मुंबइया फिल्में यूं तो कमजोर कहानियों के लिए बदनाम हैं। लेकिन कुछ खास मौकों पर कहानी की आड़ बड़े सलीके से ली जाती रही। सिलसिला पुराना है, बस कहानी को इस्तेमाल करने का मकसद और मतलब बदलता गया। नब्बे के दशक में दीपा साही से लेकर अनु अग्रवाल तक जब भी 'कुछ ज्यादा दिखाÓ कहानी की मांग की आड़ में दिखा। लेकिन अब कहानी बदल गई है। कहानी मुड़ती है और एयरपोर्ट तक पहुंच जाती है] किसी विदेशी हसीना को रिसीव करने। इन नामों पर गौर कीजिए-जैकलिन फर्नांडीज, लूसिया केट्स, गेब्रिएला राइट, जिसेली मोंटेरियो, काइली मिनॉग, डेनिस रिचर्ड्स, मैरीगोल्ड लेक्सटन, रिचेल शेली, क्लॉडिया, बारबारा मोरी। ये आज के हिंदी सिनेमा की दुलारी और ग्लोबल होने को छटपटाती पब्लिक की प्यारी हैं। गोरी चमड़ी में नमस्ते इंडिया का आलाप और टूटी-फूटी हिंदी में इश्क के जुमले इनका अस्त्र हैं तो थोक के भाव चुंबन, बिकनी दर्शन और फिल्म को खबर बना डालने की कुव्वत इनका ब्रह्मïास्त्र। हिंदी फिल्मों में इन विदेशी मेम के सिर्फ शो-पीस बने रहने का दौर बाबू जी जरा धीरे चलो के साथ ही चला गया था। हालांकि माहौल को अभिजात्य दिखाने और ग्लैमर का इंटरनेशनल छौंक लगाने के लिए कम कपड़ों में ज्यादा गोरी हसीनाओं का इस्तेमाल अब भी जारी है। और मांग कहानी में हो न हो, इनकी मौजूदगी रहती है।
एक ऐसे देश में जहां कस्बों की युवा हसरतें लोकल फैशन शो में खूब छलकती हैं और नए-नए अमीर बने वर्ग की महिलाएं वाइन और वोदका का फर्क आजमाने को आतुर हैं, वहां हुस्न की नुमाइश और अंतरंग प्रसंग इंपोर्टेड माल की मोहताज क्यों है? ऐसे शो-पीस, इस शो-बिजनेस की मजबूरी हैं या फिर वाकई हम और हमारा सिनेमा ग्लोबल हो चला है?
लेकिन परिदृश्य में बड़ा बदलाव रंग दे बसंती और मंगल पांडे-द राइजिंग जैसी फिल्में लेकर आईं, जहां किरदार वास्तव में विदेशी कलाकार की मांग करते थे। ऐसी फिल्में विदेशी अभिनेत्रियों का बॉलीवुड में वजूद बढ़ाने में काफी कारगर रही हैं। राजनीति में विदेशी चेहरा भले ही दो-चार दृश्यों में दिखा हो, लेकिन कैटरिना कैफ का अभिनय लोगों ने देखा। अभिनय का जलवा ब्राजीलियन जिसेली मोंटेरियो लव आज-कल फिल्म में पंजबान की भूमिका में दिखा चुकी हैं।
आपने अंदाज में वैश्विक हो रहे हिंदी सिनेमा की अपंगताएं भी अनूठी हैं। यहां आने वाली पश्चिम की संघर्षरत अथवा टीवी अभिनेत्रियों की फेहरिस्त तो लंबी है लेकिन हॉलीवुड के नामी कलाकार यहां नहीं फटकते। यहां तक कि गोरे मर्दों के लिए जगह नहीं है। है भी तो विलेन की टोली में सांभा सरीखी भूमिकाओं में। टॉप हिंदी हीरोइन के मुकाबले तकरीबन आधे खर्च में भरपूर ग्लैमर परोसने का अंकगणित और मुफ्त की शोहरत बटोरने का फार्मूला बॉलीवुड को समझ आ गया है।
इस मुद्दे पर आस्ट्रेलियाई अदाकारा तान्या जेइटा कहती हैं, 'आप भारत को नहीं चुनते, भारत आपको चुनता है।Ó किसी आइटम गीत पर नाचे बिना लगातार तीन हिंदी फिल्मों में अभिनय का मौका पाने वाले तान्या मानती हैं कि बॉलीवुड में विदेशी प्रतिभाओं के लिए काफी जगह मौजूद है। इस बात को हम क्रिस्टीन के जरिए बेहतर समझ सकते हैं। करीब तीन साल पहले लंदन के प्रतिष्ठिïत सेंट मार्टिन कॉलेज से फैशन में डिग्री लेकर भारत आई कनाडा की क्रिस्टिन गोव यहां मॉडल मैनेजमेंट के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उनका काम है मॉडल्स को संवारना यानी स्टाहलिस्ट का। भारत से कॅरिअर शुरू करने के सवाल पर क्रिस्टीन कहती हैं, 'विदेश में काम करने वाले दोस्तों का वेतन चुकाने के बाद मेरे बराबर ही बैठते है जबकि वे लोग मुझसे चार गुना ज्यादा किराये के घर में रहते हैं। भारत में फैशन और ग्लैमर इंडस्ट्री उभर रही है और लंदन में मुझे ओहदे तक पहुंचने के लिए 10 साल लगाने पड़ते।
आर्थिक मंदी और शून्य विकास दर में धंसे पश्चिम को भारत की हिंदी से बजाय 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था ज्यादा समझ आती है। और जब आपूर्ति भरपूर है तो भारत जैसे देश में ज्यादा क्रेज अति गोरी सभी चमडिय़ों की मांग पैदा की जा रही है। ऐसी मांग पैदा करने में ङ्क्षहदी फिल्मों का अनुभव पुराना जो ठहरा।
10.7.10
शो-बिजनेस और फिरंगी शबाब
मुंबइया फिल्में यूं तो कमजोर कहानियों के लिए बदनाम हैं। लेकिन कुछ खास मौकों पर कहानी की आड़ बड़े सलीके से ली जाती रही। सिलसिला पुराना है, बस कहानी को इस्तेमाल करने का मकसद और मतलब बदलता गया। नब्बे के दशक में दीपा साही से लेकर अनु अग्रवाल तक जब भी 'कुछ ज्यादा दिखाÓ कहानी की मांग की आड़ में दिखा। लेकिन अब कहानी बदल गई है। कहानी मुड़ती है और एयरपोर्ट तक पहुंच जाती है] किसी विदेशी हसीना को रिसीव करने। इन नामों पर गौर कीजिए-जैकलिन फर्नांडीज, लूसिया केट्स, गेब्रिएला राइट, जिसेली मोंटेरियो, काइली मिनॉग, डेनिस रिचर्ड्स, मैरीगोल्ड लेक्सटन, रिचेल शेली, क्लॉडिया, बारबारा मोरी। ये आज के हिंदी सिनेमा की दुलारी और ग्लोबल होने को छटपटाती पब्लिक की प्यारी हैं। गोरी चमड़ी में नमस्ते इंडिया का आलाप और टूटी-फूटी हिंदी में इश्क के जुमले इनका अस्त्र हैं तो थोक के भाव चुंबन, बिकनी दर्शन और फिल्म को खबर बना डालने की कुव्वत इनका ब्रह्मïास्त्र। हिंदी फिल्मों में इन विदेशी मेम के सिर्फ शो-पीस बने रहने का दौर बाबू जी जरा धीरे चलो के साथ ही चला गया था। हालांकि माहौल को अभिजात्य दिखाने और ग्लैमर का इंटरनेशनल छौंक लगाने के लिए कम कपड़ों में ज्यादा गोरी हसीनाओं का इस्तेमाल अब भी जारी है। और मांग कहानी में हो न हो, इनकी मौजूदगी रहती है।
एक ऐसे देश में जहां कस्बों की युवा हसरतें लोकल फैशन शो में खूब छलकती हैं और नए-नए अमीर बने वर्ग की महिलाएं वाइन और वोदका का फर्क आजमाने को आतुर हैं, वहां हुस्न की नुमाइश और अंतरंग प्रसंग इंपोर्टेड माल की मोहताज क्यों है? ऐसे शो-पीस, इस शो-बिजनेस की मजबूरी हैं या फिर वाकई हम और हमारा सिनेमा ग्लोबल हो चला है?
लेकिन परिदृश्य में बड़ा बदलाव रंग दे बसंती और मंगल पांडे-द राइजिंग जैसी फिल्में लेकर आईं, जहां किरदार वास्तव में विदेशी कलाकार की मांग करते थे। ऐसी फिल्में विदेशी अभिनेत्रियों का बॉलीवुड में वजूद बढ़ाने में काफी कारगर रही हैं। राजनीति में विदेशी चेहरा भले ही दो-चार दृश्यों में दिखा हो, लेकिन कैटरिना कैफ का अभिनय लोगों ने देखा। अभिनय का जलवा ब्राजीलियन जिसेली मोंटेरियो लव आज-कल फिल्म में पंजबान की भूमिका में दिखा चुकी हैं।
आपने अंदाज में वैश्विक हो रहे हिंदी सिनेमा की अपंगताएं भी अनूठी हैं। यहां आने वाली पश्चिम की संघर्षरत अथवा टीवी अभिनेत्रियों की फेहरिस्त तो लंबी है लेकिन हॉलीवुड के नामी कलाकार यहां नहीं फटकते। यहां तक कि गोरे मर्दों के लिए जगह नहीं है। है भी तो विलेन की टोली में सांभा सरीखी भूमिकाओं में। टॉप हिंदी हीरोइन के मुकाबले तकरीबन आधे खर्च में भरपूर ग्लैमर परोसने का अंकगणित और मुफ्त की शोहरत बटोरने का फार्मूला बॉलीवुड को समझ आ गया है।
इस मुद्दे पर आस्ट्रेलियाई अदाकारा तान्या जेइटा कहती हैं, 'आप भारत को नहीं चुनते, भारत आपको चुनता है।Ó किसी आइटम गीत पर नाचे बिना लगातार तीन हिंदी फिल्मों में अभिनय का मौका पाने वाले तान्या मानती हैं कि बॉलीवुड में विदेशी प्रतिभाओं के लिए काफी जगह मौजूद है। इस बात को हम क्रिस्टीन के जरिए बेहतर समझ सकते हैं। करीब तीन साल पहले लंदन के प्रतिष्ठिïत सेंट मार्टिन कॉलेज से फैशन में डिग्री लेकर भारत आई कनाडा की क्रिस्टिन गोव यहां मॉडल मैनेजमेंट के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उनका काम है मॉडल्स को संवारना यानी स्टाहलिस्ट का। भारत से कॅरिअर शुरू करने के सवाल पर क्रिस्टीन कहती हैं, 'विदेश में काम करने वाले दोस्तों का वेतन चुकाने के बाद मेरे बराबर ही बैठते है जबकि वे लोग मुझसे चार गुना ज्यादा किराये के घर में रहते हैं। भारत में फैशन और ग्लैमर इंडस्ट्री उभर रही है और लंदन में मुझे ओहदे तक पहुंचने के लिए 10 साल लगाने पड़ते।
आर्थिक मंदी और शून्य विकास दर में धंसे पश्चिम को भारत की हिंदी से बजाय 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था ज्यादा समझ आती है। और जब आपूर्ति भरपूर है तो भारत जैसे देश में ज्यादा क्रेज अति गोरी सभी चमडिय़ों की मांग पैदा की जा रही है। ऐसी मांग पैदा करने में ङ्क्षहदी फिल्मों का अनुभव पुराना जो ठहरा।
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Wonderful peiece of work...! Truth of Indian cinema...Well done Ajeet Singh!
जवाब देंहटाएंचौधरी,
जवाब देंहटाएंकभी कुछ अच्छा पढऩे को मिलता है तो दिल हरा हो जाता है ठीक उसी तरह जैसा गंगा तीर पर जेठ की दुपहरी में प्यासे और गरमी के मारे का होता है। धन्यवाद जारी रखों समय निकालों और इसी तरह पढ़ाते रहे। इसी इंतजार में.......