयरी यूनियन के अध्यक्ष हैं और अमूल की राजनीति के प्रमुख किरदार हैं।
इससे पहले कि भाटोल पर पद छोडऩे का दबाव बढ़ता उन्होंने बड़ा दांव खेला। भाटोल ने व्यास के इस्तीफे को फेडरेशन बोर्ड से स्वीकृति हासिल किए बगैर ही खुद मंजूर कर उन्हें कार्यमुक्त कर दिया। इस तरह आपत्ति जताते हुए कांग्रेस विधायक और खेडा जिला डेयरी यूनियन के अध्यक्ष राम सिंह परमार समेत कई सदस्यों ने इस मुद्दे पर बोर्ड की बैठक बुलाने की मांग की। भाटोल 30 जून को बोर्ड बैठक बुलाने को तैयार भी हुए लेकिन इससे पहले ही उन्होंने तमाम आरोप लगाते हुए ब्यास के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस बैठक में व्यास के इस्तीफे के साथ-साथ भाटोल की किस्मत का फैसला भी होना था। लेकिन इस बीच सभी 13 जिला डेयरी यूनियनों के अध्यक्षों को पत्र लिखकर भाटोल ने ब्यास की कारगुजारियों का कच्चा-चि_ïा खोल माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश की। इस पत्र में भाटोल ने व्यास पर आरोप लगाया कि वर्ष 2006 में डॉ वर्गीज कुरियन को जीसीएमएमएफ के अध्यक्ष पद से हटाने की साजिश व्यास ने ही बोर्ड के सदस्यों के साथ मिलकर रची थी। बोर्ड के कुछ सदस्यों को लामबंद कर इसी तरह का तख्तापलट व्यास भाटोल के खिलाफ भी करना चाहते थे। इसके अलावा उन्होंने व्यास पर कई वित्तीय गड़बडिय़ों और भ्रष्टïाचार के आरोप भी लगाए।
इससे पहले कि 30 जून को जीसीएमएमएफ बोर्ड की बैठक में व्यास और भाटोल की किस्मत का फैसला होता, राजनीतिज्ञों की शह पर पूरी बाजी ही पलट गई। अभी तक बोर्ड सदस्यों का जो बहुमत भाटोल के खिलाफ दिख रहा था, वही उनके समर्थन में आ गया। इस बैठक से एक दिन पहले ही 13 में से 8 सदस्यों ने इस बैठक को गैर जरूरी करार देते हुए भाटोल को बड़ी राहत दे दी। इसके बाद 30 जून की बैठक नहीं हुई। इस बीच भाटोल ने व्यास की जगह आर एस सोढ़ी को कार्यकारी प्रबंध निदेशक नियुक्त कर दिया है।
माना जा रहा है कि इस भंवर में फंसने के बाद भाटोल ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की शरण ली। उधर, भाटोल विरोधी खेमे और व्यास को प्रमुख समर्थन खेडा जिला डेयरी यूनियन के अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक रामजी परमार और विपुल चौधरी से मिल रहा था। सवाल यह है, जो अधिकांश बोर्ड सदस्य एक महीना पहले तक भाटोल पर पद छोडऩे का दबाव बना रहे थे अचानक इनके समर्थन में कैसे मुड़े? यहीं राजनीति में गुंथ चुकी सहकारिता की तस्वीर देखने को मिलती है। भाटोल के बेटे भाजपा विधायक हैं और जानकारों का मानना है कि भाटोल भाजपा की मदद से अपने 4 पुराने समर्थक सदस्यों के अलावा 4 दूसरे सदस्यों का समर्थन जुटाने में कामयाब रहे। जानकारों का मानना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भाटोल की बैठक के बाद भाजपा के प्रभाव वाले सदस्य भाटोल के पक्ष में झुकने शुरू हुए। जीसीएमएमएफ बोर्ड सदस्यों को भाटोल के पक्ष में करने में गुजरात के सहकारी मंत्री दिलीप सांगवानी ने भी अहम भूमिका निभाई। इस घटनाक्रम को जीसीएमएमएफ पर भाजपा के वर्चस्व के तौर पर देखा जा रहा है भाटोल को जिन 4 बोर्ड सदस्यों से निर्णायक मदद मिली वे हैं- सूरत डेयरी के मनु भाई पटेल, साबरकांठा डेयरी के जेठा भाई पटेल गांधीनगर डेयरी के शंकर सिंह राणा और सुरेंद्र नगर डेयरी के बाबा भाई पंवार। अमूल से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने अपनी पार्टी से जुड़े बोर्ड सदस्यों को भाटोल के खिलाफ न जाने का निर्देश दिया और भाटोल को राहत मिली। इसके अलावा भाटोल ने अपने स्तर पर भी सदस्यों का समर्थन जुटाने का इंतजाम किया।
उल्लेखनीय है कि पिछले साल ही भाटोल अपने दूसरे कार्यकाल के लिए तीन साल के लिए फिर से निर्विरोध चुने गए थे। वर्ष 2006 में डा. वर्गीज कुरियन को बोर्ड सदस्यों के एकजुट विरोध के बाद पद छोडऩा पड़ा था और भाटोल चेयरमैन चुने गए थे। उस वक्त उन्हें भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों का समर्थन हासिल था। पिछले साल उपचुनाव में भाटोल के बेटे के भाजपा विधायक बनने के बाद से भाटोल पर भाजपा समर्थक होने के आरोप लगने शुरू हुए।
करीब 8,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले अमूल पर हावी होती राजनीति के पीछे गुजरात के करीब 28 लाख दुग्ध उत्पादक और करीब 1 करोड़ से ज्यादा का वोट बैंक भी बड़ी वजह है।
अमूल में तेज हुई राजनीति का असर अमूल के उत्पादों पर कीमतों और इस कॉपरेटिव की बाकी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है। दरअसल, डॉ. कुरियन के वक्त अमूल और केंद्र सरकार के बीच सौहार्दपूर्ण स्थिति थी और दुग्ध उत्पादों के आयात और पशु चारे की कीमतों को प्रभावित करने वाली नीतियों में अमूल के हितों का ख्याल रखा जाता था। इसका सबसे बड़ा फायदा अमूल को अपने उत्पादों की कीमतें कम रखने में मिलता था और कम कीमतों के चलते निजी कंपनियां इसे टक्कर नहीं दे पाती थीं। लेकिन अमूल पर भाजपा के बढ़े वर्चस्व से अब यह स्थिति नहीं रही। अमूल के उत्पादों के दाम गत फरवरी से अब तक दो बार बढ़ चुके हैं और दिल्ली जैसे महानगरों में यह वृद्घि करीब 15 फीसदी की है।
डॉ. कुरियन के बाद अब जिस नाटकीय तरीके से अमूल से बी.एम. व्यास की विदाई हुई उसे अमूल की सहकारी संरचना को लेकर शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। कुरियन के बाद व्यास ही अमूल का चेहरा थे और अमूल को करीब 1,100 करोड़ रुपये से 8,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंचाने और दूध बेचने वाली डेयरी से इसका दायरा बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका थी। अमूल से डा. कुरियरन ओर व्यास जैसे डेयरी दिग्गजों की विदाई के बाद कई देसी-विदेशी कंपनियां, जो पहले क्षेत्र में आने से कतराती थी, अमूल में मौजूदा रस्साकशी का फायदा उठा सकती है।
तरानों की नगरी बसाने वालों के घर सूने
- देश के सबसे लोकप्रिय एफएम रेडियो स्टेशनों में शामिल ऑल इंडिया रेडियो का एफएम गोल्ड पूरी तरह अस्थायी प्रस्तोताओं के हवाले है जिन्हें साल भर से भुगतान नहीं हुआ है और काम की शर्तें जिल्लत से भरी हैं।
- वर्ष 2010 के पहले दिन, दुनिया भर में 4.5 लाख श्रोताओं वाला वल्र्ड स्पेस रेडियो अचानक पूरी तरह खामोश हो गया। साल भर पहले दिवालिया हुए इस सैटलाइट रेडियो की यह स्थायी खामोशी थी।
- पिछले पांच सालों में देश के कई छोटे शहरों में प्राइवेट एफएम चैनलों के आगाज के साथ वर्ष 2010 नया मोड़ लेकर आया। रिलायंस के एडलैब्स और सन ग्रुप ने 40 एफएम चैनलों के लाइसेंस सरकार को वापस कर दिए।
- वर्ष 2009 में देश के 268 प्राइवेट रेडियो एफएम चैनलों ने 800 करोड़ रुपये के मुनाफे के मुकाबले 2400 करोड़ रुपये का घाटा झेला।
झीनी बारिश के माहौल की मस्ती हो या दफ्तर में बॉस से नोकझोंक के बाद दिमाग की नसों को फाड़ता तनाव, सर्पीली सड़कों पर कार ड्राइव करते वक्त म्युजिक सिस्टम में बजते गोल्ड एफएम में गुजरे जमाने के गीत, आप एकाएक सुर और संगीत के रस में बह जाते हैं। पर कभी स्पीड ब्रेकर या रेड लाइट पर ठहर कर सोचा है कि जो लोग चुन-चुन कर आपके दिलों को छूते गाने पहुंचाते हैं, आपको हर मुश्किल में तसल्ली और हौसला देने वाली बातें करते हैं, खुद किन मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
प्राइवेट एफएम चैनलों की चुनौतियों से पहले बात सरकारी एफएम की, जो कई मायनो में अनूठा है और इसके भीतर के हालत उतने ही अजीब। वर्ष 2010 में पुराने नग्मों और दिलचस्प जानकारियों के मेल वाला एफएम गोल्ड पूरी तरह से अस्थायी प्रेजेंटरों के कंधों पर टिका है। सात-आठ साल तक एफएम गोल्ड को लोगों के दिलों में बैठाने की जी तोड़ कोशिशों के बाद आज हालात यह है कि एक-दो नहीं बल्कि 72 लोगों को चुन-चुनकर आजमाया जाता है और जिन को मौका मिलता है, उन्हें बरसों तक भुगतान नहीं होता। जिन्हें भुगतान किया जाता है उन्हें अप्रैल का भुगतान नवंबर की तारीख पर होता है। हालात यहां तक बिगड़े कि ऑल इंडिया रेडियो में पहली बार अस्थायी प्रस्तोता लामबंद होकर विरोध पर उतारू हुए और अपना रेडियो बचाओ अभियान शुरू कर डाला।
एफएम गोल्ड के शुरुआती प्रेजेंटर और जाने-माने रेडियो कलाकार इरफान बताते हैं कि भुगतान में देरी उतनी बड़ी वजह नहीं है, जितनी कई बाकी मुश्किलें। ऑल इंडिया रेडियो के ऐतिहासिक आर्काइव का कोई इस्तेमाल एफएम गोल्ड के प्रसारण में नहीं होता। प्रसारण में जिस तरह की अनुपयोगी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है उससे हालत यह है कि प्रेजेंटर को अपने पास से गाने लाकर बजाने पड़ते हैं। यानी ऑल इंडिया रेडियो की विरासत बेकार पड़ी है। इतना ही नहीं, गजल के प्रोग्राम में कुश्ती की कमेंटरी और जवाब दे चुकी मशीनों की तकनीकी खामियां, बचा-खुचा हौसला छिनने में कसर नहीं छोड़तीं।
एफएम चैनल पर लंबे समय गजल का लोकप्रिय कार्यक्रम देने वाले और पिछले छह महीने से तौबा कर चुके एक रेडियो कलाकार कहते हैं कि चैनल के आला अधिकारियों के रवैये के चलते गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और रचनात्मक माहौल खत्म हो रहा है। ऑल इंडिया रेडियो में बेपरवाही का आलम यह है कि पूरा आकाशवाणी महानिदेशालय कूड़े के ढेर में तब्दील कर दिया गया है। पुराने रिकॉड्र्स और पुरानी स्क्रिप्ट सब कुछ बर्बाद हो रही है। चैनल की ऊर्जा चूक सी गई है, वह बस घिसट रहा है।
लगातार घाटे में चलते निजी एफएम चैनल्स के प्रेजेंटर जहां लाखों में कमा रहे हैं वहीं सरकारी गोल्ड एफएम के प्रेजेंटरों को चार-पांच हजार रुपये के लिए आकाशवाणी के अफसरों के रहमो-करम में खासी घंटों की मशक्कत करनी पड़ती है। उस पर तुर्रा यह कि महीने में छह से ज्यादा प्रोग्राम नहीं कर सकते और भुगतान के लिए साल भर इंतजार करना पड़ता है। प्रेजेंटरों पर दबाव बनाकर एक ड्राफ्ट पर दस्ताखत करवाना शुरू कर दिया है, जिसमें शर्त रखी गई है कि प्रेजेंटर महीने में छह से ज्यादा प्रोग्राम आकाशवाणी के किसी भी विभाग, या चैनल में नहीं करेंगे। इस पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि प्रस्तोता अपनी मर्जी से छह से ज्यादा कार्यक्रम नहीं करना चाहते हैं जबकि इन छह कार्यक्रमों की मजूरी से दिल्ली महानगरी में सामान्य जिंदगी भी नहीं घिसट सकती। प्रेजेंटर को एक कार्यक्रम के लिए 1600 रुपये मिलते हैं, और महीने के छह के हिसाब से यह राशि बैठती है 9,600 रुपये। वह भी तब जबकि सभी छह कार्यक्रम झोली में गिरें। राजधानी या इंद्रप्रस्थ चैनल में यह राशि मात्र 400 रुपये है।
एफएम गोल्ड के प्रेजेंटरों की दिक्कतों के बारे में प्रसार भारती के सीईओ बी.एस. लाली का कहना है कि अपना रेडियो बचाओ अभियान के लोगों की परेशानियों से वह वाकिफ हैं और इस बारे में आकाशवाणी की महानिदेशक नौरीन नकवी से आख्या मांगी गई है। पूरे मामले को संवेदनशीलता से निबटाने का वादा करते हुए लाली कहते हैं कि कलाकारों को पूरा सम्मान और माहौल देने की कोशिश की जाएगी।
तकनीकी रूप से बात करें तो देशभर में चलनेवाले प्राइवेट एफएम चैनलों को प्रसारण सुविधा देने का काम स्वयं आकाशवाणी के ट्रांसमिटर से होता है। लेकिन बिडंबना देखिए कि निजी चैनलों के लिए जहां 20 किलोवाट का ट्रांसमिटर है वहां एफएम गोल्ड मात्र ढाई किलोवाट के ट्रांसमिटर पर चल रहा है। आधिकारिक रूप से इसे 5 किलोवाट पर चलाने का प्रावधान है। एफएम गोल्ड डिजिटल रूप में है फिर भी रेडियो सिटी या मिर्ची की तुलना में उसकी आवाज में स्पष्टता कम है।
दिक्कतें अन्य प्राइवेट चैनलों की भी कम नहीं हैं। साल भर में करीब 2400 करोड़ रुपये खर्च कर सिर्फ 800 करोड़ रुपये कमाई करने वाले प्राइवेट एफएम चैनल अब मदद के लिए सरकार का मुंह ताक रहे हैं। एक ओर जहां दूसरे चरण के 248 प्राइवेट एफएम चैनलों की यह हालत है, वहीं सरकार तीसरे चरण में 800 नए चैनलों को लाइसेंस जारी करने की तैयारी में है। रेडियो इन्वेस्टर फोरम से जुड़े तारीक अंसारी कहते हैं कि प्राइवेट चैनलों में एक स्टेशन, जो मार्केट लीडर है, को छोड़कर कोई भी अपना खर्चा निकालने की स्थिति में नहीं है। प्राइवेट एफएम ने हालांकि बड़ा श्रोता वर्ग बनाया है लेकिन उसकी वित्तीय स्थिति चिंता का विषय है।
दरअसल, प्राइवेट और सरकारी दोनों ही तरह के एफएम चैनल की रीढ़ लोकप्रिय संगीत ही इसकी सबसे बड़ी कमजोर नस है। सरकारी चैनलों में जहां लालफीताशाही के चलते संगीत की विरासत धूल फांस रही है, वहीं प्राइवेट चैनलों की कमाई का 10 से 50 फीसदी हिस्सा संगीत खरीदने यानी गानों की रॉयल्टी पर खर्च हो रहा है। इस मोर्चे पर प्राइवेट चैनल लामबंद होकर सरकार से राहत पाने की आस लगा रहे हैं।
भाषाई भेदभाव भी कम नहीं
ये लोग भाषाई भेदभाव से भी नाराज हैं। ऑडिशन की लंबी प्रकिया के बाद पास हुए लोगों को वाणी सर्टिफिकेट कोर्स के नाम पर पांच दिन की जरूरी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए पांच हजार रुपये लिए जाते हैं। लेकिन दिलचस्प यह कि ट्रेनिंग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों के लिए है, नेपाली, फ्रेंच, अरबी और विदेशी भाषाओं के लिए नहीं है। आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा में भी भाषाई भेदभाव की गंभीर स्थिति है। भारतीय भाषाओं में काम करने वालों के लिए जरूरी योग्यता और मानदेय विदेशी भाषाओं के मुकाबले बहुत कम है। हैरानी की बात यह है कि नेपाली भाषा के कर्मचारियों को अब भी विदेशी भाषा के कर्मचारियों की तरह ही माना जा रहा है जबकि नेपाली सिक्किम की आधिकारिक भाषा है और 1992 से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में से एक है।
राजस्थान में नरेगा के पैसे से लैपटॉप
गरीबों को रोजगार की गारंटी पर खर्च होने वाले पैसा भ्रष्टïाचार के रास्ते रिसता हुआ कंप्यूटर और लैपटॉप तक पहुंच गया है। नियमों को ठेंगा दिखाकर राजस्थान में अफसरों ने महात्मा गांधी राष्टï्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के पैसे का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कंप्यूटर और लैपटॉप खरीदने में कर डाला। इसके अलावा भी सामग्री की खरीद में कई तरह धंाधलियां उजागर हुई हैं। खुद राज्य सरकार की जांच में इस योजना में भ्रष्टïाचार का नया रूप समाने आया है, जो योजना के निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े करता है।
राजस्थान सरकार की जांचमें उजागर हुआ है कि पांच जिलों में भवऐण के पैसे से कंप्यूटर, लैपटॉप और एयर कंडीशनर आदि खरीदे गए और इनकी खरीद में कई गड़बडिय़ां हुईं। कई जिलों में कंप्यूटरों की खरीद पूरी तरह से सरकारी नियमों की अनदेखी कर हुईं। न टेंडर मंगाए गए और न ही अधिकृत फर्मों से खरीद हुई। टोंक में 1 करोड 11 लाख, दौसा में 78 लाख, डूंगरपुर में 85 लाख और हनुमान गढ़ में 79 लाख रुपये की कंप्यूटर खरीद में अनियमितता की बात खुद राज्य सरकार की जांच में सामने आई है। करौली जिले में तो पंचायतों के लिए 150 लैपटॉप खरीदे गए जबकि बांसवाड़ा में मनेरगा के पैसे का इस्तेमाल एयर कंडीश्नर खरीदने में हुआ। मनरेगा में 60 फीसदी पैसा मजदूरी और 40 फीसदी निर्माण सामाग्री आदि पर खर्च के लिए दिया जाता है। अब भ्रष्टï तंत्र का निशाना सामग्री मद है।
सूचना के अधिकार के तहत इन गड़बडिय़ों की जानकारी हासिल करने वाले सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान के निखिल डे कहते हैं कि मनरेगा में अभी तक मजदूरी से जुड़े भ्रष्टïाचार के मामले सामने आते थे लेकिन अब सामग्री में ज्यादा भ्रष्टïाचार हो रहा है। जिला स्तर पर कलेक्टर ही योजना का कार्यक्रम समन्वयक होता है और सारी खरीद उसी की देखदेख में होती है। सामग्री की खरीद में बड़े पैमाने पर धांधलियों के बावजूद बड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, राजस्थान के मनरेगा कमिश्नर राजेंद्र भानावत ने अपनी जांच में कंप्यूटर खरीद में धांधली के लिए डंूगरपुर की तत्कालीन जिला कलेक्टर डॉ. आरुषी मलिक को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें बर्खास्त करने की सिफारिश की है। लेकिन किसी भी अधिकारी के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
राजस्थान केंद्र सरकार की रोजगार गांरटी योजना के तहत सबसे ज्यादा धन हासिल करने वाला राज्य है। इस खर्च की जमीनी हकीकत जांचने के लिए हुए सोशल ऑडिट यानी सामाजिक अंकेक्षण को स्थानीय दबंगों और नेताओं के विरोध का सामाना करना पड़ा था जिसके बाद सरकार ने सोशल ऑडिट पर ही रोक लगा दी। लेकिन राज्य के 18 जिलों की जिन 18 पंचायतों को मनरेगा के तहत सामग्री के लिए सबसे ज्यादा पैसा मिला, उनकी विशेष जांच करवाई गई तो मालूम पड़ा कि करीब 4 करोड़ रुपये की सामग्री का कहीं नामो-निशान नहीं है। यह सीधे गबन का मामला है, लिहाजा सरकार ने पंचायतों से यह पैसा वापस वसूलने का फैसला किया है। डंंूगरपुर जिले की झरनी ग्राम पंचायत में 63 लाख रुपये सामग्री मद में खर्च किए गए लेकिन मौके पर पाया गया कि करीब 58 लाख रुपये का भुगतान बिना सामग्री खरीदे ही कर दिया गया है। अजमेर जिले में मालतो की बेर पंचायत से 1 करोड़ 31 लाख रुपये की वसूली की जानी है, क्योंकि यह पैसा सिर्फ कागजों में खर्च किया गया। इन गड़बडिय़ों के बाद सिर्फ पांच जिलों में सरपंच और नरेगा से जुड़े स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, जबकि अन्य मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
राजस्थान के पंचायती राज मंत्री भरत सिंह मानते हैं कि इन गडग़डिय़ों के लिए निगरानी करने वाली एजेंसी भी जिम्मेदार है और भ्रष्टïाचार के इन मामलों में शामिल बड़े अधिकारियों को भी बख्शा नहीं जाएगा।
मनरेगा में भ्रष्टïाचार के इस नए रूप से चिंतित निखिल डे कहते हैं कि पंचायत स्तर पर करोड़ों की लूट के लिए मौका मिल रहा है जो स्थानीय स्तर पर नेताओं और अधिकारियों के सरंक्षण में पल रहे गुंडा तंत्र को खाद-पानी देने का काम करेगा। यह और भी ज्यादा खतरनाक है।
निखिल की चिंता झारखंड के पलामू में यांकी क्षेत्र की घटना से भी समझ में आती है। तेरह मई 2010 को ग्राम स्वराज अभियान के तीन कार्यकर्ताओं लाडले सिंह, दामोदर सिंह, रवींद्र ओरांव और बांसीखुर्द गांव के सुदामा को एक गुंडों ने बुरी तरह पीटा और बंधक बनाकर एक विधायक के घर ले आए।
स्थानीय जनसंगठन ग्रामीण स्वराज अभियान के कार्यकर्ता पिछले एक साल से इस इलाके में मनरेगा सहायता केंद्र चला रहे हैं, जो स्थानीय मजूदरों को योजना के तहत काम लेने तथा समय पर भुगतान हासिल करने में मदद करता है और गड़बड़ी की स्थिति में शिकायत भी करता है। मनरेगा से पैसा बनाने वाले ठेकेदारों को अभियान की यही सक्रियता नागवार गुजरी। ऐसा समझा जाता है कि ये स्थानीय ठेकेदार विधायक के आदमी हैं। एक बार जब ठेकेदार सबल खान उर्फ मुन्ना खान मजदूरों के बजाय मशीन का इस्तेमाल कर रहे थे तो सहायता केंद्र ने इसकी शिकायत डिप्टी कमिश्नर से की और मशीन का इस्तेमाल रुकवाया। इस केंद्र की कोशिशों ने जहां ठेकेदारों के लिए फर्जीवाड़ा करना मुश्किल कर दिया वहीं मजदूर योजना का पूरा फायदा उठाने लगे। फिर क्या था, गुंडों ने अभियान के कार्यकर्ताओं को धमकाना और इलाका छोडऩे की धमकियां देनी शुरू कर दीं।
हालिया मामला पांकी के विधायक विदेश सिंह के भाई की जमीन पर तालाब के निर्माण का है। मजदूरों ने नियमों के उल्लंघन और भुगतान न मिलने के डर से यहां काम करने से मना कर दिया और मामले की शिकायत जिला कलेक्टर से की। इसके बाद आंगनबाड़ी केंद्र में सेविका के चयन को लेकर भी गुंडों और बंसीखुर्द गांव की महिलाओं के बीच विवाद हुआ और गुंडों ने इन महिलाओं की पिटाई कर दी। इन्हीं लोगों ने ग्रामीण स्वराज अभियान के कार्यकर्ताओं को भी मारा-पीटा। मामले की जानकारी मिलने के बाद प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और मनरेगा राष्ट्रीय परिषद सदस्य जां द्रेज समेत अभियान के कई लोग मौके पर पहुंचे और कार्यकर्ताओं को छुड़ाकर 11 गुंडों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जो विधायक विदेश सिंह के आस-पास देखते जाते हैं।
सरकारी शिकंजे में जैविक खेती
जरा सोचिए, देश के किसी दूर-दराज इलाके का छोटा किसान जिसकी रोजी-रोटी एक एकड़ से भी कम खेती पर टिकी है और जो ज्यादा महंगे उरर्वक डालने के बजाए परंपरात खेती के भरोसे है, उसे जैविक खेती करने वाला किसान कहलाने के लिए क्या करना पड़ेगा? वह ज्योग्राफिक पॉजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस)नाम का उपकरण खरीदेगा, दशमलव के दूसरे स्थान तक खेत के अक्षांश और देशांतर नापेगा, एक कंप्यूटर खरीदेगा जिसमें खास सॉफ्टवेयर डालकर खेती से जुड़ी सूचनाएं और आंकड़े फीड करेगा। इतना ही नहीं इस सॉफ्टवेयर के जरिए वह खेत पर आपकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जैसे बीज कहां से खरीदा, खाद कहां से लाया फसल की खरीद-बिक्री आदि का रिकॉर्ड उपलब्ध कराएगा। इन सब के अलावा उसको सालाना बेलेंस शीट भी तैयार करनी पड़ेगी। यह बाध्यता भारत सरकार की ओर से किसानों पर लादी जा रही है और इन सब ताम-झाम को पूरा नहीं करने का मतलब है कि उसे जैविक खेती करने वाले किसान का दर्जा नहीं मिलेगा। यह है परिभाषाओं, प्रमाण पत्रों और प्रक्रियाओं के सरकारी झमेले में फांसी जा रही जैविक खेती की स्थिति जिसकी लगाम कृषि मंत्रालय के बजाय वाणिज्य मंत्रालय के हाथों में है। वाणिज्य मंत्रालय तय कर रहा है कि देश में जैविक खेती कैसे की जाएगी और कैसे जैविक खेती का ठप्पा किसान पर लगेगा।
भले ही इन दिनों जैविक खेती अभिजात्य शहरी जीवन का नया शगल हो लेकिन असल में यही वह खेती है जो देश के करोड़ों छोटे किसानों के लिए उपयुक्त है। अगर देखा जाए तो देश के आधे से ज्यादा किसान महंगी लागत वाली खेती न कर पाने के चलते ऐसी खेती कर रहे हैं, जिसे जैविक करार दिया जाता है। इनकी खेती बारिश पर निर्भर है और इनके आर्थिक हालत इन्हें महंगे रसायन और उर्वरक डालने की अनुमति नहीं देते। लेकिन अपनी नियति से जैविक किसान बने देश के ऐसे करोड़ों छोटे किसानों की खेती सरकारी मानकों के हिसाब से कतई जैविक नहीं है। और जब तक ये किसान कंप्यूटर के जरिए आंकड़ों की बाजीगरी करना नहीं सीख जाते, यह जैविक हो भी नहीं पाएगी।
जैविक खेती की समर्थक और पूर्व पत्रकार भवदीप कांग कहती हैं, 'आज भी योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार देश में 60 फीसदी से अधिक किसान जैविक खेती कर रहे हैं। देश के कुल अनाज भंडार में इनका योगदान 40 फीसदी से भी अधिक है। ये सभी वर्षा-आधारित खेती कर रहे हैं। लेकिन वाणिज्य मंत्रालय इन पर अव्यवाहरिक मानक लाद कर इन्हें प्रमाण पत्र के झंझट में फंसा रहा है। जैविक खेती का प्रमाण पत्र हासिल करने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आम किसान के लिए खेती के साथ-साथ इसे कर पाना संभव नहीं है।Ó सिर्फ निर्यात को ध्यान में रखकर बनाई जा रही ऐसी नीतियां देसी खेती के लिए तो घातक हैं ही, साथ ही जैविक खेती के आंदोलन में शामिल होने से करोड़ों किसानों को वंचित रखने की साजिश का हिस्सा भी हैं। ऐसी नीति जनता को भी सस्ते और अच्छे अन्न से वंचित कर महंगे जैविक फूड का बाजार बढ़ा रही है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में बिना किसी सरकारी प्रमाण पत्र के जैविक खेती करने वाले किसान शक्ति सिंह कहते हैं कि सरकार की गलत नीतियों के चलते जैविक आंदोलन को धक्का पहुंचा है। उनके जैसे बहुत से किसान तन-मन से जैविक खेती में लगे हैं लेकिन जैविक किसान का प्रमाण पत्र उनके लिए दूर की कौड़ी है। सिंह के मुताबिक, 'प्रमाण पत्र के नियम और शर्तें ऐसी हैं कि इसे हासिल करना छोटे काश्तकार के बस की बात नहीं। उसके लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य हो गया है। यह पूरी तरह अव्यवहारिक है। दो जून की रोटी को तरसने वाले किसान के साथ भद्दा मज़ाक। प्रमाणित जैविक खेती सिर्फ गिने-चुने बड़े किसानों और निर्यातकों तक सीमित रह गई है।
वाणिज्य मंत्रालय के तहत कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने वाली संस्था एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट यानी एपीडा की ओर से दिए जाने वाले जैविक खेती के प्रमाण पत्र की फीस और कागजी कार्यवाही का खर्च ही करीब एक लाख रुपये सालाना आता है। इसके अलावा कंप्यूटर खरीदने, इंटरनेट कनेक्शन लेने, आंकड़े उपलब्ध कराने, जीपीएस और अंग्रेजी में दस्तावेज तैयार करने के लिए का झंझट अलग। चूंकि छोटे किसान यह सब नहीं कर पाएंगे इसलिए जैविक खेती के सिद्धांत पर खेती के बावजूद उनके उत्पाद जैविक अन्न के तौर पर बाजार में नहीं बिकेंगे। इस दुष्चक्र के चलते छोटे किसानों का मोह जैविक खेती से भंग हो रहा है। जबकि विश्व बैंक का अध्ययन बताता है कि भारत और चीन में जब किसानों ने जैविक खेती अपनाई है उनकी आमदनी और जीवन स्तर सुधरा है।
देसी खेती और जैविक खेती के बीच बन रहे इस फासले की शुरुआत उस सरकारी परिभाषा से हुई जिसके मुताबिक जिस खेती को प्रमाण पत्र हासिल नहीं है, वह जैविक नहीं है। यहां तक कि बिना ऐसे प्रमाणपत्र के उत्पाद घरेलू बाजार में भी जैविक कहकर नहीं बेचे जा सकते हैं। एपीडा की जैविक संबंधी मामलों की सलाहकार डॉ. पीवीएसएम गौरी कहती हैं कि उत्पाद के विदेशों को निर्यात के लिए प्रमाण पत्र बुनियादी जरूरत है। जैविक फूड के प्रमुख ग्राहक देश ऐसे प्रमाण पत्र के बगैर उत्पाद स्वीकार नहीं करते। घरेलू और अन्तर्राष्टï्रीय बाजार में प्रमाणित जैवित फूड की मांग और कीमत दोनों ही ज्यादा होती है। किसानों के बीच खेती का स्तर बढ़ाने में मदद मिलती है। छोटे किसानों को समूह में प्रमाण पत्र देने और इस पर आने वाले खर्च पर सब्सिडी देने जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं।
लेकिन संयुक्त राष्टï्र का खाद्य और कृषि संगठन यानी एफएओ भी भारत सरकार की इस कारगुजारी की आलोचना कर चुका है। एफएओ का साफ कहना है कि भारत सरकार ने जैविक खेती का प्रमाणन इतना महंगा बना दिया है कि उपभोक्ताओं के लिए जैविक खाद्य खरीदना खासा महंगा हो गया है। एफएओ की रिपोर्ट का तो यहां तक कहना है कि ऐसी प्रक्रिया छोटे किसानों के हितों के खिलाफ है जबकि बड़े कृषि कारोबार को फायदा पहुंच रहा है।
दरअसल, यह समस्या जैविक खेती के निर्यातोन्मुख होने से पैदा हुई है। इसके कारण सरकार ने इस खेती व्यवस्था को ही प्रमाणीकरण केंद्रित बना दिया है। इसीलिए देश की 10 करोड़ हेक्टेयर से अधिक जैविक खेती में से सरकार सिर्फ 10 लाख हैक्टेयर को ही जैविक का दर्जा देती है। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि देश में जैविक प्रमाणीकरण की जिम्मेदारी कृषि मंत्रालय की न होकर, वाणिज्य मंत्रालय की है। इसके लिए जो नियम बनाए गए हैं वे अमेरिका एवं यूरोपीय यूनियन से ज्यों की त्यों टीप लिए गए हैं। वहां पांच हजार एकड़ वाला किसान जैविक खेती करता है और यहां पांच एकड़ वाला तो जैविक खेती ही करता है। इसके बावजूद एपीडा के आला अधिकारी जैविक खेती के लिए प्रति एकड़ मिलने वाली दस हजार रुपये की सब्सिडी और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं के बूते जैविक खेती की इस चुनौती को झूठलाने का दावा करते हैं।
वास्तव में जैविक खेती अजीब विरोधाभास के बीच पीस रही है। कृषि अर्थशास्त्री और नीति-नियामक इस बहस में उलझे हुए हैं कि अगर देश में सारी कृषि प्रणाली जैविक हो जाए तो देश का पेट कैसे भरेगा। एग्रो-केमिकल लॉबियां यह साबित करने में जुटी हुई हैं कि जैविक खेती से देश में अन्न का संकट पैदा हो जाएगा। जबकि गैर-सरकारी संगठन और कुछ सरकारी अधिकारी किसानों को समझाने में जुटे हैं कि जैविक खेती करोगे तो उपज की कीमत ज्यादा मिलेगी। तुम्हारा माल निर्यात होगा, डॉलर के भाव बिकेगा। इसके जरिये वे देश में दूसरी हरित क्रांति की दिशा ढूंढ रहे हैं। इस विरोधाभास के बीच बड़े किसानों और कंपनियों के महंगे ऑर्गेनिक फूड और जैविक खेती का ठप्पा देने वाली कंपनियों का कारोबार खूब फल-फूल रहा है।
ग्लोबल कबाड़ से हादसों का सौदा
चमकीली सी दिखने वाली चीज ने जब कहर ढाया तो जान आन पड़ी। ना धमका ना नश्तर सी चुभन पर जो हुआ वो किसी भयावह फिल्म के दृश्य से कमतर ना था। पहले चमड़ी काली पड़ी फिर सिर के बाल उतरने लगे और थोड़ी देर में होश पस्त। यह था आठ अप्रैल को दिल्ली के मायापुरी इलाके में अजीबो-गरीबो किस्म कबाड़ की दुकान का मंजर। मौत का यह सामान उस कबाड़ से निकला, जिसे गलाना-काटना उनका रोज का काम है। जब दुकान का मालिक इसकी चपेट में आया और उसकी तत्वा का रंग बदला, बाल उड़ गए तब मामला उजागर हुआ। यह रेडियोधर्मी कबाड़ का असर था, जिसका खौफ अगले कई सप्ताह तक मायापुरी में छाया रहा। यह वही रेडियोधर्मी खतरा है जिसका असर राजस्थान के रावतभाटा में परमाणु उर्जा केंद्र के आसपास के हजारों निवासी पिछले कई बरसों से अब तक झेल रहे हैं। राजधानी के भीतर रेडियोधर्मी कचरे की जो विकिरण यानी रेडिएशन हफ्ते भर तक सुर्खियां बनी, उससे कहीं ज्यादा जहर तो झारखंड के जादूगुडा इलाके की फिजा मे घुल चुका है, जो भारत का यूरेनियम खनन का प्रमुख स्रोत है। रावतभाटा के लोगों पर हुए रेडियोएक्टिव विकिरण के असर पर संघमित्रा और सुरेंद्र गाडेकर की शोध बताती है कि परमाणु संयंत्र के आसपास रहने वाले लोगों में त्वचा संबंधी रोग, ट्यूमर, अंधापन, जोड़ों का दर्द जैसी समस्याएं बाकी इलाकों से दो-तीन गुनी ज्यादा हैं। इसी तरह जादूगोड़ा में किए गए सर्वे बताते हैं कि करीब 30 फीसदी महिलाएं गर्भधारण करने से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्ति हैं। वहीं पर बड़ी तादाद में लोग टीबी, कैंसर, ब्रेन डेमेज, कीडनी डेमेज और स्नायु तंत्र में गड़बडिय़ों के शिकार हैं। लेकिन अब इस भयानक और लाइलाज खतरे ने महानगरों में दस्तक दे दी है और दिल्ली में हुई विकिरण की हालिया घटना इसका ताजा सबूत है।
हालंाकि दिल्ली की घटना की वैज्ञानिकों जांच अब भी जारी है इस घटना ने जहरीली कचरे के खतरे की वह तस्वीर पेश की है जिसे नजरअंदाज कर भारत को विदेशी कचरे का कूड़ेदान बनाया जा रहा है। खुद सरकार के आंकडे कहते हैं कि वर्ष 2003-04 में जहां भारत में करीब 11 करोड़ टन इस्पात कचरे के तौर पर लाया गया, वहीं 2007-08 में इसकी मात्रा बढ़कर करीब 34 करोड़ टन हो गई। पूंजी और संसाधनों के वैश्वीकरण के साथ-साथ कूड़े-कचरे के ग्लोबल होकर विकसित देशों से गरीब मुल्कों की ओर जाने के इस दौर ने भारत जैसे देश को मायापुरी जैसे हादसों के ढ़ेर पर खड़ा कर दिया है। इस प्रकार विदेश से बड़ी मात्रा में आने वाले कचरे में न सिर्फ जहरीले और विस्फोट पदार्थ होने की आशंका बनी हुई है बल्कि दिल्ली की तरह रेडियो सक्रिय पदार्थों से विकिरण यानी रेडिएशन का खतरा भी है। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इस कचरे से जुड़ा पूरा उद्योग पुख्ता सुरक्षा उपायों और इंतजामों की बदहाल स्थिति के बीच शहरों की गरीब बस्तियों में पनप रहा है। इन हालात को जानने के बावजूद जिस तेजी से सरकार खतरनाक कचरे का आयात दिनों-दिन बढ़ा रही है वह और भी चौंकाने वाला है। भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2004-05 में 10111 किलो मेडिकल कचरा, वर्ष 2007-08 में 500 किलोग्राम खतरनाक रेडियोधर्मी कोबाल्ट का कूड़ा और 27 लाख किलोग्राम बैटरी का कूड़ा आयात हो चुका है। यही हाल इलेक्ट्रिॉनिक कचरे में मामले में भी है। पिछले साल सितंबर में ही भारत ने उत्तरांचल स्थित एक रिसाइक्लिंग फर्म को 8000 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे के आयात की कानूनी मंजूरी दी। दुनिया भर के कूड़े-कबाड़े से भारत का यह मोह तब दिख रहा है जब खुद का घरेलू कचरा अपने आप में बड़ी चुनौती है। पर्यावरण से जुड़े कई अध्ययन बताते हैं कि भारत में सालाना निकलने वाले करीब 4 लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे में से करीब 60 फीसदी का कोई शोधन नहीं होता। पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर सक्रिय संस्था टॉक्सिक लिंक्स के सहायक निदेशक सतीश सिन्हा सवाल उठाते हैं कि भारत में इतनी बड़ी तादाद में विदेशों से कचरा मांगाने का क्या औचित्य है। सरकार पर्यावरण और लोगों की जान जोखिम में डालकर देश को कचरे के इस खतरनाक कारोबार को शह दे रही है। इस प्रकार आने वाले कचरे की पूरी जांच के लिए न तो बंदरगाहों पर पर्याप्त इंतजाम हैं और न ही रेडिएशन जैसे हादसे से मुकाबले की तैयारी। बाहर से आने वाले खतरनाक कचरे में से सिर्फ 10 फीसदी की ही औचक जांच हो पाती है और इस कचरे में किसी विस्फोट या अन्य जहरीले पदार्थ के आने की पूरी-पूरी आशंका रहती है।
सरकारी एजेंसियों,्र खासकर केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग ने जिस तरीके से मायापुरी के हादसे का मुकाबला किया, उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। हफ्ते भर से ज्यादा चली शुरुआती छानबीन के बावजूद सरकार यह बताने में नाकाम है कि जिस कूड़े से मायापुरी में रेडिएशन फैला वह घरेलू कूड़ा था अथवा विदेश से आयातित। जिस कोबाल्ट60 को इस रेडिएशन की वजह करार दिया गया उसका इस्तेमाल आमतौर पर मेडिकल उपकरणों में होता है। लेकिन हादसे की वजह बने पदार्थ के स्रोत का रहस्य खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा यह भी मालूम नहीं चल पाया कि इस रेडियोधर्मी स्क्रैप का इस्तेमाल कहीं इस्पात बनाने में तो नहीं किया गया।
परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड(एईआरबी) ने दिल्ली पुलिस को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें कहा गया है कि कोबॉल्ट -60 एक से ज्यादा स्रोत से आया हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि औद्योगिक या अस्पतालों के कचरे के रूप में इसकी देश के बाहर से भी आने की संभावना है। दो दुकानों को छोड़कर, जहां रेडियोधर्मी पदार्थ मिला था, पूरे बाजार को रेडिएशन मुक्त घोषित कर दिया गया है। लेकिन इस बीच, अजय नाम के एक व्यक्ति ने अनजाने में कोबाल्ट-60 की एक पिन अपने पर्स में पैंट के पीछे की जेब में रख ली थी। इसके घटना साथ विकिरण से प्रभावित होने वालों की संख्या बढ़कर 8 हो गई है।
केंद्रीय परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में कहा कि मायापुरी में जिस उपकरण से रेडियोधर्मी विकिरण हुआ वह बायोमेडिकल कचरा नहीं, बल्कि मेडिकल उपकरण था। उस उपकरण में गामा चैंबर था। उपकरण पुराना भी था और रजिस्टर्ड भी नहीं था। उन्होंने कहा कि एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा रहा है कि यह विदेश से आया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा का कहना है कि मायापुरी में रेडिएशन की घटना से साबित हो गया कि हम ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं।
मायापुरी की घटना से पहले भी कोबाल्ट-60 से रेडिएशन का एक ऐसा मामला सामाने आया था जिसने भारत में कबाड़ की रिसाइक्लिंग की पोल खोल दी थी। वर्ष 2008 में फ्रांस ने भारत में बनी लिफ्ट के स्विच यह कहते हुए वापस भेज दिए कि इसमें रेडियोधर्मी तत्व कोबाल्ट-60 पाया गया है। बाद में मालूम चला कि ये स्विच पुणे की एक कंपनी ने विदेशों से मंगाए गए कबाड़ को गलाकर बनाए थे। वर्ष 2003 के बाद से अमेरिका ने तो अपने यहां भारत जैसे देशों से आने वाले नए सामान का भी रेडियोधर्मी परीक्षण करना शुरू कर दिया है। भारत से गए इस्पात के 67 कंटेनरों को इस प्रकार के प्रदूषण के चलते वापस किया जा चुका है।
बेबस पुलिस और अस्पताल
मायापुरी की घटना ने उजागर कर दिया है कि भारत की पुलिस रेडिएशन के खतरों को भांपने में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है। यही हाल अस्पतालों का है। दिल्ली के अधिकांश अस्पतालों को यह समझने में खासा वक्त लग गया कि मायापुरी का मामला रेडिएशन से जुड़ा है। प्रमुख बंदरगाहों तक पर अभी रेडिएशन मॉनिटर नहीं लगे हैं। मायापुरी में कोबाल्ट-60 से उपन्न रेडिएशन ने एक तरफ पूरी दिल्ली में कोहराम मचा रखा है तो दूसरी तरफ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टर रेडिएशन के प्रभाव से अनभिज्ञ हैं। एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डा. रणदीप गुलेरिया के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया है। डा. गुलेरिया ने बताया कि एक्सरे और सीटी स्कैन करने वाले ज्यादातर डॉक्टर विकिरण के संपर्क में होने वाले खतरनाक प्रभावों से अनजान हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान के 100 सीनियर और जूनियर रेजीडेंट डाक्टरों के बीच अध्ययन के दौरान पाया गया कि 70 से 80 प्रतिशत डॉक्टर विकिरण के खतरनाक प्रभावों से अनजान हैं। दिल्ली के किसी भी अस्पताल के पास रेडिएशन की चपेट में आए मरीज के उपचार के लिए इंतजाम नहीं है।
रेडियोसक्रियता और परमाणु कचरा
प्रकृति में कुछ तत्व अस्थायी होते हैं जिनके परमाणु टूटते और बिखरते रहते हैं और साथ ही इस प्रक्रिया में विकिरण यानी रेडिएशन के रूप में ऊर्जा निकालते हैं। इस गुण को रेडियोधर्मिता कहा जाता है। किसी तत्व के इस प्रकार विघटित होने और विकिरण निकालने के गुण को उनकी अद्र्घ-आयु के तौर पर पहचाना जाता है। अद्र्घ-आयु वह समय है जिमसे कोई रेडियोधर्मी तत्व विघटित होकर आधी मात्रा में रह जाता है। यह अवधि कुछ सेकेंडों से लेकर लाखों वर्ष तक हो सकती है। रेडियोधर्मी तत्वों के विकिरण संबंधी गुणों के बूते ही परमाणु तकनीक का इस्तेमाल ऊर्जा के उत्पादन से लेकर चिकित्सा, खाद्य संरक्षण और रक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है। लेकिन इस तरह का इस्तेमाल अपने साथ रेडियोधर्मी कचरे का खतरा लेकर आया है। रेडियोधर्मी गुणों के चलते इस तरह के कबाड़ के खतरे सामान्य कबाड़ के खतरों से बहुत ज्यादा हैं।
रेडिएशन के खतरे
विकिरण से मानव और पर्यावरण को होने वाला नुकसान उसके संपर्क में आए तत्व की मात्रा और उसकी रेडियोधर्मी प्रकृति पर निर्भर करता है। मानव शरीर पर विकिरण का प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है। पहला- जिसमें असर सिर्फ त्वाचा और रक्त पर पड़ता है और जिसके अत्याधिक प्रभाव से कैंसर भी हो सकता है। दूसरे प्रकार का असर अनुवांशिक होता है, जिसमें विकिरण का असर आने वाली कई पीढिय़ों तक जा सकता है। दूसरे विश्व युद्घ में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम से मारे गए लाखों लोग ऐसी ही घातक विकिरण का शिकार हुए और जो बच गए ,उनके दुष्प्रभाव भी कई पीढिय़ों तक चलते रहे।
बाहरी तौर पर प्रभाव पडऩे से त्वचा के जलने की समस्या होती है, ज्यादा रेडिएशन की चपेट में आने से कमजोरी और यहां तक कि मृत्यु होने की संभावना होती है। रेडियोधर्मी विकिरण से लिवर, किडनी और हड्डियों के ऊतकों द्वारा अवशोषण करने से कैंसर होने की संभावना रहती है।
रेडिएशन के परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं, इसका अंदाजा 1983 में मेक्सिको में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है। वहां एक बेकार रेडियोथेरपी मशीन से लीक होने वाला कोबाल्ट-60 करीब 600 टन स्टील में जा पहुंचा। इस स्टील का इस्तेमाल मेक्सिको, कनाडा और अमेरिका के 23 राज्यों में हुआ। नतीजा यह निकला कि रेडियोधर्मी प्रदूषण को रोकने के लिए मेक्सिको के करीब 100 मकान नष्ट करने पड़े।
अमेरिका के परमाणु नियमन आयोग को हर साल रेडियोऐक्टिव पदार्थों के गायब होने, चुराए जाने या लावारिस छोड़े जाने की दो सौ रिपोर्टें मिलती हैं। कड़े नियम-कानूनों के बावजूद वहां इतने बड़े पैमाने पर रेडियोऐक्टिव पदार्थों का गुम होना सचमुच आश्चर्यजनक है। इन सब स्थितियों के मद्देनजर आंतकी गतिविधियों के लिए रेडियोधर्मी पदार्थों की चोरी-तस्करी अंतराष्टï्रीय चिंता का विषय बन चुका है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रतीक कुमार के अनुसार जब चिकित्सा में विकिरण का इस्तेमाल होता है तो यह मात्रा एक मिली सीवर्ट से बहुत कम रखी जाती है। रोगी को उपचार के लिए सिर्फ एक माइक्रो सीवर्ट रेडिएशन दिया जाता है जो बेहद मामूली होता है लेकिन किसी हादसे के दौरान वही मात्रा अनियंत्रित हो सकती है।
अंतर्राष्टï्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के मुताबिक, दुनिया के 110 से अधिक देश ऐसे हैं, जिनके पास रेडियोऐक्टिव पदार्थों को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम साधन भी नहीं हैं।
प्रमुख हादसे
1986- उक्रेन (तत्कालीन सोवियत संघ)में नाभिकीय रिएक्टर के फटने से तकरीबन छह लाख लोग रेडिएशन के प्रभाव में आ गए थे। करीब 4 हजार लोग कैंसर के चलते मौत के मुंह में गए और साढ़े तीन लाख लोगों को अपना घर छोडऩा पड़ा।
1992- चीन में गायब हुए कोबाल्ट-60 के रेडिएशन से तीन लोगों की मौत
1996- कोस्टारिका में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 7 लोगों की मौत
2000- थाईलैंड में कोबाल्ट 60 के रेडिएशन से तीन लोगों की मृत्यु
2000- पनामा में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 5 लोगों की मौत
2009- भारत में कैगा परमाणु बिजली संयंत्र में रेडियोएक्टिव पदार्थ पानी में मिला दिए जाने की घटना के बाद वहां के 50 कर्मचारी बीमार पड़ गए थे।
बॉक्स: जरूरी है परमाणु हादसों की जवाबदेही
विदेश से आने वाला कबड़ा ही रेडियोधर्मी कचरे का अकेला स्रोत नहीं है। इस तरह के हादसे की बड़ी आंशका विद्युत उत्पादन के लिए चल रहे परमाणु रिएक्टरों से भी है। इसके अलावा रेडियोधर्मी पदार्थों के खनन और शोधन की लंबी प्रक्रिया में भी कई जगह हादसे होने की आंशका रहती है। वर्तमान में भारत में विद्युत उत्पादन के लिए कुल 17 परमाणु रिएक्टर चल रहे हैं जबकि 6 निर्माण की प्रक्रिया में हैं। अमेरिका से परमाणु समझौता होने के बाद भारत की योजना वर्ष 2020 तक अपनी परमाणु उर्जा उत्पादन क्षमता को चार हजार मेगावाट से बढ़ाकर 20 हजार मेगावट करने की है। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार नए परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की दिशा में तेजी से बढ़ेगी और उसी अनुपात में रेडियोधर्मी हादसों का खतरा भी बढ़ेगा। इसे देखते हुए ही सरकार पर परमाणु हादसों की स्थिति में जवाबदेही तय करने और पीडि़तों को मुआवजा देने संबंधी प्रावधान करने का दबाव भी बढ़ा है। लेकिन सरकार परमाणु हादसों के जन दायित्व से जुड़ा जो कानून लाना चाहती है, उसके प्रावधानों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस विधेयक के प्रावधानों के खिलाफ अभियान चला रही संस्था ग्रीनपीस की करुणा रैना का कहना है,'जिस तरह का रेडिएशन दिल्ली के मायापुरी इलाके में पैदा हुआ और लोगों पर जो असर पड़ा, किसी परमाणु रिएक्टर में हादसे की स्थिति में वह इससे कई गुना ज्यादा भीषण हो सकता है।Ó रैना के मुताबिक, प्रस्तावित कानून में सारी जवाबदेही परमाणु रिएक्टर चलाने वाले पर डाली जा रही है जबकि इसके लिए तकनीक मुहैया कराने वालों को जवाबदेही से मुक्त रखा गया है। इसके अलावा इस विधेयक में मुआवजे की रकम भी यूरोप और अमेरिका में इस तरह के कानूनों के मुकाबले काफी कम है। जबकि भारत में जनसंख्या घनत्व ज्यादा होने की वजह से दुर्घटना होने की सूरत में उसका असर कहीं ज्यादा भयावह होगा।
शांति एवं परमाणु निशस्त्रीकरण अभियान से जुड़े अनिल चौधरी कहते हैं, 'परमाणु हादसों की जवाबदेही कम करके सरकार विदेशी कंपनियों खासकर अमेरिका की परमाणु क्षेत्र की कंपनियों के लिए भारत में जमीन तैयार कर रही है।Ó
अमर प्रेम या छोटी सी लव स्टोरी
- विश्व कप हॉकी के पहले ही मुकाबले में भारत की पाकिस्तान पर 4-1 से शानदार जीत के बाद अमिताभ बच्चन की प्रतिक्रिया देखिए- काफी समय बाद क्रिकेट को छोड़ हॉकी मैच देखने की इच्छा हुई है।
- स्पेन के हाथों 5-2 की करारी शिकस्त देखकर नेशनल स्टेडियम के करीब 15 हजार भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया देखिए- शानदार हॉकी दिखाने के लिए जोरदार तालियों से स्पेन की टीम का शुक्रिया।
- अब देखिए सातवें और आठवें स्थान के मुकाबले में हॉकी को दिल देने पहुंची प्रियंका चोपड़ा का तर्जुबा- भारतीय टीम के तीन गोल खाने के बाद वह मैच अधूरा छोड़कर चल देती हैं।
ठेट हॉकी प्रेमी इस के आधी हो चुके हैं लेकिन हफ्तों तक हॉकी को दिल देने की मुहिम चलाने वाली इस अदाकारा के लिए यह नए-नए इश्क में चोट खाने जैसा था। यह सब उस भारतीय हॉकी के साथ हो रहा है जिसे गुमनामी और नाकामी गहरे गर्त में धकेल रही है। यह टीम विश्व कप की तैयारी के बजाए भुगतान के लिए हड़ताल पर थी और हॉकी की तकदीर लिखने वाले काफी पहले ही घूस लेते दिख चुके हैं। दो साल से भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को संभालने वाली फेडरेशन ही वजूद में नहीं है। इन दो सालो में हॉकी टीम के कोच लगातार बदलते रहे। इन सब के बावजूद दिल्ली में हुआ विश्व कप हॉकी प्रेमियों के नए वर्ग को खींचने में कामयाब रहा। पैसा, प्रशंसक और पहचान हॉकी इंडिया की पुरानी प्यास थी जिसे बुझाने कॉरपोरेट जगत, बॉलीवुड और अचानक हॉकी प्रेमी बनी संभ्रात युवाओं की भीड़ नेशनल स्टेडियम पर जुटी। हैरत तो यह देखकर होती है कि भले ही सबसे सस्ते स्टैंड पर कुछ जगह खाली पड़ी हो समाज का दीन-हीन सा दिखने वाले वर्ग हॉकी प्रेमियों की इस भीड़ से तकरीबन नदारद है। देश की सबसे बड़ी दुपहिया कंपनी आयोजन पर करीब 10-12 करोड़ रुपये खर्चती है और पहला मैच जीतने के बाद ही प्रायजकों की तादाद बढऩे लगती है।
वास्तव में हॉकी के साथ हो क्या रहा है? खुद कभी जिंदगी में हॉकी न खेलने वाले कुलीन वर्ग का रूझान बिना ग्लैमर वाली, नाकामी से दबी हॉकी की ओर अचानक कैसे बढ़ा। वह भी इस खेल में भारत का दबदबा खत्म होने के करीब चार दशक बाद। शायद हॉकी की कुडंली अब मार्केटिंग और विज्ञापन पंडितों के हत्थे चढ़ गई है, जो तगड़े उपाय लेकर आए हैं। खासकर मध्य वर्ग के युवाओं में इस खेल को मंनोरंजन के तौर पर बेचने में कामयाब रहे। संदेश साफ है-भले ही आप इस खेल का न खेलें, न समझे और न पढ़े, बस दोस्तों के साथ अच्छा टाइम बीताने स्टेडियम पहुंच जाईये, अपनी टीम के लिए चीखिये-चिल्लाइए, ब्रेक में स्टेडियम के अहाते में सजे खान-पान बाजार के हवाले हो जाएं और चाहे तो मैच के खत्म होने से पहले दिल की र बढ़ी धड़कनें भी नाप लें। इस बीच राष्ट्रीय गीत गाने, राष्ट्रीय खेल के प्रति वफादारी दिखाने और हॉकी बचाओ के नेक खयाल से खुद को जोड़े रखने के भी पर्याप्त मौके हैं। खासकर उस वक्त जब ऐसी हवा बन चुकी हो कि बेचारे हॉकी वाले तो एक-एक पैसे से मोहताज हैं।
पूर्व भारतीय कप्तान जफर इकबाल स्वीकार करते हैं कि जब अस्सी के दशक में वह खेला करते थे, तब से दर्शक वर्ग के चरित्र में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। वह मानते हैं कि कुलीन वर्ग इस खेल को सहारा उस भावना के चलते दे रहा है जो उसे देशभक्त होने, रक्षक की भूमिका निभाने और किसी मकसद में जुटने को प्रेरित करती है। हॉकी के हालात चाहे जो भी हो लेकिन हॉकी की ओर वापस मुड़ते इतने सारे लोगों को देखकर इकबाल गदगद हैं।
हॉकी विश्वकप में बढ़ी उच्च और मध्य वर्ग के लोगों की तादाद में अहम भूमिका आयोजन की मार्केटिंग ने भी निभाई। इस बार टिकट इंटरनेट, यूनियन बैंक की शाखाओं और कैफे कॉफी डे के आउटलेट्स के जरिए बेचे गए। किस तरह की भीड़ को इस बार हॉकी तक लाया जाए इस मामले में रणनीति काफी स्पष्ट थी। भारत टीम के डॉक्टर पी.एस.एम. चंद्रन कहते हैं, 'उच्च मध्यम वर्ग सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि यह विश्व कप था। यह मैच हॉकी के बजाए रग्बी का होता तब भी इनमें से कई लोग आते। भारतीय हॉकी को प्रशंसकों की बढ़ी तादाद कायम रखने के लिए सफलता और सितारों की दरकार है।Ó
इन नए दर्शकों और खेल की बढ़ी पहचान को कायम रखना भारतीय हॉकी के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। कई मायनों में यह साल भारतीय हॉकी के लिए अहम है। पिछले महीने हुए विश्व कप के अलावा इस साल राष्टï्रमंडल खेल और चीन में एशियाई खेल होने हैं। राष्टï्रमंडल खेलों में भारत ने कभी भी पुरुष हॉकी में पदक नहीं जीता है और अगर नाकामयाबी का सिलसिला इस साल भी नहीं टूटता तो हॉकी के प्रति जगे नए जोश और प्रायोजकों के उत्साह को थामना मुश्किल हो जाएगा।
पिछली बार भारत ओलंपिक में क्वालिफाई तक नहीं कर पाया था
पिछले दो साल से बर्खास्त हॉकी फेडरेशन की जगह बनी हॉकी इंडिया के चुनाव होने बाकी हैं। इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन-एफआईएच ने चुनाव कराने के लिए हॉकी इंडिया को 31 मई तक का समय दिया है। गौरतलब है कि राज्य हॉकी संघों के साथ मुकदमेबाजी के चलते यह चुनाव 3 बार स्थगित किया जा चुका है।
अब सवाल है कि हॉकी में कभी नंबर -एक की टीम की रैकिग जब 12 है तो इस स्थिति के बावजूद भारत में विश्वकप का आयोजन क्यों हो रहा है। तो, इसका फैसला फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल हॉकी करता है। ऐसे में एफआईएच ने यह भी माना लिया है कि क्रिकेट के जरिये बेशुमार कमाई का ठिकाना बना बाजार बना भारत विश्व हॉकी के लिए भी अलादीन का चिराग के खिलाडिय़ों का भी जीर्णोद्धार हो सकता है। दरअसल, भारत में हॉकी को फिर से जिंदा करने की जितनी ललक भारत में हॉकी के कर्ताधर्ताओं में है उससे कहीं ज्यादा उत्साह इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन-एफआईएच दिखा रहा है। इसकी वजह भी साफ है। इस विश्व कप में फेडरेशन ने करीब 25 करोड़ रुपये की कमाई की। फेडरेशन इतनी कमाई आमौतर पर तीन विश्व कप के आयोजन से भी नहीं कर पाता है। वर्ष 2016 तक अपनी आमदनी को तीन गुना बढ़ाने के लक्ष्य को देखते हुए एफआईएच ने हर साल एक टूर्नामेंट भारत में कराने का फैसला किया है।
लेकिन इस विश्वकप से यह अहसास हो रहा है कि हॉकी ने एक बार फिर वापसी कर ली है। भारत का पहला ही मैच चिर प्रतिद्वंद्वीं पाकिस्तान से था, जिसे देखने स्वाभाविक तौर पर भीड़ उमड़ी। इस मैच में पाकिस्तान को हराकर भारतीयों की होली की खुशियां खिलाडिय़ों ने दोगुनी कर दीं। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और इंग्लैंड से भारत हारता गया, बावजूद इसके दर्शकों की संख्या और उत्साह में कमी नहीं आयी। लोग भारत के बाहर होने के बावजूद अच्छी हॉकी देखने के लिए स्टेडियम में जुटे।
वर्ष 1975 विश्व कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक खोल दागने वाले मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार कहते हैं कि इस विश्व कप में जो माहौल बना वह शुभ संकेत है लेकिन हॉकी इंडिया अभी भी कामचलाऊ व्यवस्थाओं के हवाले है। प्रदर्शन न सुधरा तो माहौल ठंडा होने में समय नहीं लगेगा। देखना है कि कब टीम इंडिया हॉकी के प्रति नई दिवानगी को अमर प्रेम में बदल पाती है या फिर यह 'छोटी सी लव स्टोरीÓ यहीं खत्म हो जाएगी।
सदन में आनन फानन
महंगाई को लेकर संसद में चर्चा किस नियम के तहत की जाए इस मुद्दे पर भले ही संसद में घंटों काम-काम ठप्प रहे लेकिन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करना यहां सेकंडो का खेल है। अंदाजा लगाईए, 60 सेकंड में क्या-क्या हो सकता है? संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में लोकसभा ने 60 सेकंड में 3 विधेयको को पारित करने का कारनामा कर दिखाया। इनमें से एक कानून तो मंत्रियों की तनख्वाह और भत्तों में संशोधन के बारे में था तो जाहिर है वक्त कहां लगना था। इस फुर्ती को देखकर तो शायद 2 मिनट में तुरंत नूडल्स बनाने का दावा भी हल्का पड़ जाए। अहम कानूनों पर सार्थक बहस के घटते वक्त और हावी होते शोरगुल, विरोध की भेंट चढ़ती संसद की कार्रवाई के चलते लोकतंत्र की अहम रवायत औपचारिता बनती जा रही है।
पिछले शीतकालीन सत्र में 8 विधेयक ऐसे थे जो 3 मिनट से भी कम समय में पारित हो गए। इनमें उच्च न्यायालयों के व्यवसायिक प्रभागों की स्थापना, राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कानून में विशेष प्रावधान शामिल करने और ट्रेड मार्क संंबंधी कानून में संशोधन से जुड़े विधेयक शामिल थे। संसद की कार्यवाही पर शोध करने वाले नीति शोध संस्थान पीआरएस के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1956 के बाद से संसद सत्र के दिनों की संख्या लगातार घटती जा रही है। वर्ष 1956 में जहां रिकॉर्ड 151 दिन लोकसभा चली वहीं पिछले दो दशक में यह आंकड़ा 100 दिन भी नहीं छू पा रहा है। तारांकित सवालों के जवाब देने के मामले में तो लोकसभा का प्रदर्शन बेहद बुरा रहा है। वर्ष 2009 के दौरान लोकसभा में करीब 1100 सवाल पूछे गए जिनमें से सदन में सिर्फ 266 यानी 24 फीसदी ही समय पा सके। इन 266 सवालों का जब सदन में नंबर आया तो इनमें से 57 सवालों को पूछने वाले सांसद ही नदारद थे। इस तरह सिर्फ 209 यानी करीब 19 फीसदी सवालों का जवाब ही दिया जा सका। पिछले पांच साल से लोकसभा में पूछ जाने वाले सवालों की संख्या भी तेजी से गिरी है। वर्ष 2005 में जहां लोकसभा में करीब 1600 सवाल पूछे गए थे जबकि वर्ष 2008 में करीब 900 सवाल ही दाखिल किए गए। हाल ही में राज्यसभा ने ऐसा नियम बनाया है कि सांसद की गैरमौजूदगी के बावजूद कोई भी तारांकित सवाल बगैर जवाब के न रह जाए।
हालांकि आनन-फानन में महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने का सिलसिला नया नहीं है लेकिन सरकार और प्रशासन के कामकाज में सुधार की कवायतो के दौर में इस मोर्चे पर बद से बदतर होती स्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्यसभा सदस्य और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी कहते हैं कि यह बहुत अलोकतांत्रिक और पिछड़ेपन को दर्शाने वाला रूझान है। संसद में सार्थक बहस के गैर मौजूदगी पर येचुरी का मानना है कि इससे सांसदों के प्रभुत्व को नुकसान पहुंच रहा है।
लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का मानना है कि तकनीकी तौर पर किसी विधेयक के बगैर चर्चा पारित होने में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है। लेकिन यह स्वस्थ परंपरा नहीं है। लोकसभा के एक अन्य पूर्व महासचिव योगेंद्र नारायण सिंह कहते हैं कि अगर किसी विधेयक पर चर्चा नहीं होती तो इससे बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह यह है कि संसद की स्थायी समिति हर विधेयक का बारीकी से अध्ययन करती है। विभिन्न पार्टियों के सांसदों वाला यह दल विधेयक का गहन विश्लेषण कर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपता है।
हालांकि संसद में पेश होने वाले सभी विधेयकों पर हमेशा बहुत ज्यादा बहस की गुजाइंश नहीं होती। जैसे की राष्टï्रीय रोजगार गांरटी योजना के नाम में पहले महात्मा गांधी शब्द जोडऩे संबंधी विधेयक। लेकिन कई भी ऐसे जरूरी विधेयक हैं जो संसदीय पैनल के पास विचार के लिए नहीं जाते। उदाहरण के तौर पर नागरिक सुरक्षा संशोधन विधेयक 2009 संसदीय पैनल के पास नहीं गया था। इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है जो सांसद किसी खास विधेयक पर विचार करने वाली स्थायी समिति के सदस्य नहीं हैं, उनकी विधेयक पर अलग राय रखना चाहते हों। इसके अलावा सरकार विधेयक पर संसद की स्थायी समिति की सभी सिफारिशों को मानने के लिए भी बाध्य नहीं होती। येचुका का कहना है कि विधेयक पर अगर स्थायी समिति के सुझाव का स्वीकार नहीं किया जाता तब भी इसकी वजह पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।
विधेयकों के लंबे-चौड़े ड्राफ्ट और पेंचीदा नीतिगत मामलों की गहराई में जाना सभी संसद सदस्यों के लिए भी आसान नहीं होता। नीतिगत शोध के लिए सांसदों को मदद करने के अभियान डेमोक्रेसी कनेक्ट की निधि प्रभा तिवारी कहती हैं कि जन नेता सामाजिक बदलाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं लेकिन अक्सर विकास के मुद्दों में उनकी रूचि के बावजूद जरूरी जानकारियां और तथ्य जुटाकर संसद के अंदर और बाहर तार्किक बहस को आगे बढ़ा पाने में नाकाम रहते हैं। लोकसभा का एक सांसद 10-20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, विकास के मुख्य मुद्दों पर उसकी जानकारी का स्तर बढ़ाए बिना हमें संसद में रचनात्मक माहौल नहीं दिखेगा।
राष्टï्रीय लोकदल के युवा सांसद और लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ग्रेजुएट जयंत चौधरी कहते हैं कि विधेयकों और नीतिगत मामलों को गहराई से समझने के लिए समर्थक व्यवस्था जैसे रिसर्च टीम का होना एक बड़ी जरूरत है। इसके अभाव में कई ऐसे सांसद जो स्थानीय लोगों और मुद्दों से बखूबी जुड़े हैं संसद के अंदर वैसा योगदान नहीं कर पाते। जयंत कहते हैं कि अपनी पार्टी में ऐसी व्यवस्था स्थापित करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल इस बात से सहमति जताते हैं कि जल्दबाजी में विधेयकों का पारित होना कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन साथ ही तर्क देते हैं कि वैधानिक कामकाज के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या विधेयकों को पारित करने में जल्दबाजी शोर शराबे और हल्ले-गुल्ले में व्यर्थ गए समय का उचित जवाब है? जाहिर है कि संसद में कामकाज के दिनों की संख्या बढ़ाना पहली जरूरत है। इसके अलावा सत्ता और विपक्षी दलों को भी यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि उनके ज्यादा से ज्यादा सांसद संसद की कार्यवाही को गंभीरता से ले और सक्रिय भूमिका निभाए।
पानी पर तैरता रेतीला शहर
रेगीस्तान, सूखे और पानी की किल्लत वाले राजस्थान में भूजल को लेकर उलटबांसी सरकार के लिए सिरदर्द बन चुकी है। जहां एक ओर पूरे प्रदेश में भूजल का गिरता स्तर समस्या है वहीं पानी में डूबी जोधपुर के पुराने शहर की इमारतों की नींव नई नई मुसीबत बनकर खड़ी हैं। हैरानी की बात यह है कि यह स्थिति किसी बारिश या बाढ़ की वजह से नहीं बल्कि जमीन से अचानक निकलते पानी की वजह से हुई है। जोधपुर में भूगर्म की यह गुत्थी हॉलीवुड फिल्म 2012 की याद दिलाती है जिसमें भूगर्भ की परतों के गर्म होकर पिघलने दुनिया का हुलिया ही बदलने लगात है, लेकिन इस फिल्म के मुकाबले काफी छोटे पैमाने पर भूजल स्तर में हुए इस बड़े बदलाव को काबू करने के सरकारी प्रयास भी कम दिलचस्प नहीं हैं। जलस्तर बढ़ता दिखा तो सरकार ने ट्यूबवैल लगाकर दिन-रात पानी जमीन से बाहर निकाल फेंकने का काम छेड़ दिया। और नतीजा, पानी से लबालब रेतीला शहर।
जोधपुर में जलस्तर के बढऩे का यह सिलसिला करीब एक दशक से चल रहा है। शहर के करीब आधे इलाके में पानी भूमि से महज कुछ ही सेंटीमीटर नीचे है। हालात यह है कि शहर में कई इलाके तो ऐसे हैं जहां हल्की सी खुदाई पर पानी निकल आता है। राजस्थान के बाकी इलाकों में जहंा जलस्तर 2-3 मीटर सालाना की दर से नीचे जा रहा है वहीं जोधपुर में सालाना 1 से 1.5 मीटर जलस्तर बढ़ रहा है।
इस अजीब घटना की वजह की पड़ताल में जुटे राष्टï्रीय जलविज्ञान संस्थान एनईएच रूड़की के डॉ. एन.सी. घोष ने आउटलुक को बताया कि अभी इस पूरे मामले पर शोध चल रहा है और फिलहाल किसी नतीजे तक नहीं पहुंचे हैं। जोधपुर के विभिन्न इलाकों से भूजल संबंधी आंकड़े लिए जा रहे हैं जिनके गहन विश्लेषण के बाद ही पता चलेगा कि आखिर वजह क्या है। जोधपुर में एक भूजल स्तर में बढ़ोतरी की बात को स्वीकार करते हुए डॉ. घोष बताते हैं कि जिस जोधपुर में पहले भूजल का स्तर 20 से 30 फीट था वहां अब 2 फीट पर भी पानी निकल रहा है। इसकी वजह से लोगों को बेसमेंट में पानी आने जैसे दिक्कतें आ रही हैं। भूजल स्तर बढऩे की संभावित वजह के बारे में डॉ. घोष कहते हैं कि पहले जोधपुर की जनता पेयजल के लिए भूजल पर निर्भर थी लेकिन सन 1997 के बाद जब से दांयी राजीव गांधी नहर का पानी जोधपुर पहुंचा है भूजल का इस्तेमाल बंद हो गया है और पेयजल के लिए बाहरी स्रोतों से आने वाला पानी इस्तेमाल हो रहा है। हो सकता है कि इससे भूगर्म में पानी का संतुलन बिगड़ा और पानी पहले की तरह बाहर न निकलने की वजह से बढ़ता गया। मौजूदा समय में शहर को पेयजल आपूर्ति करने वाली कायझाना और ताख्तसागर झील में बाहर से पानी की आपूर्ति कई गुना बढऩा भूजल स्तर बढऩे की मुख्य वजह माना जा रहा है। दरअसल जमीन के भीतर पानी विभिन्न भू-परतों के बीच तालाब की तरह इक_ïा रहता है और इसकी आपूर्ति व निकासी के बीच संतुलन बिगडऩे से इस प्रकार जलस्तर बढऩा संभव है। नहर के आसपास के क्षेत्रों में भी इसी तरह से जल स्तर बढ़ता है। लेकिन फिर भी जोधपुर जैसा मामला आम बात नहीं है।
कई विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए सूखे इलाके के इस शहर में अचानक बढ़ी जल आपूर्ति, पानी की लाइनों में लीकेज और पर्याप्त जलनिकासी के इंतजाम न होने को भी जिम्मेदार मानते हैं। इसे देखते हुए जोधपुर विकास प्राधिकरण ने शहर में जमीन के भीतर निर्माण यानी बेसमेंट आदि पर पहले ही रोक लगा दी है। जोधपुर के भूर्गशास्त्री बी.एस. पालीवाल का कहना है कि इमारतों के बेसमेट में दिख रहा यह पानी भूगर्भ की परतों से ऊपर आया पानी नहीं बल्कि पुरानी पड़ चुकी पानी की लाइनों के रिसाव का नतीजा है। दरअसल जोधपुर में सन 1936 से घरों तक पानी पहुंचाने के लिए लाइनें बिछाने का काम शुरू हुआ था और पूरे शहर में करीब 1600 किलोमीटर लंबाई की पानी ले जाने वाले पाईपों का जाल बिछा है। कई लोगों का मानना है कि पुरानी पड़ चुकी इस लाइन में रिसाव के चलते ही पानी जमीन की ऊपरी परत में इक_ïा हो रहा है।
मकानों की बुनियाद तक आ पहुंचे पानी से निबटने के लिए तमाम तरह की मशक्कतें की जा रही है। जोधपुर की प्रमुख झील कायझाना झील और प्रमुख तालाबों तख्त सागार, गुलाव सागार, फतेह सागार और लाल सागर के अलावा समेत करीब 60 कुएं-बावडिय़ों से ट्यूबवैल के जरिए पानी बाहर निकाला जा रहा है। इस तरह रोजाना निकलने वाले करीब 20 एमएलडी यानी करीब 2 करोड़ लीटर पानी को संभालना भी चुनौती साबित हो रहा है। इस 20 एमएलडी पानी को शुरू में किसी तरह सीवर लाइन के जरिए शहर से बाहर निकाला गया। लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल खेती और शहर के बागीचों को हरा-भरा करने की कवायदे शुरू हुई। इस बीच सीमा सुरक्षा बल और रेलवे ने इसमें से कुछ पानी लेने लगे हैं।
इस स्थिति से हैरान स्थानीय व्यपारी हरीश कुमार बताते हैं कि ऐसा लगता है जैसे शहर पानी के ऊपर तैर रहा हो। इमारतों की नींव पानी की वजह से कमजोर पड़ रही हैं और हादसे का खतरा खड़ा है। हरीश के मुताबिक, मैंने अपनी दुकान के बेसमेंट से पानी निकालने के लिए 4-5 पंप लगाए वरना वहां 5 फीट पानी जमा हो गया था। मुझे लाखों का नुकसान हो गया। हालांकि नींव में पानी कई साल से रिस रहा है लेकिन पिछले साल अचानक पानी की मात्रा बढ़ गई। जमीन से निकल आए पानी के चलते अदालत परिसर में वकीलों के 40 चेंबरों को छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। पुराने शहर के इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। मेहरानगढ़ किले के पास पुजारी को पानी में खड़े होकर पूजा करने की नौबत आ गई।
भूजल विभाग के मुख्य अभियंता उपदेश करन माथुर कहते हैं कि जहां भूजल का स्तर बहुत ज्यादा है वहां ट्यब वैल लगाकर पानी निकालने के अलावा यूकेलिप्टस जैसे पेड़ भी लगाए जा रहे हैं जो पानी को ज्यादा सोखते हैं। हालांकि इस बढ़े जलस्तर ने जल्द ही हरित राजस्थान की उम्मीदें भी जगा दी हैं्र। लगातार पंपिंग के जरिए पानी बाहर निकालने की कोशिशों का थोड़ा बहुत असर भी देखने को मिला है। स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि खरबूजा बाव$ड़ी क्षेत्र में 90 सेंटीमीटर, बाईजी का तालाब क्षेत्र में 55 सेंटीमीटर, फतेहसागर क्षेत्र में 13 सेंटीमीटर तथा लक्ष्मीनगर क्षेत्र में 7 सेंटीमीटर तक पानी नीचे उतरा है।
जैसा कि पी. साईनाथ अपनी किताब का शीर्षक दे चुके है-अच्छा सुखाड़ सबको पसंद है। जोधपुर के इस संकट में भी सरकारी अधिकारियों ने करोड़ों की लागत वाली लंबी-चौड़ी योजनाएं बना ली हैं। मामले की वैज्ञानिक पड़ताल के लिए करीब 88 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। जमीन से पानी बाहर निकलाने के लिए 12.27 करोड़ रुपये की योजना बनी थी जिसमें से करीब 4 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। राष्टï्रीय जलविज्ञान संस्थान को इस मामले पर अपनी रिपोर्ट राजस्थन सरकार को मार्च में सौंपनी है। बाड़मेर की बाढ़ के बाद अब जोधपुर की जड़ों का पानी राजस्थान में बरसों की प्यास को किसी अजूबे की तरह बुझाता रहेगा।
बारी परीक्षा के इम्तिहान की
दिल्ली के मशहूर ट्यूशन सेंटर अग्रवाल क्लासेज पर दोपहर बाद जुटाने वाली नवीं-दसवीं के छात्रों की भीड़ स्कूल की थकान के साथ-साथ उत्सुकता और शंका से भी लदी है। बोर्ड परीक्षा के तनाव की बात आते ही ट्यूशन लेने पहुंचे संस्कृति स्कूल में दसवीं के छात्र चंद्रन बताते हैं, पिछले साल उनके बड़े भाई को बोर्ड एगजाम में 92 फीसदी अंक मिले, फिर भी क्लास में उसका 48वां स्थान था। अब चंद्रन उन 8 लाख छात्रों में शामिल हैं जो 2010 में बोर्ड परीक्षा तो देंगे लेकिन अंकों के स्थान पर ग्रेड पाएंगे। चंद्रन सरकार के इस फैसले को सुकून मिलने की उम्मीद तो जताते हैं। केंद्र सरकार के परीक्षा सुधार मुहिम ने एक साथ कई बदलावों को न्यौता दे दिया है। जिनके बीच असल सवाल बार-बार सिर उठा रहा है कि क्या वाकई अंकों की जगह ग्रेड, साल की जगह सेमेस्टर, बोर्ड परीक्षा की जगह साल भर चलने वाली मूल्यांकन की नई व्यवस्था जिसे कॉन्टीन्यूअस कॉप्रीहेन्सिव इवेल्यूएश-सीसीई यानी सतत और समग्र मूल्यांकन नाम दिया गया है, मिलकर परीक्षा का खौफ मिटा पाएंगे? और अगर प्रतिभा के सबूत के तौर पर परीक्षा कराने और ग्रेड के साथ-साथ अंकों में रिजल्ट पाने की छूट मिलेगी तो गलाकाट प्रतिस्पर्धा से उपजा तनाव कैसे कम होगा?
दसवीं बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने के मुद्दे पर राज्यों के तीखे विरोध के बाद परीक्षा सुधार की केंद्र सरकार की कवायद सिर्फ सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंड्री एजुकेशन-सीबीएसई स्कूलों तक सिमट गई है। अपने 100 दिन के एजेंड के वादे के मुताबिक, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्ब्ल ने इन परीक्षा सुधारों को लागू करने का एलान तो किया लेकिन सुधारों पर पूरी बहस और आमराय के बगैर ही आगे बढ़ाते दिख रहे हैं। दिल्ली के सभ्रांत स्कूल के समर्थन से शुरू हुए आम सहमति बनाने के सिलसिले में सिब्बल ने अपनी जरूरत के मुताबिक बाकी आम सहमति हासिल करने को भी ज्यादा वक्त नहीं दिया।
जल्दबाज मंत्री के लेबल और सुधारों पर उठ रहे सवालों से सिब्बल भी अनजान नहीं है। दसवीं बोर्ड परीक्षा 2011 से पूरी तरह समाप्त हो जाएगी जबकि 2010 में बोर्ड परीक्षा तो होगी लेकिन अंकों के बजाए ग्रेड दिए जाएंगे। कपिल सिब्बल का कहना है कि साल में एक दिन इम्तिहान के आधार पर जिदंगी का फैसला करने के बजाए साल भर पढऩे, सीखने और क्या सबक लिया इसे परखने की व्यवस्था लाई जा रही है। जो निश्चित तौर पर बोर्ड एग्जाम के हौव्वे को कम करेगी। किसी एक परीक्षा में सफलता के आधार पर कॅरियर की दिशा तय करने का रवैया छोडऩा होगा।
अब ग्रेडिंग के साथ-साथ अगर छात्र चाहे तो उसका रिजल्ट अंकों में भी बताया जा सकेगा और अगर दूसरे स्कूल में दाखिले के लिए दसवीं पास के सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है तो उसकी मांग पर लिखित परीक्षा हो सकती है। इस परीक्षा इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन भी दी जा सकेगी। गौर करने वाली बात यह है कि 2011 में बोर्ड परीक्षा की जगह सतत मूल्याकंन की जो नई व्यवस्था लाई जा रही है, उसकी शुरूआत अभी कक्षा 9 में पढ़ रहे छात्रों के लिए अक्टूबर 2009 से होनी है। यानी कपिल सिब्बल के एलान और नई मूल्यांकन व्यवस्था की शुरूआत में महीने भर का फासला भी नहीं है।
सिब्बल की कथित जल्दबाजी से उपजी इस कठिनाई का असर मेरठ जैसे कस्बे में भी दिखाई पड़ता है। जहां दसवीं पास की सनद फौज में भर्ती से लेकर विवाह योग्य शिक्षित युवा कहलाने और बंदूक के लाइसेंस में जरूरी दस्तावेजों के तौर पर काम आती है, सिब्बल के एगजाम रिफार्म को लेकर प्रतिष्ठिïत इंगिलश मीडियम सीबीएसई स्कूलों में कई तरह की शंकाएं हैं। सीबीएसई से जुड़े मेरठ के प्रेसीडेंसी स्कूल के प्रधानाचार्य जी.पी. सिन्हा ने आउटलुक को बताया कि सबसे ज्यादा मुश्किल एगजाम ऑन डिमांड यानी छात्र की मांग पर परीक्षा से हो सकती है। दसवीं की परीक्षा देने वाले और इसे छूट का फायदा उठाने वाले छात्रों के दो ग्रुप क्लास में बन जाएंगे। शिक्षक के लिए इन दोनों ग्रुप की जरूरतों को समझना मुश्किल होगा। सिन्हा के मुताबिक, सीबीएसई की तरफ से अभी तक नई व्यवस्था के बारे में स्कूलों को किसी तरह के निर्देश नहीं मिले हैं।
कक्षा नौ के छात्रों के लिए इस साल अक्टूबर से शुरू होने वाले सतत मूल्यांकन पूरी तरह से स्कूल की अपने इंतजाम और शिक्षकों पर टिका होगा। ई2 से ए1 के बीच 9 ग्रेड वाला रिपोर्ट कार्ड स्कूल में तैयार होगा और प्रमाणित होने के लिए सीबीएसई के क्षेत्रीय कार्यालयों में आएगा। अब असंतोषजनक और सुधार की जरूरत दर्शाने वाले ई1 और ई2 ग्रेड के रिजल्ट से पैदा हताशा और कुंठा के बाद बोर्ड नहीं बल्कि स्कूल और टीचर खलनायक बनेंगे।
1993 में लर्निंग विदआउट बर्डन रिपोर्ट के देने वाले प्रोफेसर यशपाल नई कवायद का समर्थन करते हुए कहते हैं-सारे इम्तिहान खत्म कर देने चाहिए। एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण कुमार कहते हैं कि बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने का सुझाव 2005 में बनी राष्टï्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा एनसीएफ की प्रमुख सिफारिशों में से एक है। अगर यह पहल ठीक से लागू हो सकी तो बेशक परीक्षा का मनोवैज्ञानिक दबाव कम हो सकेगा। साल में सिर्फ एक बार परीक्षा हो तो ज्यादा हौव्वा बनता है लेकिन अगर पढ़ाई और परीक्षा साल भर साथ-साथ चलें तो माहौल बदलेगा।
लेकिन दसवीं बोर्ड का हौव्वा खत्म करने की यह कोशिशें जिन परिस्थितियों और जितनी विविधता व विषमताएं वाले स्कूल सिस्टम में हो रही है। शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय अधिवक्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि दसवीं बोर्ड परीक्षा समाप्त करने के बाद संभव है कि छात्र बगैर किसी सार्वजनिक परीक्षा के छात्र 12वीं की दहलीज पर पहुंच जाए और तब पहली दफा बोर्ड परीक्षा देना कहीं ज्यादा दबाव पैदा करे। अग्रवाल के मुताबिक, अध्यापक ने साल भर क्या सीखाया इसका मूल्यांकन भी बेहद जरूरी है, जिसे नजरअंदाज किया गया है। जोधपुर के शिक्षाशास्त्री डॉ. जितेंद्र शर्मा तर्क देते हैं कि अब मूल्यांकन में शिक्षकों की भूमिका बढ़ जाएगी। छात्रों को लगातार सीखने और उनके ज्ञान के अलावा समझ को विभिन्न गतिविधियों के जरिए परखने के लिए ज्यादा तादाद में कुशल शिक्षकों की जरूरत होगी। अलबत्ता, परीक्षा प्रणाली में बदलाव से पहले ही शिक्षकों को प्रशिक्षण देने जैसी तैयारियां होनी चाहिए थी।
नई व्यवस्था के बारे में सीबीएसई चेयरमैन विनीत जोशी बताते हैं कि उसी शैक्षणिक सत्र को दो छमाही यानी सेमेस्टर में बांटकर पूरा मूल्यांकन स्कूल स्तर पर होगा। इसमें विषयों की पढ़ाई के अलावा खेलकूद, अन्य शैक्षिणक गतिविधियों में भागीदारी और छात्र के नजरिए जैसी कई अहम पहलूओं को भी शामिल किया जाएगा। हरेक सेमेस्टर में दो बार पढ़ाई-लिखाई के दौरान मूल्यांकन होगा जबकि एक बार सेमेस्टर के आखिर में क्या सीखा इसकी परख की जाएगी।
अक्सर अपनी उम्मीदों का बोझ बच्चों पर डालने के दोषी अभिभावकों में बोर्ड परीक्षा की जगह लेने वाले नए सिस्टम को लेकर खासी उत्सुकता है। दसवीं के छात्र के पिता और पेशे से आर्किटेक्ट गाजियाबाद के अरविंद भटनागर कहते हैं, जमाना कॉपीटिशन का है और नवीं-दसवीं से उसी के हिसाब से बच्चे तैयारी में जुटते हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के सलेबस और नवीं से बाहरवीं की पढ़ाई के बीच अगर तालमेल नहीं रहा तो भी बच्चों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अग्रवाल क्लासेज में दसवीं के बच्चों को विज्ञान पढ़ाने वाले राधाकृष्ण 10वी के बजाए 12वी की बोर्ड परीक्षा में राहत को ज्यादा जरूरी मानते हैं। राधाकृष्ण के मुताबिक, बोर्ड परीक्षा का डर कम करने की कोशिश में सलेबस को छोटा करने जैसे उपाय भी शामिल होते तो ज्यादा बेहतर रहता।
सिब्बल के इन सुधारों के मुखर आलोचक और राष्टï्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा से जुड़े रहे अनिल सदगोपाल के शब्दों में यह सब सतही कवायदें हैं। बोर्ड परीक्षा के बजाए सतत व समग्र मूल्यांकन का विचार 1986 में नई शिक्षा नीति के समय का है। सतत मूल्यांकन का विचार तो अच्छा है लेकिन भारत में बड़ी तादाद ऐसे स्कूलों की है जहां सतत मूल्यांकन के लिए पर्याप्त शिक्षक व संसाधन मौजूद नहीं हैं। अब जिस तरह से इसे लागू कराया जा रहा है उससे महंगे प्राइवेट और अच्छे सरकारी स्कूल ही इसका फायदा उठा पाएंगे। सदगोपाल सवाल उठाते है कि जिस देश में दो-तिहाई हाईस्कूल ऐसे हो जहां 12वीं की पढ़ाई नहीं होती। अगर इतनी बड़ी तादाद में छात्रों को दूसरे स्कूल में दाखिले की वजह से ऑन डिमांड परीक्षा देने पड़े तो बोर्ड परीक्षा खत्म करने का क्या फायदा।
सीबीएसई के 11000 से ज्यादा स्कूलों के करीब 8 लाख से ज्यादा छात्र इस चर्चित बदलाव से गुजरने जा रहे हैं। छात्रों और उनके अभिभावकों में बोर्ड परीक्षा से निजात से ज्यादा बैचेनी इस बात को लेकर भी है कि अब क्लास में अव्वल आने के लिए उन्हें क्या-क्या करना होगाï? होनहार, होशियार और समझदार अच्छे बच्चे कहलाने के नए मापदंड क्या होंगे? सफलता और हताशा के बीच 90.1 और 90.2 फीसदी जितनी संकरा फासला खड़ा कर चुके पेरेंट्स, टीचर और एडमिशन कट ऑफ के सामने 81 से लेकर 90 फीसदी अंक लाने वालों को एक ही कटेगरी में देखना नया तजुर्बा होगा।
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