2.8.09

शिक्षा के अधिकार विधेयक में खामियों की भरमार

नई दिल्ली. राज्यसभा में पास हो चुके मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार विधेयक को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। प्रस्तावित कानून में खास सरकारी स्कूलों जैसे केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों को पूरी तरह शिक्षा के अधिकार के दायरे में नहीं रखा गया है। इन स्कूलों में सिर्फ 25 फीसदी सीटों पर शिक्षा के अधिकार के तहत समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी। मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिलाने पर आने वाले खर्च और जवाबदेही को लेकर प्रस्तावित कानून में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई हैं। इसे लेकर प्रस्तावित कानून की आलोचना हो रही है। शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल प्रस्तावित कानून को शिक्षा का अधिकार छीनने वाला कानून करार देते हुए कहते हैं कि इसके जरिए स्कूलों की विभिन्न श्रेणियों को वैधानिक मान्यता दी जा रही है। कानून में स्कूलों की चार श्रेणियां बनाई गई हैं। केंद्रीय विद्यालय, सैनिक स्कूल और नवोदय विद्यालयों को विशेष श्रेणी के स्कूलों का दर्जा दिया गया है। इन स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों की तरह सिर्फ 25 फीसदी सीटें शिक्षा के अधिकार के तहत उपलब्ध होंगी। ऐसे प्रावधान कर बहु-परती व भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को बरकरार रखा जा रहा है। सद्गोपाल के मुताबिक, राज्यसभा में पास हुए विधेयक में और भी कई आपत्तिजनक प्रावधान हैं, जिनमें छह साल से कम उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा के अधिकार के दायरे से बाहर करना प्रमुख है। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा क्या होगी यह भी सरकार तय करेगी जबकि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। सद्गोपाल के मुताबिक, देश में 6 से 14 साल की उम्र के करीब 20 करोड़ बच्चे हैं, जिनमें से 4 करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनमें से सिर्फ 25 फीसदी यानी 4 करोड़ में से सिर्फ एक करोड़ बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार मिल पाएगा। शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा के अधिकार के लिए कानून बनना अच्छा कदम है, लेकिन प्रस्तावित कानून के कई प्रावधान संविधान में दिए गए समानता, सामाजिक न्याय और शिक्षा के अधिकार के खिलाफ हैं। अच्छे सरकारी स्कूलों और सामान्य स्कूलों को अलग-अलग श्रेणी में रखकर सरकार खुद शिक्षा के आधार पर भेदभाव को बढ़ाने का काम कर रही है।

24.5.09

दिल्ली से ब्लूलाइन की विदाई शीघ्र

राजधानी दिल्ली में ब्लूलाइन बसों को अलविदा कहने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। दिल्ली सरकार ने बस मार्गे को समूह में बांटकर प्राइवेट ऑपरेटर को ठेके पर देने की शुरूआत कर दी है। प्रयोग के तौर पर 30 मार्गे पर बसों के संचालन का जिम्मा स्थानीय कंपनी स्टारलाइन बस सर्विस को दिया है। इस करार पर आगामी 26 मई को सरकार और कंपनी के बीच करार होने जा रहा है। परिवहन विभाग के अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, सभी 657 बस मार्गे को 17 अलग-अलग इलाकों में बांटकर बसों के संचालन प्राइवेट कंपनियों को दिया जा रहा है। योजना के तहत सबसे पहले दक्षिण व मध्य दिल्ली के 32 रूट को प्राइवेट ऑपरेटर को दिया जाना है। इसके लिए कुल 7 कंपनियों ने टेंडर भरे थे जिनमे से स्टारलाइन का चयन हुआ है। कंपनी को ऑफर लेटर दिया जा चुका है। इन 32 रूटों पर बसें चलाने के लिए आगामी 26 मई को कंपनी और सरकार के बीच औपचारिक करार होना है। करार के तहत स्टारलाइन को 5 करोड़ रुपये बतौर गारंटी मनी जमा करने होंगे। स्टारलाइन बस सर्विस फिलहाल दिल्ली में ब्लूलाइन बसें चलाने के अलावा टूरिस्ट कैरेज सर्विस भी देती है। कंपनी अंबेडकर नगर, मूलचंद, लाजपत नगर, निजामुद्दीन, ओखला, मोरी गेट, लाल किला, कमला मार्केट, आनंद पर्वत, आनंद विहार, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, जेएलएन स्टेडियम, वसंत कुंज, मिंटो रोड, धौलाकुंआ और बदरपुर बॉर्डर के इलाकों से गुजरने वाले मार्गो पर बस चलाएगी। इसके लिए कंपनी को 300 से ज्यादा बसों की जरूरत होगी।

मुनाफे पर नजर रख नई रणनीति बनाने में जुटे डेवलपर्स

बदले आर्थिक माहौल में रियल एस्टेट कंपनियां अपने प्रोजेक्ट को लेकर नए सिरे से रणनीति तय करने में जुट गई हैं। व्यावसायिक इस्तेमाल वाली इमारतों की मांग में कमी, अपेक्षाकृत सस्ते मकानों की मांग और फंड की किल्लत के चलते रियल एस्टेट कंपनियों को अपनी रणनीति में बदलाव करने पड़ रहे हैं। इसके चलते डेवलपर्स की ओर से लैंडयूज (भू-उपयोग) में बदलाव की कोशिशों में भी तेजी दिखी है। जमीन के प्रस्तावित इस्तेमाल को बदलने के सिलसिले में सेज परियोजनाएं मुख्य हैं। देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ लिमिटेड आईटी और बीपीओ कंपनियों के दफ्तर की मांग में कमी को वजह बताते हुए चार आईटी सेज की मंजूरी वापस लेने की मांग कर चुकी है। उधर, नई दिल्ली में डीएलएफ के आईटी सेज की जगह भी हाउसिंग प्रोजेक्ट आ सकता है। नोएडा में 5000 करोड़ रुपये में भूखंड खरीद कर धूम मचाने वाले बीपीटीपी डेवलपर्स ने भी माहौल को देखते हुए प्लॉट का बड़ा हिस्सा वापस करने का फैसला किया है। बाकी बचे छोटे हिस्से पर अब होटल बनाने की योजना है। नोएडा अथॉरिटी ने भी बदले माहौल में डेवलपर्स को लैंडयूज बदलने और सौदा वापस करने के मामलों में कई तरह की छूट दी है। लैंडयूज और योजनाओं में बदलाव के अलावा फंड जुटाने के लिए भी डेवलपर्स की कोशिशें लैंड बैंक पर आ टिकी हैं। डीएलएफ नॉन-स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट और जमीन से बाहर होने की घोषणा कर चुकी है। देश भर में बड़े पैमाने पर होटल प्रोजेक्ट डेवलपर्स की बदली रणनीति से प्रभावित हुए हैं। अगले सात वर्षे में देश भर में करीब 100 होटल खोलने जा रही पाश्र्वनाथ डेवलपर्स ने इन प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण का काम रोक दिया है। रिटेल प्रॉपर्टी के बजाय सस्ते मकानों की बढ़ती मांग की वजह से भी कई डेवलपर्स लैंडयूज में बदलाव करने में जुट गए हैं। मेरठ के प्रमुख गाडविन ग्रुप के एमडी जितेंद्र सिंह बाजवा का कहना है कि हाल ही में कई मॉल्स की बुरी दशा देखकर उन्होंने मॉल बनाने का इरादा छोड़कर मध्य वर्ग के लिए मकान बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने वाली दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल कमेटी से मिली जानकारी के मुताबिक डीएलएफ समेत कई नामी डेवलपर्स ने कमर्शियल अथवा रेजीडेंशियल प्रोजेक्ट के लिए मंजूरी मांगी है।

12.5.09

केंद्र-राज्यों की रस्साकशी में फंसी बसों की खरीद

केंद्र सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश के 54 शहरों में 14 हजार नई बसें चलाने में देरी हो रही है। केंद्र सरकार के जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) कार्यक्रम के तहत होने वाली बसों की इस खरीद को राज्य सरकारों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार की ओर से पहली किस्त जारी हो जाने के बाद भी ज्यादातर राज्यों ने बसों की खरीद के ऑर्डर नहीं दिए हैं। जिन चार राज्यों ने ऑर्डर दिए हैं वहां की सरकारों ने बस निर्माताओं को अग्रिम भुगतान नहीं किया है। केंद्रीय शहरी विकास सचिव एम. रामाचंद्रन ने राज्य के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा है कि दूसरे राहत पैकेज में घोषित 14,240 बसों की खरीद की योजना सिर्फ 30 जून 2009 तक खुली है। इसके लिए खरीद के ऑर्डर 31 मार्च 2009 तक दिए जाने थे। उधर, बस निर्माता कंपनियों के संगठन सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (सियाम) का कहना है कि बंगलुरू जैसे एक-दो शहरों को छोड़कर 20 मार्च तक किसी भी शहर के लिए बसों का ऑर्डर नहीं मिला था। ऐसी स्थिति में बस निर्माताओं के लिए 30 जून 2009 तक 14,000 बसों की आपूर्ति कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय मेंविशेष कार्याधिकारी (एमआरटीएस) एस.के. लोहिया की ओर से राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में साफ कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से बसों की खरीद के लिए फंड की पहली किस्त जारी हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकारों के हिस्से का पैसा जारी नहीं किया जा रहा है। बस निर्माता कंपनियों को किसी भी ऑर्डर में अग्रिम राशि का भुगतान नहीं हुआ है। गौरतलब है कि दूसरे राहत पैकेज के तहत इन 14,240 बसों की खरीद के लिए तकरीबन 5000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज दिए गया था। केंद्र सरकार के दबाव के बावजूद अभी तक सिर्फ चार राज्यों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल ने बसों की खरीद के ऑर्डर दिए हैं। वहीं, दूसरी ओर दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात ने अभी तक बसों के ऑर्डर नहीं दिए हैं। कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में जेएनएनयूआरएम को अपनी अहम उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। हालांकि, जेएनएनयूआरएम के तहत केंद्र सरकार सिर्फ 50 फीसदी पैसा ही खर्च करती है। बाकी पैसा राज्य सरकारों और स्थानीय निकाय को खर्च करना पड़ता है। कई राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय कांग्रेस के फ्लैगशिप यानी मुख्य कार्यक्रम में आधा या आधे से ज्यादा पैसा देने से हिचकचा रहे हैं। जिस आक्रामक रुख के साथ कांग्रेस ने भारत निर्माण कार्यक्रम का प्रचार किया है उस वजह से भी कई राज्यों से समर्थन मिलने की गुंजाइश कम हो गई है। इसके अलावा कई स्थानीय निकायों की आर्थिक स्थिति भी आड़े आ रही है।

4.5.09

प्रोमेट्रिक को 200 करोड़ रुपये में ऑनलाइन कैट का ठेका

भारतीय कंपनियों को पछाड़ते हुए अमेरिकी कंपनी प्रोमेट्रिक ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) की प्रवेश परीक्षा को ऑनलाइन कराने का ठेका हासिल कर लिया है। कम्बाइंड एडमिशन टेस्ट (कैट) को 33 साल बाद बगैर पैन और पेपर के आयोजित कराने के लिए इस कंपनी को करीब 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा। इस ठेके के मिलने की पुष्टि होने के साथ ही प्रोमेट्रिक ने अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियोंको बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी है। आईआईएम बेंगलुरू की ओर से कैट के लिए प्रोमेट्रिक के चयन की घोषणा कर दी गई है। इस ठेकेके लिए कितनी धनराशि दी गई इसका खुलासा नहीं किया गया है। कैट ग्रुप के सदस्य और आईआईएम लखनऊ की प्रवेश परीक्षा समिति के चेयरमैन हिमांशु राय ने बिजनेस भास्कर को बताया कि इस बारे में अगले एक दो दिन में आधिकारिक तौर पर जानकारी दी जाएगी। राय ने माना कि प्रोमेट्रिक को ठेका मिलना लगभग तय है। उधर, प्रोमेट्रिककी ओर से बिजनेस भास्कर को भेजे गए ई-मेल में 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 200 करोड़ रुपये में आईआईएम की ओर से कैट को कम्प्यूटराइज्ड करने का ठेका मिलने का दावा किया गया है। प्रोमेट्रिक एजुकेशन टेस्ट कराने के मामले में दुनिया की जानी-मानी कंपनी एजुकेशन टेस्ट सर्विस (ईटीएस) की सहायक कंपनी है, जो विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए जरूरी टोफेल व जीआरई जैसे टेस्ट कराती है। ईटीएस भारत में पहले से ही कई शहरों में टेस्ट सेंटर चला रही है। इसके लिए इसने एनआईआईटी से तालमेल कर रखा है। कैट को ऑनलाइन कराने के लिए कुल 30 कंपनियों ने दावेदारी पेश की थी। अंतिम दौर में चुनी गई 4 कंपनियों में प्रोमेट्रिक के अलावा ब्रिटेन की एक और 2 भारतीय कंपनियां शामिल थी। ब्रिटेन की पियरसन वीयूई और प्रोमेट्रिक के बीच कड़ा मुकाबला था। पियरसन भी जी-मैट नाम की अंतरराष्ट्रीय परीक्षा आयोजित कराती है। बिट्स पिलानी का ऑनलाइन टेस्ट कराने वाली बेंगलुरू की एडुक्यूटी करियर टेक्नोलॉजी और एप्टेक की टेस्टिंग डिवीजन एटटेस्ट की दावेदारी इन दिग्गज कंपनियों के सामने नहीं टिक पाई। उधर, आईआईएम ने ऑनलाइन परीक्षा के लिए एडमिशन टेस्ट फीस में करीब 50 फीसदी तक बढ़ोतरी के संकेत दिए हैं। फिलहाल सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कैट की फीस 1,300 रुपये है। पिछले साल आईआईएम को सिर्फ प्रोस्पेक्टस की बिक्री से ही करीब 22 करोड़ रुपये की आमदनी हुई थी।

बटर ऑयल के आयात से डेयरी उद्योग के सामने नई मुश्किलें

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बटर ऑयल की कीमतों में गिरावट के चलते भारतीय डेयरी उद्योग व दुग्ध उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से बटर ऑयल के आयात का फैसला किया गया है। भारतीय बाजार में जहां घी की कीमतें 180 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास हैं, वहीं विदेश से आयात होने वाले सस्ते बटर ऑयल से बना घी 120-130 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव बेचा जा सकता है। हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय ने दो कंपनियों को 4,000 टन बटर ऑयल के आयात का लाइसेंस दिया है। वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक नोवा ब्रांड घी बेचने वाली स्र्ट्िलग एग्रो इंडस्ट्रीज और करन ब्रांड घी की मालिक करनाल मिल्क फूड्स को 4,000 टन बटर ऑयल के आयात का लाइसेंस मिला है। इसके लिए कृषि मंत्रालय के डेयरी एवं पशुपालन विभाग की सहमति भी मिल गई है। फिलहाल ग्लोबल बाजार में बटर ऑयल का भाव 1500 से 1600 डॉलर प्रति टन यानी 75-80 रुपये प्रति किलो है। इस पर 35.2 फीसदी आयात शुल्क चुकाने के बाद भी आयातित बटर ऑयल से घी बनाकर उसे 120-130 रुपये प्रति किलो के भाव बेचा जा सकता है। यही भारतीय डेयरी उद्योग के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। घरेलू बाजार में घी की कीमत फिलहाल 180 रुपये प्रति किलोग्राम है। ऐसे में घरेलू दुग्ध उत्पादक कीमतों के मामले में विदेश से आए बटर ऑयल का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। यही स्थिति एसएमपी के मामले में भी है। एसएमपी (स्किम्ड मिल्क पाउडर) का घरेलू बाजार में भाव करीब 90 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका भाव 1600 डॉलर प्रति टन (करीब 80 रुपये प्रति किलो) है। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) को 10,000 टन तक एसएमपी के शुल्क मुक्त आयात की मंजूरी मिली है। एनडीडीबी अगर एसएमपी का आयात करने का फैसला करता है तो भी घरेलू उद्योग को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। यूरोपीय संघ की ओर से बटर ऑयल का आधिकारिक न्यूनतम मूल्य 2200-2300 डॉलर प्रति टन तय किया गया है, लेकिन निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए वहां जनवरी से सब्सिडी दी जाने लगी है। डेयरी उद्योग के सामने नई मुश्किलें इसके चलते यूरोपीय निर्यातक 1500-1600 डॉलर प्रति टन के भाव पर बटर ऑयल का निर्यात करने में सक्षम हैं। यूरोपीय संघ की ओर से एसएमपी पर अधिकतम 265 डॉलर प्रति टन और बटर ऑयल पर 750 डॉलर प्रति टन की सब्सिडी दी जा रही है। इसके विपरीत भारत सरकार ने पिछले साल अप्रैल में 10 हजार टन तक एसएमपी पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 15 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी और बटर ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 40 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दिया था। ग्लोबल बाजार में पिछले दो वर्षे के दौरान बटर ऑयल और एसएमपी की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। वर्ष 2007-08 के सितंबर माह में बटर ऑयल के मूल्य 5000-6000 डॉलर प्रति टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे, जो अब गिरकर 1500-1600 डॉलर प्रति टन के स्तर पर आ गए हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से भी 1650-1700 डॉलर प्रति टन की दर से बटर ऑयल का निर्यात किया जा रहा है। मालूम हो कि यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड विश्व के कुल डेयरी निर्यात में तकरीबन 80 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं।

23.4.09

फर्जी डिग्रियों पर ढीला है कानून का शिकंजा

फर्जी यूनिवर्सिटी खोलकर देश के लाखों नौजवानों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले की सजा क्या है? जवाब है- सिर्फ एक हजार रुपये। देश में उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने फर्जी विश्वविद्यालय खोलकर शिक्षा का गोरखधंधा करने वालों के लिए बस इतनी ही सजा का इंतजाम किया है। हैरानी की बात तो यह है कि पिछले करीब 55 साल से छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर जुर्माने की रकम में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ रहा फर्जीवाड़ा और छात्रों से धोखाधड़ी का धंधा ऐसे ही लचर नियम-कायदों की वजह से फल-फूल रहा है। देशभर में कथित तौर पर बगैर-मान्यता प्राप्त कॉलेज खोलने के मामले में इक्फाई यूनिवर्सिटी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे एडवोकेट पी.एस. सिंह बताते हैं कि 1956 में बने यूजीसी एक्ट में फर्जी यूनिवर्सिटी संचालित करने वालों के खिलाफ सजा के तौर पर सिर्फ एक हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। सिंह के मुताबिक उच्च शिक्षा में छात्रों से धोखाधड़ी रोकने के जितने लचर कानून हैं उससे ज्यादा ढील तो नियामक संस्थाओं की ओर से बरती जा रही है। यूजीसी की ओर से जारी की जाने वाली फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची पर सवाल उठाते हुए सिंह कहते हैं कि देशभर से सिर्फ 21 संस्थानों को इसमें शामिल किया गया है। गौरतलब है कि बंगलुरू, हैदराबाद और देहरादून समेत कई शहरों में छात्रों की ओर से इक्फाई यूनिवर्सिटी के खिलाफ गैर-कानूनी तरीके से कॉलेज चलाने को लेकर विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इक्फाई यूनिवर्सिटी पर आरोप है कि वह देशभर में यूजीसी व एआईसीटीई से मान्यता न रखने वाले इंजीनियरिंग और एमबीए के कॉलेज चला रही है। इस बारे में इक्फाई के रजिस्ट्रार को बिजनेस भास्कर की ओर से भेजे गए ई-मेल का सप्ताह भर बाद भी कोई जवाब नहीं मिला है। इक्फाई के अलावा आईएएसई राजस्थान, इलाहाबाद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम-देहरादून भी नियामक संस्थानों से मान्यता को लेकर विवादों में रहे हैं। ऐसे संस्थानों की तादाद सैकड़ों में है जो एआईसीटीई से मान्यता के बगैर एमबीए-बीटेक जैसे कोर्स चला रहे हैं। तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा की नियामक संस्था ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के ढुलमुल रवैये का नतीजा यह है कि तीन साल पहले गैर मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची जारी होने के बावजूद इसमें शामिल 200 से ज्यादा संस्थान धड़ल्ले से चल रहे हैं। हर साल ऐसे फर्जी संस्थाओं के हाथों देशभर के हजारों छात्र का कैरियर बर्बाद होता है। तकनीकी शिक्षा की नियामक संस्था एआईसीटीई सिर्फ संस्थाओं की काली सूची जारी करने और नए संस्थानों को मान्यता देने तक सीमित है। फर्जी विश्वविद्यालयों के मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का रवैया भी सवालों के घेरे में रहा है। गत वर्ष जून में यूजीसी की ओर से आईआईपीएम को फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल किया गया, लेकिन मामला हाईकोर्ट में पहुंचा तो यूजीसी अपना पक्ष भी ठीक से नहीं रख पाई और बाद में संस्थान का नाम फर्जी सूची से हटाना पड़ा। भी टैक्स चुका रही थी। राजू बंधुओं ने वास्तव में खाता-खतौनी प्रणाली में मौजूद खामियों का फायदा उठाया है। उनके काम करने का ढंग यह था कि पहले राजू यह तय करता था कि कितनी झूठी रकम दिखानी है उसके बाद वी श्रीनिवास और अन्य मिलकर उसके लिए फर्जी इनवाइस दिखाते थे। जब इनवाइस तैयार हो जाती थी तब वे उसके लिए रसीद भी फर्जी बनाते थे। श्रीनिवास की कोशिश रहती थी कि यह मामला दूसरों की नजर में न आए। वाईटूके के दौर में भारी मुनाफा कमाने वाली कंपनी सत्यम ने 2002-03 के बाद शेयर बेचना शुरू कर दिया था। 2006 में प्रमोटरों की हिस्सेदारी घटकर 8.5 फीसदी पर आ गई थी।

पेचीदे नियमों में उलझी सेज की रौनक

स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) में मिलने वाली टैक्स सुविधाओं से जुड़े नियमों के पेचीदा होने का खमियाजा सेज डेवलपर्स और वहां जाने की तैयारी कर रही कंपनियों को भुगतना पड़ रहा है। एक तो आर्थिक संकट के चलते सेज में जगह की मांग कम है, दूसरे सेज में जाने के फायदों को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। इसी का नतीजा है कि तेजी के दौर में सेज की होड़ मचाने वाले डेवलपर्स अब इन परियोजनाओं को घाटे का सौदा मान रहे हैं। देश भर में 274 सेज नोटिफाइड हैं, लेकिन सिर्फ 88 सेज में ही उत्पादन शुरू हुआ है। इन 88 में भी जमीन का बड़ा हिस्सा खाली है। सेज में जगह की मांग में कमी देख डेवलपर्स अब सेज प्रोजेक्ट सरेंडर करने का रास्ता चुन रहे हैं। अंसल एपीआई के कार्यकारी निदेशक (मार्केटिंग) आरके जैन ने बिजनेस भास्कर को बताया कि सेज से जुड़े कानूनी प्रावधान पेचीदा हैं। सेज इलाकों में उद्योगों की स्थापना के बाद मिलने वाले फायदों के मामले में भी स्थिति उलझी हुई है। कई मामलों में तो इंजीनियरिंग इकाइयों को सेज में मिलने वाली सहूलियतें सेज के बाहर पहले से मिल रही सुविधाओं से भी कम हैं। जैन के मुताबिक, अंसल के सोनीपत, गुड़गांव और ग्रेटर नोएडा में करीब 140 हेक्टेअर क्षेत्रफल के तीन सेज नोटिफाई हो चुके हैं, लेकिन अभी तक एक भी औद्योगिक इकाई या कंपनी यहां नहीं आई है। सेज को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा और राज्य सरकारों से जरूरी मदद न मिलने की वजह से भी डेवलपर्स को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सेज मामलों से जुड़े कानूनी विशेषज्ञ हितेंद्र मेहता का कहना है कि सेज में टैक्स रियायतों को लेकर स्थिति स्पष्ट कर पाने में सरकार नाकाम रही है। खासतौर पर सर्विस टैक्स को लेकर कंपनियों में असमंजस की स्थिति है। मार्च 2009 में आए सर्विस टैक्स नोटिफिकेशन के तहत सेज यूनिट को मिलने वाली सर्विस टैक्स में छूट के प्रावधान को समाप्त कर इसकी जगह टैक्स रिफंड की व्यवस्था की गई है। यह रिफंड सेज यूनिट को स्थानीय एक्साइज कमिश्नर कार्यालय के जरिए मिलेगा। ऐसे प्रावधान सेज की मूल अवधारणा के खिलाफ हैं और सेज के प्रति लोगों को हतोत्साहित करते हैं। हालांकि इस बीच सेज यूनिट के कांट्रैक्टर को मिलने वाली सुविधाओं का विस्तार कर इसे सब-कांट्रैक्टर तक बढ़ाने जैसे कदम भी सरकार ने उठाएं हैं। मेहता मानते हैं कि छूट के प्रावधानों में कुछ उलझन होने के बावजूद अब भी निर्यातोन्मुख उद्योगों के लिए सेज के ज्यादा किफायती कोई दूसरा क्षेत्र या योजना नहीं है। देश की प्रमुख रियल एस्टेट परामर्शदाता कंपनी जॉन लांग लाशैल मेघराज से जुड़े दिविक ओसवाल का कहना है कि वैश्विक आर्थिक स्थितियों की वजह से भी सेज में जगह लेने वालों की तादाद काफी कम है। बड़ी संख्या में सेज प्रोजेक्ट रोके भी गए हैं। स्थिति यह है कि सेज में जगह पाने की इच्छुक इकाइयों के पास भी बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं। दिविक के मुताबिक, उलझे नियमों के मुकाबले आर्थिक स्थितियों ने सेज को ज्यादा प्रभावित किया है। मध्य प्रदेश में अभी तक 21 सेज प्रोजेक्ट स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन सिर्फ एक में कंपनियों के द्वारा उत्पादन शुरू हो पाया है। मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम इंदौर लिमिटेड के 1113 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित हो रहे मल्टी प्रोडक्ट सेज में अब तक 42 कंपनियों को जमीन आबंटित की गई है और 12 इकाइयों में उत्पादन शुरू हुआ है। इसके अलावा चार प्रोजेक्ट के आधारभूत ढांचे का निर्माण कार्य चल रहा है। ये हैं एमपीएसआईडीसी, मेडीकेप आई.टी. पार्क, पाव्श्र्रनाथ डेवलपर्स का इंदौर स्थित सेज और म.प्र. औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड का जबलपुर स्थित सेज। इनमें अब तक किसी भी कंपनी ने रुचि नहीं दिखाई है। इंदौर क्रिस्टल आईटी पार्क के लिए दो बार टेंडर हो चुके हैं लेकिन बोली लगाने वाली कंपनियां अभी तक आगे नहीं आई हैं। जयपुर के निकट अजमेर रोड पर महापुरा में महिंद्रा एण्ड महिंद्रा द्वारा विकसित किए जा रहे राजस्थान के पहले सेज महिंद्रा वल्र्ड सिटी पर भी पर आर्थिक संकट का साया दिखाई दे रहा है। सेज में विकसित किए जा रहे हैंडीक्राफ्ट जोन में इकाई लगाने के लिए जमीन बुक कराने वाले उद्यमी विश्व बाजार में मंदी और निर्यात में कमी को देखते हुए अब परियोजनाओं को अगले साल तक टालने का मन बना रहे हैं। महिंद्रा वल्र्ड सिटी के बिजनेस डेवलपमेंट हेड अशीष माथुर का दावा है कि इस सेज में आईटी, लाइट इंजीनियरिंग और हैंडीक्राफ्ट जोन में 26 कंपनियों ने इकाई लगाने के लिए अनुंबंध किया है और इन्फोसिस समेत चार कंपनियों ने काम भी शुरू कर दिया है। लेकिन दूसरी तरफ हैंडीक्राफ्ट जोन में इकाई के लिए जमीन बुक कराने वाले संकल्प हैंडीक्राफ्ट के निदेशक गिरीश अग्रवाल का कहना है कि आर्थिक संकट के कारण हैंडीक्राफ्ट निर्यात में गिरावट को देखते हुए मौजूदा इकाइयों को चलाना भी आसान नहीं है। ऐसे में अब वो अगले वर्ष ही सेज में इकाई का काम शुरू करने के बार में सोचेंगे। इसी तरह सेज में हैंडीक्राफ्ट इकाई के लिए दो एकड़ भूमि लेने वाले लक्ष्मी इंटरनेशनल के निदेशक रवि उत्मान का कहना है कि मंदी के मौजूदा दौर में सेज में नई इकाई स्थापित करने की योजना को हमने फिलहाल अगले वर्ष तक के लिए टाल दिया है। (साथ में नई दिल्ली से शशि झा, जयपुर से प्रमोद शर्मा और भोपाल से धर्मेद्र भदौरिया) पर सरकार की नजर में सब कुछ ठीक है नई दिल्ली। सेज को लेकर भले ही सैकड़ों सवाल उठ रहे हों, लेकिन सरकार की नजर में सब कुछ ठीक है। वाणिज्य मंत्रालय के अधीनस्थ सेज और निर्यातोन्मुख इकाइयों के महानिदेशक डा. एल बी सिंघल के मुताबिक सेज के नियमों में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। उनका कहना है कि नए सेज में लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है। सिंघल ने कहा कि सार नियमों का सेज अधिनियम में उल्लेख किया जा चुका है और इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अस्पष्ट कहा जाए। उन्होंने कहा, अगर किसी को ऐसा लगता है कि नियमों या प्रावधानों में कोई बात अस्पष्ट है तो उसे तत्काल मुझसे या वाणिज्य मंत्रालय से संपर्क करना चाहिए।त्न सिंघल ने इसे भी गलत बताया कि सेज में अधिसूचित कई कंपनियां अब गैर-अधिसूचित (डी-नोटिफाई) होने के लिए आवेदन कर रही हैं। उन्होंने कहा, त्नमेरी जानकारी में कहीं से भी ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है। यह जरूर है कि किसी अधिसूचित सेज में अगर कोई गतिविधि शुरू नहीं हुई है या उससे कर छूट का लाभ हासिल नहीं किया गया है तो उसकी ओर से डी-नोटिफाई करने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

रिटेल कंपनियों पर भारी पड़ रहा महंगा कर्ज

वित्त वर्ष 2008-09 की आखिरी तिमाही के लिए रिटेल कंपनियों के वित्तीय नतीजे इस कारोबार की मुश्किलों की तस्वीर पेश करेंगे। साल की चौथी तिमाही में रिटेल कंपनियां भले ही स्टोर किराये कम करवाने में कामयाब रही हों, लेकिन इसका असर बैलेंस शीट पर दिखने में वक्त लगेगा। विशाल रिटेल जैसी रिटेल कंपनियों के सामने तो शुद्ध मुनाफे के बजाय शुद्ध घाटा झेलने का संकट है, जबकि शॉपर्स स्टॉप पिछली तीन तिमाहियों से लगातार घाटा दिखा रही है। बिक्री में बढ़ोतरी और किराये समेत कई दूसरे खर्चे में कटौती के बावजूद उत्तर भारत की प्रमुख रिटेल कंपनी विशाल रिटेल का शुद्ध मुनाफा लगातार कम हो रहा है। मार्केट रिसर्च फर्म एंजल ब्रोकिंग के रिटेल विशेषज्ञ राघव सहगल का आकलन है कि विशाल रिटेल को महंगे कर्ज के चलते शुद्ध घाटा उठाना पड़ सकता है। 31 मार्च को समाप्त तिमाही में विशाल रिटेल की बिक्री से हुई आमदनी तकरीबन 340 करोड़ रुपये के आसपास रह सकती है, लेकिन कर्ज के ब्याज के तौर पर कंपनी को जो भुगतान करना है उससे वह शुद्ध मुनाफे के बजाए शुद्ध घाटे की स्थिति में पहुंच सकती है। इस बारे में विशाल रिटेल के सीईओ अंबिक खेमका का कहना है कि आर्थिक सुस्ती के दौर में कंपनी अगर घाटा दर्ज करती है तो इसमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए। गत दिसंबर माह में समाप्त तीसरी तिमाही में विशाल रिटेल ने 29.57 करोड़ रुपये ब्याज के तौर पर खर्च किए थे जिस वजह से उसका शुद्ध मुनाफा साल भर पहले के 15.5 करोड़ रुपये से घटकर सिर्फ 2.15 करोड़ रुपये रह गया था। सहगल का मानना है कि स्टोर किराये में कमी का असर कंपनी की वित्तीय सेहत पर नजर आने में दो-तीन तिमाहियों का समय लग सकता है। किराये में 20 फीसदी तक की कमी करने वाले रिटेलर को इसके बूते शुद्ध मुनाफे में कुल बिक्री के मुकाबले आधा फीसदी से ज्यादा का फायदा नहीं मिल पाएगा। पिछली तीन तिमाहियों से शुद्ध घाटा झेल रही शॉपर्स स्टॉप की ओर से क्रॉसवर्ड जैसे कई स्टोर बंद किए जाने के बावजूद उसके सामने घाटे को बढ़ने से रोकने की चुनौती है। गत दिसंबर माह में समाप्त तिमाही में कंपनी 20.45 करोड़ रुपये के घाटे में थी, जबकि उसकी कुल बिक्री में बढ़ोतरी देखी गई थी।

खातों में हैं करोड़ों रुपये फिर भी बढ़ा दी फीस

छठे वेतन आयोग के बहाने भारी फीस वृद्धि करने वाले कई स्कूलों के खातों में करोड़ों रुपये जमा हैं। नामी प्राइवेट स्कूलों के खातों में जमा धन से पर्दा उठाने की तमाम कोशिशें अभी तक नाकाम रही हैं। बिजनेस भास्कर की खोजबीन में यह बात सामने आई कि खातों में करोड़ों रुपये होने के बावजूद इन स्कूलों ने बच्चों के मां-बाप पर फीस वृद्धि का बोझ लाद दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट में फीस वृद्धि मामले पर दायर जनहित याचिका में 14 स्कूलों की बैलंेस शीट का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, वर्ष 2004-05 में जी.डी. गोयनका स्कूल के खातों में नेट सरप्लस के तौर पर करीब 2.84 करोड़ रुपये की रकम दिखाई गई है। स्कूल का कुल बैंक बेलेंस भी 2.04 करोड़ रुपये है। इसी तरह अहलोन पब्लिक स्कूल का नेट सरप्लस 6.12 करोड़ व फिक्सड डिपोजिट 1.05 करोड़ रुपये है। बिड़ला विद्या निकेतन का नेट सरप्लस 1.24 करोड़ और फिक्सड डिपोजिट 5.80 करोड़ रुपये है। जनहित याचिका में इनके अलावा जिन स्कूलों के खातों का जिक्र किया गया है उनमें डीएवी पब्लिक स्कूल सरिता विहार, बाल भवन पब्लिक स्कूल मयूर विहार, न्यू एरा पब्लिक स्कूल मायापुरी आदि शामिल हैं। इन सभी के बैंक बैलेंस और सरप्लस के तौर पर बड़ी धनराशि दिखाई गई है। खातों में मौजूद पर्याप्त फंड के बावजूद इन स्कूलों ने छठे वेतन आयोग के मुताबिक अध्यापकों को वेतन देने के नाम पर फीस 500 रुपये महीने तक बढ़ा दी है। दो साल के एरियर का भुगतान करने की वजह से हरक छात्र के अभिभावक पर औसतन 5,000 से 10,000 रुपये का भार पड़ रहा है। मामले पर स्कूलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि स्कूल अपने खातों में मौजूद करोड़ों रुपये के फंड का इस्तेमाल करने के बजाए शिक्षकों के बढ़े वेतन का बोझ अभिभावकों पर डाल रहे हैं। स्कूलों के एकाउंटिंग सिस्टम को गैरकानूनी करार देते हुए अग्रवाल कहते हैं कि कई स्कूल कैपिटल एक्सपेंडिचर और डेप्रीसिएशन के मामले में हाईकोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं। 30 अक्टूबर 1998 को दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संस्थाएं अथवा ट्रस्ट कैपिटल एक्सपेंडिचर और डेप्रीसिएशन के मद में छात्रों से फीस नहीं वसूल सकते। लेकिन जीडी गोयकना स्कूल ने वर्ष 2004-05 में इसी मद में करीब 3.29 करोड़ रुपये चार्ज किए हैं।

24.3.09

शिक्षा कारोबार में भी सेंध लगा रहे हैं विदेशी संस्थान

शिक्षा कारोबार की दिग्गज विदेशी कंपनियां भारत को बड़े बाजार के तौर पर देख रही हैं। वैसे तो भारत सरकार शिक्षा के व्यवसायीकरण को लेकर स्पष्ट नियम-कायदे अब तक नहीं बना पाई है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र की विदेशी कंपनियों ने भारतीय बाजार में सेंध लगाने के रास्ते ढूंढ लिए हैं। विदेशी कंपनियां प्रोफेशनल एजुकेशन से लेकर स्कूल एजुकेशन तक के कारोबार में भारतीय कंपनियों व संस्थाओं से साझेदारी अथवा भारतीय इकाई बनाकर यहां बड़े बाजार में कदम रख रही हैं। सिंगापुर के प्रमुख प्राइवेट एजुकेशन ग्रुप रैफेल एजुकेशन कॉर्प ने इस साल भारतीय बाजार में एंट्री कर ली है। इसके लिए रैफेल ने शिक्षा क्षेत्र की भारतीय कंपनी एड्यूकॉम के साथ साझेदारी की है। इस साझेदारी के तहत दिल्ली, बंगलुरू और मुंबई में रैफेल मिलेनियम इंटरनेशनल नामक डिजाइन इंस्टीट्यूट खोला जा रहा है। एड्यूकॉम और रैफेल एजुकेशन कॉर्प ने मिलकर भारत में कारोबार करने के लिए एड्यूकॉम-रैफेल हायर एजुकेशन लिमिटेड नामक कंपनी बनाई है। इस कंपनी के निदेशक रोहित कुमार का कहना है कि भारत में विश्वस्तरीय शिक्षा देने वाले संस्थानों की कमी है जिसे पूरा करने के लिए प्रमुख शहरों में रैफेल मिलेनियम इंस्टीट्यूट शुरू किए जा रहे हैं। बैचलर और मास्टर प्रोग्राम चलाने वाले इस संस्थान में डिजाइन से जुड़े कोर्स की सालाना फीस तकरीबन पांच लाख रुपये है, जबकि न तो संस्थान और न ही इसके कोर्स को किसी विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त है। बगैर सरकारी मंजूरी के भारत में विदेशी संस्थाओं व कंपनियों के कोर्स चलाने वाले संस्थानों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, लेकिन उच्च व तकनीकी शिक्षा की नियामक संस्थाएं यूजीसी और एआईसीटीई इन पर किसी भी तरह का नियंत्रण कर पाने में नाकाम साबित हुई हैं। स्कूली शिक्षा के कारोबार में भी विदेशी कंपनियां और संस्थाएं इसी तरह की साझेदारी के जरिए उतर रही हैं। दुनिया भर में करीब 100 इंटरनेशनल स्कूल चला रहे दुबई के ग्लोबल एजुकेशन मैनेजमेंट सिस्टम ने अगले तीन साल के अंदर भारत में 50 स्कूल खोलने की घोषणा की है। आस्ट्रेलिया के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के 7 देशों में 15 इंटरनेशनल स्कूल चला रहे ग्लोबल इंडियन फाउंडेशन ने भी अगले 10 वर्षे के दौरान भारत में 80 स्कूल खोलने का ऐलान किया है।

22.3.09

ब्लैकबेरी में बीएसएनएल के आने से तेज होगा प्राइस वार

सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ब्लैकबेरी सेवाएं शुरू करने जा रही है। बीएसएनएल के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक कुलदीप गोयल का कहना है कि कंपनी अप्रैल तक ब्लैकबेरी सेवाएं लांच कर देगी। बीएसएनएल सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, कंपनी को ब्लैकबेरी के लिए जरूरी मंजूरी मिल चुकी है और वह 20 मार्च को चंडीगढ़ में सेवाएं लांच कर देगी। इसके बाद महीने के आखिर तक एमटीएनएल की ओर से भी दिल्ली और मुंबई में ब्लैकबेरी लांच किए जाने की उम्मीद है। उधर, इस नए क्षेत्र में बीएसएनएल की एंट्री और वित्त वर्ष के आखिर में मुनाफा बचाए रखने के लिए निजी टेलीकॉम कंपनियां भी टैरिफ घटाने की तैयारी कर रही हैं। बीएसएनएल की ओर से दी जाने वाली ब्लैकबेरी सेवाओं में 3जी सुविधा के इस्तेमाल की सहूलियत भी होगी। निजी कंपनियों को टक्कर देने के लिए बीएसएनएल ब्लैकबेरी का किफायती टैरिफ पेश करेगी। बीएसएलएल ब्लैकबेरी का न्यूनतम टैरिफ 300 से 400 रुपये के बीच हो सकता है। इसके अलावा सेवाओं के इस्तेमाल के वक्त डाउनलोडिंग आदि के लिए वसूले जाने वाले अतिरिक्त शुल्क से भी ग्राहक को बचाकर प्लान को आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। अभी तक ब्लैकबेरी में सबसे कम टैरिफ एयरटेल का है। एयरटेल 249 रुपये मासिक रेंटल वाले प्लान में 15 पैसे प्रति केबी की दर से डाउनलोडिंग जार्च लेती है। इसी तरह वोडाफोन का न्यूनतम प्लान 299 रुपये का है लेकिन वह इंटरनेट इस्तेमाल के बजाए सिर्फ ई-मेल पढ़ने की सुविधा देता है। अनलिमिटेड इस्तेमाल वाले ब्लैकबेरी प्लान में आईडिया 1099 और टाटा टेली 1350 रुपये मासिक रेंटल वाले टैरिफ हैं। अगर बीएसएनएल बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के 400 रुपये से कम मासिक रेंटल वाले प्लान बगैर डाउनलोड चार्ज के साथ लांच करता है तो टेलीकॉम सेवाओं के इस क्षेत्र में प्राइसवार तेज हो जाएगी। 3जी सेवाओं की सहूलियत के साथ बीएसएनएल का ब्लैकबेरी बाकी टेलीकॉम कंपनियों पर भारी पड़ सकता है। एयरटेल और वोडाफोन को अभी 3जी स्पैक्ट्रम आवंटित होना बाकी है जबकि सरकार बीएसएनएल को पहले ही 3जी रेडियो फ्रीक्वेंसी दे चुकी है। विवादों में रही हैं ब्लैकबेरी सेवाएंब्लैकबेरी सेवाओं में डेटा ट्रांसफर के सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ न आने को लेकर विवाद हो गया था। इसके बाद सरकारी टेलीकॉम कंपनी की ओर से ब्लैकबेरी सेवाएं लांच किए जाने के मुद्दे पर गोयल का कहना है कि 3जी सेवाओं की निगरानी संभव है और फिलहाल इस पर किसी तरह की रोक नहीं है। गौरतलब है कि इससे पहले डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ने बीएसएनएल और एमटीएनएल को तब तक 3जी सेवाएं उपलब्ध न कराने को कहा था जब तक कि खुफिया एजेंसियों को इन कॉल्स की निगरानी की सुविधा नहीं मिल जाती।

अग्निपरीक्षा है डीएलएफ की दिल्ली लांचिंग

देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ लिमिटेड लंबे अरसे के बाद दिल्ली में हाउसिंग प्रोजेक्ट लाने जा रही है। चालीस से लेकर सत्तर के दशक तक दिल्ली में 20 से ज्यादा कॉलोनियां विकसित करने वाली डीएलएफ ने आर्थिक सुस्ती के दौर में एक बार फिर दिल्ली का रुख किया है। ग्रेटर कैलाश में क्वीन कोर्ट के नाम से आवासीय प्रोजेक्ट लांच करने के बाद डीएलएफ अब कीर्ति नगर में शिवाजी मार्ग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट लाने जा रही है। इन हाउसिंग प्रोजेक्ट के साथ डीएलएफ करीब 30 साल बाद स्थानीय हाउसिंग मार्केट में कदम रख रही है। डीएलएफ शिवाजी मार्ग प्रोजेक्ट की लांचिंग में ज्यादा जोखिम उठाने के मूड में नहीं दिखती। यही वजह है कि कंपनी ने पहले प्रोजेक्ट की सॉफ्ट लांचिंग का फैसला किया है। बुकिंग की घोषणा अगले 15 दिनों के अंदर किसी भी दिन हो सकती है जिसके लिए ब्रोकर्स से 10 लाख रुपये का चेक तैयार रखने को कहा जा रहा है। कारोबारी चुनौतियों का मुकाबला करने में डीएलएफ को काफी लंबा अनुभव है। वर्ष 1957 में दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी की स्थापना के बाद जब दिल्ली में प्राइवेट डेवलपर्स की गतिविधियों पर पांबदी लगाई जाने लगी तब भी डीएलएफ ने गुड़गांव में नई जमीन तलाशने में देर नहीं की थी। अब एक बार फिर डीएलएफ ने दिल्ली की जमीन से दम भरने का फैसला किया है। शिवाजी मार्ग प्रोजेक्ट की बुकिंग के बारे में एस-टेक रियलटर्स के मालिक श्याम गुप्ता का कहना है कि अभी तक का यही रिकॉर्ड है कि डीएलएफ के ज्यादातर प्रोजेक्ट की बुकिंग एक ही दिन में पूरी हो जाती है। कंपनी अपने ब्रोकर नेटवर्क को बुकिंग के वास्ते चेन तैयार रखने के लिए कहती है और बुकिंग शुरू होने के दिन सौदा करने वाले लोगों को डिस्काउंट का लाभ देकर उसी दिन बुकिंग पूरी हो जाती है। हालांकि, अब प्रॉपर्टी बाजार के हालात बदल चुके हैं। ऐसे में यह प्रोजेक्ट डीएलएफ के लिए बड़ा इम्तिहान साबित होगा। यही वजह है कि अभी तक कंपनी ने बुकिंग की तारीख और भाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। गुप्ता के मुताबिक, हाल ही में ब्रोकर के साथ हुई बैठक के बाद डीएलएफ ने इस प्रोजेक्ट में मकान की कीमत 7,500 रुपये प्रति वर्ग फुट से घटाकर 6,000 से 7,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के बीच रखने के संकेत दिए हैं। डीएलएफ इस प्रोजेक्ट को सीधे लांच न कर ब्रोकर्स के साथ इस अनौपचारिक मोलभाव के जरिए बाजार के मिजाज को जानकर सॉफ्ट लांचिंग कर रही है।

10.3.09

प्रॉपर्टी डेवलपर्स पर अब खरीदार पड़ रहे हैं भारी

अजीत सिंह समय अनुकूल होते ही प्रॉपर्टी खरीदारों ने एकजुट होकर रियल एस्टेट कंपनियों और डेवलपर्स पर कीमतें कम करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। खरीदारों ने मिल-जुलकर सौदेबाजी के सहारे दिल्ली में भी डीएलएफ द्वारा कीमतें गिरवाने की मुहिम छेड़ रखी है। इन खरीदारों को डीएलएफ की ओर से 15 मार्च तक दाम घटाने का आश्वासन मिल चुका है। प्रॉपर्टी बाजार में जहां अक्सर डेवलपर्स गठजोड़ कर कीमतों को नियंत्रित करते हैं, खरीदारों की यह एकजुटता बाजार को प्रभावित करने वाली घटना साबित हो सकती है। ऐसे दबाव के चलते डीएलएफ चेन्नई और बंगलूरू में 20 से 30 फीसदी तक कीमतें कम कर चुकी है। इस मुहिम में शामिल चार्टर्ड एकाउंटेंट सचिन जैन ने त्नबिजनेस भास्करत्न को बताया कि पिछले साल फरवरी में लांच हुए डीएलएफ के न्यू टाउन हाइट्स प्रोजेक्ट में उन्होंने 50 लाख रुपये में 2250 रुपये प्रति वर्ग फुट के भाव पर 1760 वर्ग फुट एरिया वाले 3 बेडरूम फ्लैट का सौदा किया था। गत दिसंबर तक डीएलएफ को उन्होंने करीब 40 फीसदी राशि का भुगतान भी कर दिया। हालांकि साइट पर निर्माण शुरू ही नहीं हुआ, जबकि उनसे नियमित अंतराल के बाद किस्तों की मांग की जाती रही। डेवलपर के इस रवैये के खिलाफ उन्होंने बाकी खरीदारों से बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे करीब 322 लोग कंपनी के खिलाफ लामबंद हो गए। जैन के मुताबिक, खरीदारों ने बाजार की बदली स्थितियों के हिसाब से कीमतें 25 फीसदी तक कम करवाने, प्राइम लोकेशन चार्ज घटवाने और समयबद्ध भुगतान के बजाय निर्माण पूरा होने के हिसाब से भुगतान व्यवस्था के लिए मुहिम छेड़ने का फैसला किया। इसके संचालन के लिए कोर ग्रुप बनाया गया जिसमें चार्टर्ड एकाउंटेंट, एडवोकेट आदि शामिल हैं। खरीदारों का यह ग्रुप डीएलएफ के टॉप मैनेजमेंट से बातचीत कर चुका है और जैन के मुताबिक, करीब दो सप्ताह पहले डीएलएफ ने उन्हें 15 मार्च तक कीमतें कम करने जैसी राहत देने का आश्वासन दिया है। हालांकि, डीएलएफ के प्रवक्ता ने दिल्ली-एनसीआर में खरीदारों के दबाव में कीमतें गिराने से इनकार किया है। प्रवक्ता का कहना है कि कंपनी ने चेन्नई में कीमतें घटाई हैं, क्योंकि वहां प्रोजेक्ट काफी पहले लांच किए गए थे और कीमतें ज्यादा थीं। लेकिन यह बात हर प्रोजेक्ट पर लागू नहीं हो सकती। गुड़गांव में न्यू टाउन हाइट्स प्रोजेक्ट की कीमतें पहले ही काफी कम हैं। वैसे, प्रवक्ता ने यह जरूर माना कि खरीदार देखा-देखी कीमतें कम करवाने के प्रयास में हैं।

21.2.09

दून स्कूल की रजिस्ट्रेशन फीस 36 हजार रुपये

अजीत सिंह सरकार ने स्कूलों से मुनाफा कमाने पर पाबंदी भले ही लगा रखी हो लेकिन कई नामचीन स्कूल शिक्षा के कारोबार से पैसा कूटने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल में कक्षा सात की प्रवेश परीक्षा की रजिस्ट्रेशन फीस के तौर पर 36,000 हजार रुपये वसूले जाने का मामला सामने आया है। दून स्कूल के इस कारनामे की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्रालय को की गई है। शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय संस्था सोशल ज्यूरिस्ट से जुड़े अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने दून स्कूल की ओर से दाखिले में भी आर्थिक आधार पर भेदभाव की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्री अजरुन सिंह से की है। जल्द ही इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर किए जाने की तैयार चल रही है। अजरुन सिंह को भेजे शिकायती पत्र में अशोक अग्रवाल ने लिखा है कि दून स्कूल कक्षा सात और आठ में दाखिले के इच्छुक छात्रों से प्रवेश परीक्षा की रजिस्ट्रेशन फीस के तौर पर 36,000 रुपये वसूल रहा है और 1000 रुपये स्कूल प्रोस्पेक्टस के नाम पर लिए जा रहे हैं। यानी 37000 रुपये की रकम सिर्फ स्कूल की प्रवेश परीक्षा के लिए है। इसमें सफल पाए जाने पर छात्र को इंटरव्यू से गुजरना होता है। इंटरव्यू में सफल करार दिए जाने के बाद ही दाखिले पर मुहर लगती है। आगामी सत्र में कक्षा सात और आठ में दाखिले के लिए करीब 950 छात्रों ने दून स्कूल में एंट्रेंस का रजिस्ट्रेशन कराया था, जिसमे से कक्षा आठ में सिर्फ 22 छात्रों को दाखिला मिला है। इस प्रकार दाखिला न मिल पाने वाले छात्रों से ही दून स्कूल ने करीब 3.25 करोड़ रुपये की कमाई कर ली। उल्लेखनीय है कि प्रवेश परीक्षा की इस फीस के अलावा दून स्कूल की सालाना फीस तीन लाख रुपये से ज्यादा है। बिजनेस भास्कर से बातचीत में इस बाबत शिकायत करने वाले अशोक अग्रवाल ने कहा है कि दून स्कूल की ओर से वसूली जा रही यह मोटी फीस आर्थिक आधार पर छात्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने वाला काम है। हैरानी की बात यह है कि दून स्कूल एक नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड है। अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने के लिए सरकार ने कोई स्पष्ट नियम-कानून नहीं बनाया है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। इस मामले पर शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर जयंती राजन का कहना है कि शिक्षा में जहां भी ज्यादा मुनाफा कमाने की गुजाइश है जैसे प्ले स्कूल और रेजीडेंशियल स्कूल, उनके लिए सरकार ने नियम-कायदे ही तय नहीं किए हैं। आर्थिक आधार पर समाज में वर्ग भेद बढ़ाने वाला दून स्कूल देश का अकेला स्कूल नहीं है, तमाम दूसरे स्कूल भी वर्षे से यही करते आ रहे हैं।

11.2.09

नोएडा अथॉरिटी प्लाटों की वापसी से मालामाल

अजीत सिंह पिछले साल देश के सबसे बड़े जमीन सौदे से सुर्खियों में आई नोएडा अथॉरिटी इन सौदों के टूटने के बाद भी फायदे में रहेगी। अथॉरिटी करीब 1 लाख 30 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर जमीन बेचने में कामयाब रही थी। वहीं अब इस जमीन सौदे के खटाई में पड़ने के बाद भी अथॉरिटी पेनाल्टी के तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये की कमाई कर लेगी। 5,000 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड डील करने वाले कंपनी बीपीटीपी की ओर से जमीन वापस करने के एवज में ही अथॉरिटी को करीब 130 करोड़ रुपये बतौर पेनाल्टी मिलेगी। इसी तरह बाकी जमीन सौदों से बिल्डरों के हाथ खींचने से भी प्राधिकरण को कमाई होगी।
बदले आर्थिक हालात में बीपीटीपी जैसे कई डेवलपर्स नोएडा में महंगे जमीन सौदों के बकाए का भुगतान नहीं कर पा रहे थे। रियल एस्टेट में फंड की किल्लत और मांग में कमी के चलते यह जमीन सौदे टूटने के कगार पर पहुंच गए। डेवलपर्स की मांग पर नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने इन्हें जमीन वापस करने और भुगतान की किस्तों को आगे बढ़ाने का विकल्प दिया है। मगर इसमें भी प्राधिकरण ने कमाई के मौके निकाल लिए हैं। जमीन वापस करने की सूरत में प्राधिकरण भुगतान की रकम का 10 फीसदी पेनाल्टी के तौर पर वसूलेगा। किस्तों के भुगतान के मामले में बकाया रकम पर ब्याज को मूल में जोड़कर आगे की अवधि का ब्याज इस कुल रकम पर देना होगा। पिछले एक दो साल के दौरान नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने बीपीटीपी के अलावा यूनिटेक, ओमेक्स, एसोटेक, पाश्र्वनाथ समेत 20 से ज्यादा डेवलपर्स के साथ जमीन के सौदे किए हैं। इनमें से ज्यादातर की ओर से बकाया किस्तों का भुगतान समय पर नहीं मिल पा रहा है। पिछले वर्ष मार्च में नोएडा में 95 एकड़ जमीन के लिए 5,006 करोड़ रुपये की बोली लगा कर बीपीटीपी ने देश का सबसे महंगा जमीन सौदा अपने नाम किया था। मगर 1,300 करोड़ रुपये के शुरुआती भुगतान के बाद कंपनी बाकी भुगतान नहीं कर पाई थी।

मुनाफे के लिए स्कूल खोलने की डगर कठिन

अजीत सिंह मुनाफे के लिए स्कूल कारोबार में उतर रही कंपनियों की राह आसान नहीं दिखती है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री का कहना है कि केंद्र सरकार अब भी मुनाफे के लिए स्कूल न चलाने देने के रुख पर कायम है। सरकार मुनाफे के लिए स्कूल कारोबार में उतर रही कंपनियों के बिजनेस मॉडल की पड़ताल करा सकती है। उधर, शिक्षा के कारोबार से मुनाफा कमाने के लिए कंपनियों ने नया रास्ता निकाल लिया है। चूंकि स्कूलों को मुनाफा कमाने की अनुमति नहीं है, इसलिए कंपनियों ने ट्रस्ट के माध्यम से खुले स्कूलों को सेवाएं और उत्पाद बेचने का फामरूला निकाला है।

कंपनियों की ओर से मुनाफे के लिए स्कूल खोलने के बारे में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री एम.ए. फातमी ने त्नबिजनेस भास्करत्न को बताया कि देश के कानून के हिसाब से स्कूल से लाभ नहीं कमाया जा सकता। कंपनियों की ओर से समाज सेवा के लिए स्कूल खोलने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन जो कंपनियां मुनाफे के लिए स्कूल खोलना चाहती हैं उनके मामले की पड़ताल की जाएगी। स्कूलों के गैर व्यावसायिक स्वरूप को लेकर सरकार की नीति में फिलहाल कोई नया बदलाव नहीं है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में कई कंपनियों जैसे एड्यूकॉम्प, कैरियर लांचर और जी ग्रुप ने बड़ा निवेश कर देश भर में स्कूल खोलने की घोषणा की है। एड्यूकॉम्प मिलेनियम, यूरोकिड्स और विद्या प्रभात नाम वाले तीन तरह के स्कूल खोलेगी। इन स्कूलों के बिजनेस मॉडल के बारे में एड्यूकॉम्प की प्रवक्ता का कहना है कि ये स्कूल नियमानुसार किसी ट्रस्ट या संस्था के तहत ही खोले जाएंगे, लेकिन कंपनी इन स्कूलों को अपनी सेवाएं और उत्पाद बेचेगी। इसी से कंपनी को आमदनी होगी। एड्यूकॉम्प के मुताबिक, इस तरह से स्कूल खोलने और उन्हें सेवाएं देकर आय अर्जित करने की पूरी प्रक्रिया में संबंधित नियामक संस्थाओं की अनुमति ली जा रही है।

जीटीबी मामले में प्राइसवाटरहाउस के दो ऑडिटर दोषी

अजीत सिंह / ममता सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) की अनुशासन समिति ने भारी अनियमितताओं के कारण डूब चुके ग्लोबल ट्रस्ट बैंक की ऑडिटर प्राइसवाटरहाउस के तीन में से दो ऑडिटर्स को दोषी करार दिया है। आईसीएआई की अनुशासन समिति ने सोमवार को इस मामले की जांच रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंप दी। रिपोर्ट में दोषी पाए ऑडिटर्स के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए, इस बारे में निर्णय लिया जाना अभी बाकी है। वैसे तो यह मामला वर्ष 2004 से ही आईसीएआई के पास है, लेकिन सत्यम मामले में भी प्राइसवाटरहाउस की भूमिका पर संदेह होने के बाद ग्लोबल ट्रस्ट बैंक मामले की जांच भी सुर्खियों में आ गई थी। यही नहीं, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (जीटीबी) के ऑडिटरों के खिलाफ कार्रवाई में देरी को लेकर आईसीएआई भी सवालों के घेरे में है। उधर, सत्यम मामले में भी प्राइसवाटरहाउस के दो ऑडिटर हिरासत में हैं।
आईसीएआई के अध्यक्ष उत्तम प्रकाश अग्रवाल ने बताया कि रिजर्व बैंक ने जीटीबी मामले में प्राइसवाटरहाउस के खिलाफ आईसीएआई में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके तहत बैंक के एनपीए (फंसे कर्ज) में हेराफेरी करने जैसे आरोप थे जिसके बाद आईसीएआई ने जीटीबी के खातों की ऑडिटिंग में प्राइसवॉटरहाउस की भूमिका की जांच शुरू की थी। इस जांच के लिए एक अनुशासन समिति का गठन किया गया था जिसने अब अपनी रिपोर्ट दी है। अग्रवाल के मुताबिक इस रिपोर्ट में प्राइसवाटरहाउस के दो ऑडिटरों को दोषी पाया गया है। दोषी पाए गए इन ऑडिटर्स के खिलाफ कार्रवाई का फैसला आईसीएआई काउंसिल की आगामी बैठक में किया जाएगा। इसके बाद ही दोषी ऑडिटरों के खिलाफ कार्रवाई तय होगी। गौरतलब है कि प्राइसवाटरहाउस वर्ष 2002-03 में जीटीबी की ऑडिटर थी। इसके अगले साल ही भारतीय रिजर्व बैंक ने खातों में हेराफेरी और घोटाले के आरोपों के चलते बैंक के कारोबार पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2004 में भारतीय रिजर्व बैंक ने आईसीएआई को जीटीबी मामले में ऑडिटर्स की भूमिका की जांच करने को कहा था। इस मामले में पिछले पांच-छह साल से चल रहे जांच और समितियां बनाने के सिलसिले का अभी तक कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकल पाया है। जीटीबी घोटाले में संयुक्त संसदीय समिति को भी जांच के आदेश दिए गए थे। आईसीएआई के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आईसीएआई काउसिंल इस मामले में प्रथम दृष्टया प्राइसवाटरहाउस के ऑडिटर्स को अपनी जिम्मेदारी में लापरवाही बरतने का दोषी मान चुकी है। इस दौरान आईसीएआई की ओर से दिसंबरत्न06 में प्राइसवाटरहाउस को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने जैसी कार्रवाई ही की गई। अगस्त 2007 में आईसीएआई की अनुशासन समिति को इसे भेज दिया गया था।

राष्ट्रमंडल खेल में पर्यटकों के लिए कमरों के इंतजाम में रोड़े

अजीत सिंह होटल बनाने के लिए नीलाम 33 में से 6 साइट पर निर्माण शुरू न हो पाने की वजह से राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां प्रभावित हो सकती है। डीडीए ने इन होटलों के जरिये खेलों के दौरान करीब 6000 कमरे मुहैया कराने की योजना बनाई थी। निर्धारित समय तक होटल न बनाने वाले डेवलपर्स के खिलाफ डीडीए जुर्माना लगाने जैसी कार्रवाई कर सकता है। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली व एनसीआर में करीब 40 हजार होटल रूम की जरूरत समझी जा रही है, जबकि फिलहाल छोटे-बड़े सभी तरह के होटल मिलाकर 15 हजार से ज्यादा कमरे नहीं हैं। डीडीए सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक,अभी तक होटलों का निर्माण शुरू न करने वाले इन आवंटियों के खिलाफ ज्यादा कार्रवाई के विकल्प नहीं हैं। डीडीए के आवंटन नियमों के अनुसार, नियम समय सीमा तक प्रोजेक्ट पूरा न करने वाले डेवलपर्स की 5 फीसदी बैंक गारंटी जब्त की जा सकती है। लेकिन यहां बड़ा सवाल डेवलपर्स के खिलाफ कार्रवाई या जुर्माने का नहीं है। दरअसल वर्ष 2010 तक इन होटलों के तैयार न होने से राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आवास व्यवस्था की योजना बिगड़ सकती है। डीडीए इन 33 होटलों का निर्माण कराकर करीब 6000 होटल के कमरों की व्यवस्था कराने की तैयारी में था। इन तैयारियों को बड़ा झटका तब लग जब मालूम हुआ कि 6 होटल साइट पर निर्माण शुरू होना तो दूर अभी इसके लिए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की मंजूरी भी नहीं ली गई है। डीडीए ने इस बारे में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय को भी सूचित किया है। बदली आर्थिक स्थितियों में रियल एस्टेट डेवलपर्स के प्रोजेक्ट अटक गए हैं। केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक, मेट्रो शहरों में सिर्फ 60 फीसदी होटलों का निर्माण ही समय सीमा के मुताबिक चल रहा है। जानकारों का मानना है कि होटल निर्माण में तकरीबन तीन साल का समय लग जाता है और जैसी ऊंची बोली पर डीडीए ने होटल प्लॉट नीलाम किए हैं उनका लागत खर्च निकालने की समय अवधि 20 साल तक हो सकती है। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान होटल निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए फ्लोर स्पेस इंडेक्स यानी एफएसआई नियमों में छूट भी डेवलपर्स को लुभाने में कामयाब नहीं हो पाई है।