10.7.10

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में परमाणु विकिरण का खतरा

यहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का जिक्र होने की वजह एकदम अलग है। जिस तरह दिल्ली विश्वविद्यालय की कोठरियों में बरसों से पड़ा रेडियोधर्मी कोबाल्ट-60 कबाड़ की शक्ल में मायापुरी इलाके तक पहुंचा और हादसे का सबब बना, उसी राह पर अलीगढ़ भी है। फर्क इतना है कि वहां हादसे के बाद रेडियोधर्मी खतरे की झलक मिली और अलीगढ़ में जैसे किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार हो रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञान विभाग में भी रेडियोधर्मी पदार्थ मौजूद है जो तकरीबन 25-30 साल से अनछुआ पड़ा है और किसी बड़े हादसे को न्यौता दे सकता है। यह मामला भारत में परमाणु कचरे के प्रति लापरवाह रवैये की पोल खोलने के लिए काफी है। अभी दो महीने पहले की बात है। दिल्ली के मायापुरी इलाके में कबाड़ की दुकान पर एक रहस्यमय चीज ने 10 लोगों को घायल कर दिया और एक की जान ले ली। कबाड़ में आए एक डिब्बेनुमा उपकरण को तोड़ा तो कुछ ऐसा निकला जिसने बिना छुए ही जहर का काम किया। देखते ही देखते कई लोगों की खाल जल गई, बाल उड़ गए और दम घुटने लगा। अस्पताल पहुंचे तो मालूम चला कि यह रेडियोधर्मी विकिरण की मार थी। छानबीन में निकला कि यह विकिरण रेडियोधर्मी पदार्थ कोबाल्ट-60 से पैदा हुआ जो दिल्ली विश्वविद्यालय से कबाड़ के तौर पर बेच दिया गया था। यह रेडियोधर्मी पदार्थ दिल्ली यूनिवर्सिटी के रसायन विज्ञान विभाग में पिछले 25 वर्ष से बिना इस्तेमाल पड़ा था। इस वर्ष फरवरी में हुई नीलामी के बाद यह मायापुरी पहुंचा और हादसे के रूप में फटा। यही कहानी एएमयू में भी दोहराई जा सकती है अगर किसी ने फिजिक्स डिपार्टमेंट में सालों से पड़े रेडियोधर्मी पदार्थ की सुध नहीं ली। आउटलुक को मिली जानकारी के मुताबिक, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के फिजिक्स डिपार्टमेंट में दो जगह पुराना रेडियोधर्मी पदार्थ करीब 25-30 साल से दबा रखा है जिसे वहां से हटाने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। एएमयू से जुड़े सूत्रों का दावा है कि भौतिकी विभाग में प्रायोगिक परमाणु भौतिकी पर शोध कार्य लंबे समय से होता रहा है, जिसके लिए रेडियोधर्मी पदार्थ भी आते थे। अस्सी के दशक तक यहां न्यूट्रॉन और गामा विकिरण निकालने वाले रेडियोधर्मी पदार्थ भी मंगाए जाते रहे। उस समय के दो रेडियोधर्मी स्रोत एएमयू के इस डिपार्टमेंट में आज भी दो अलग-अलग कमरों में बंद हैं। इन कमरों को सालों से किसी ने नहीं खोला और न ही इस रेडियोधर्मी खतरे के बारे में गंभीरता से सोचा गया। दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकले परमाणु कचरे से मायापुरी हादसा हुआ तो इस तरफ नजर गई। इस बीच भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग ने भी देश भर के विश्वविद्यालयों से प्रयोगशालाओं में मौजूद रेडियोधर्मी स्रोतों की जानकारी मांगी और इनके खतरे से आगाह किया। लेकिन अलीगढ़ में मौजूद खतरे की सुध अब तक किसी ने नहीं ली है जबकि इस आवासीय केंद्रीय विश्वविद्यालय में करीब 40 हजार छात्र, शिक्षक और कर्मचारी इसके साये में जी रहे हैं। इस मुद्दे पर एएमयू के फिजिक्स डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद जफर मानते हैं कि उनके विभाग में दो जगह रेडियोधर्मी स्रोत रखे हैं। जफर कहते हैं कि ये स्रोत संभवत: पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एम.एल. सहगल के जमाने का है, जिनका वर्ष 1985 में निधन हो गया था। लेकिन इसके बारे में कोई अन्य जानकारी रिकॉर्ड में नहीं है। यह भी मालूम नहीं कि जो स्रोत इतने बरसों से रखे हैं वे किस प्रकार के हैं। उनकी तीव्रता क्या है? यूनिवर्सिटी के भीतर मौजूद इस खतरे से कैंपस की सुरक्षा के सवाल पर प्रो. जफर कहते हैं कि इस बारे में कई बार सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग को लिखा गया लेकिन वहां से इसे हटाने की कार्रवाई नहीं की गई। परमाणु ऊर्जा विभाग ने इन रेडियोधर्मी स्रोतों के बारे में जानना चाहा कि ये कब मंगाए गए, कितनी मात्रा में मंगाए गए लेकिन यूनिवर्सिटी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। परमाणु ऊर्जा विभाग की ओर से कहा गया कि जब तक ये जानकारियां नहीं मिलतीं इन्हें हटाने संबंधी कार्रवाई संभव नहीं है। एएमयू के भौतिकी विभाग में जिन कमरों में रेडियोधर्मी स्रोत के मौजूद होने का दावा किया जा रहा है वे दोनों ही लंबे समय से बंद हैं। एक कमरे में स्रोत के जमीन के नीचे गाड़कर रखे जाने की सूचना है जबकि दूसरा उस कमरे के बगल में है, जहां शोध छात्र बैठते हैं। हैरानी की बात है कि मायापुरी हादसे के बाद भी सरकार परमाणु खतरे के लिए पुराने रिकॉर्ड और सूचनाओं का मुंह ताक रही है। प्रो. जफर बताते हैं कि परमाणु भौतिकी पर डिपार्टमेंट में अब भी शोध जारी है लेकिन अब जो स्रोत आते हैं वे खतरनाक श्रेणी में नहीं आते और उनका पूरा लेखा-जोखा सरकार के पास दर्ज होता है। लेकिन जिस स्रोत को लेकर संदेह है, वह न्यूट्रॉन या गामा स्रोत भी हो सकता है क्योंकि पहले इस तरह के स्रोत भी मंगाए जाते रहे हैं। प्रो. जफर का कहना है संभावित खतरे को देखते हुए एक बार फिर नए सिरे से परमाणु ऊर्जा आयोग को इस बारे मेें पत्र भेजने की तैयारी है। उल्लेखनीय है कि 1908 में स्थापित एएमयू का फिजिक्स डिपार्टमेंट उत्तर भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठिïत शोध केंद्रों में शुमार है। यहां वर्ष 1920 से ही भौतिक विज्ञान की विभिन्न शाखाओं, जिनमें परमाणु भौतिकी भी शामिल है, पर शोध कार्य चल रहा है। एएमयू से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सत्तर और अस्सी के दशक में यहां प्रायोगिक परमाणु भौतिक पर शोध करने वाला देश में सबसे बड़ा समूह था और प्रयोगशाला के लिए विदेशों तक से रेडियोधर्मी स्रोत मंगाए जाते थे। अब भी यहां तीन शिक्षक प्रायोगिक परमाणु भौतिकी के उच्च अध्ययन और शोध में सक्रिय हैं। डिपार्टमेंट के लोग दबी जुबान में रेडियोधर्मी खतरे की मौजूदगी की बात मान रहे हैं। यह अभी जांच का विषय है कि एएमयू में जिस रेडियोधर्मी स्रोत की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है उसकी हकीकत क्या है। वह वाकई खतरनाक है भी या नहीं। भारत में परमाणु सामग्री पर निगरानी के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड एईआरबी भी मौजूद है जो देश के परमाणु संस्थानों और सामग्री के नियमन और निगरानी के लिए जिम्मेदार है। परमाणु कचरे के निस्तारण के लिए बाकायदा नियम बने हैं। यह पूरी प्रक्रिया परमाणु ऊर्जा (रेडियोधर्मी कचरे का सुरक्षित निस्तारण)नियम, 1987 के तहत संचालित होती है। लेकिन एईआरबी की मानें तो दिल्ली विश्वविद्यालय को छोड़कर परमाणु सामग्री के निस्तारण में कोताही का कोई दूसरा मामला सामने नहीं आया। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) के अलावा राष्टï्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का राष्टï्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) और भारत सरकार का परमाणु ऊर्जा विभाग इस तरह के मामलों में कार्रवाई में सक्षम हैं। लेकिन अलीगढ़ मामले पर अभी तक किसी ने कोई कदम नहीं उठाया।

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