2.8.10

बारी परीक्षा के इम्तिहान की

दिल्ली के मशहूर ट्यूशन सेंटर अग्रवाल क्लासेज पर दोपहर बाद जुटाने वाली नवीं-दसवीं के छात्रों की भीड़ स्कूल की थकान के साथ-साथ उत्सुकता और शंका से भी लदी है। बोर्ड परीक्षा के तनाव की बात आते ही ट्यूशन लेने पहुंचे संस्कृति स्कूल में दसवीं के छात्र चंद्रन बताते हैं, पिछले साल उनके बड़े भाई को बोर्ड एगजाम में 92 फीसदी अंक मिले, फिर भी क्लास में उसका 48वां स्थान था। अब चंद्रन उन 8 लाख छात्रों में शामिल हैं जो 2010 में बोर्ड परीक्षा तो देंगे लेकिन अंकों के स्थान पर ग्रेड पाएंगे। चंद्रन सरकार के इस फैसले को सुकून मिलने की उम्मीद तो जताते हैं। केंद्र सरकार के परीक्षा सुधार मुहिम ने एक साथ कई बदलावों को न्यौता दे दिया है। जिनके बीच असल सवाल बार-बार सिर उठा रहा है कि क्या वाकई अंकों की जगह ग्रेड, साल की जगह सेमेस्टर, बोर्ड परीक्षा की जगह साल भर चलने वाली मूल्यांकन की नई व्यवस्था जिसे कॉन्टीन्यूअस कॉप्रीहेन्सिव इवेल्यूएश-सीसीई यानी सतत और समग्र मूल्यांकन नाम दिया गया है, मिलकर परीक्षा का खौफ मिटा पाएंगे? और अगर प्रतिभा के सबूत के तौर पर परीक्षा कराने और ग्रेड के साथ-साथ अंकों में रिजल्ट पाने की छूट मिलेगी तो गलाकाट प्रतिस्पर्धा से उपजा तनाव कैसे कम होगा? दसवीं बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने के मुद्दे पर राज्यों के तीखे विरोध के बाद परीक्षा सुधार की केंद्र सरकार की कवायद सिर्फ सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंड्री एजुकेशन-सीबीएसई स्कूलों तक सिमट गई है। अपने 100 दिन के एजेंड के वादे के मुताबिक, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्ब्ल ने इन परीक्षा सुधारों को लागू करने का एलान तो किया लेकिन सुधारों पर पूरी बहस और आमराय के बगैर ही आगे बढ़ाते दिख रहे हैं। दिल्ली के सभ्रांत स्कूल के समर्थन से शुरू हुए आम सहमति बनाने के सिलसिले में सिब्बल ने अपनी जरूरत के मुताबिक बाकी आम सहमति हासिल करने को भी ज्यादा वक्त नहीं दिया। जल्दबाज मंत्री के लेबल और सुधारों पर उठ रहे सवालों से सिब्बल भी अनजान नहीं है। दसवीं बोर्ड परीक्षा 2011 से पूरी तरह समाप्त हो जाएगी जबकि 2010 में बोर्ड परीक्षा तो होगी लेकिन अंकों के बजाए ग्रेड दिए जाएंगे। कपिल सिब्बल का कहना है कि साल में एक दिन इम्तिहान के आधार पर जिदंगी का फैसला करने के बजाए साल भर पढऩे, सीखने और क्या सबक लिया इसे परखने की व्यवस्था लाई जा रही है। जो निश्चित तौर पर बोर्ड एग्जाम के हौव्वे को कम करेगी। किसी एक परीक्षा में सफलता के आधार पर कॅरियर की दिशा तय करने का रवैया छोडऩा होगा। अब ग्रेडिंग के साथ-साथ अगर छात्र चाहे तो उसका रिजल्ट अंकों में भी बताया जा सकेगा और अगर दूसरे स्कूल में दाखिले के लिए दसवीं पास के सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है तो उसकी मांग पर लिखित परीक्षा हो सकती है। इस परीक्षा इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन भी दी जा सकेगी। गौर करने वाली बात यह है कि 2011 में बोर्ड परीक्षा की जगह सतत मूल्याकंन की जो नई व्यवस्था लाई जा रही है, उसकी शुरूआत अभी कक्षा 9 में पढ़ रहे छात्रों के लिए अक्टूबर 2009 से होनी है। यानी कपिल सिब्बल के एलान और नई मूल्यांकन व्यवस्था की शुरूआत में महीने भर का फासला भी नहीं है। सिब्बल की कथित जल्दबाजी से उपजी इस कठिनाई का असर मेरठ जैसे कस्बे में भी दिखाई पड़ता है। जहां दसवीं पास की सनद फौज में भर्ती से लेकर विवाह योग्य शिक्षित युवा कहलाने और बंदूक के लाइसेंस में जरूरी दस्तावेजों के तौर पर काम आती है, सिब्बल के एगजाम रिफार्म को लेकर प्रतिष्ठिïत इंगिलश मीडियम सीबीएसई स्कूलों में कई तरह की शंकाएं हैं। सीबीएसई से जुड़े मेरठ के प्रेसीडेंसी स्कूल के प्रधानाचार्य जी.पी. सिन्हा ने आउटलुक को बताया कि सबसे ज्यादा मुश्किल एगजाम ऑन डिमांड यानी छात्र की मांग पर परीक्षा से हो सकती है। दसवीं की परीक्षा देने वाले और इसे छूट का फायदा उठाने वाले छात्रों के दो ग्रुप क्लास में बन जाएंगे। शिक्षक के लिए इन दोनों ग्रुप की जरूरतों को समझना मुश्किल होगा। सिन्हा के मुताबिक, सीबीएसई की तरफ से अभी तक नई व्यवस्था के बारे में स्कूलों को किसी तरह के निर्देश नहीं मिले हैं। कक्षा नौ के छात्रों के लिए इस साल अक्टूबर से शुरू होने वाले सतत मूल्यांकन पूरी तरह से स्कूल की अपने इंतजाम और शिक्षकों पर टिका होगा। ई2 से ए1 के बीच 9 ग्रेड वाला रिपोर्ट कार्ड स्कूल में तैयार होगा और प्रमाणित होने के लिए सीबीएसई के क्षेत्रीय कार्यालयों में आएगा। अब असंतोषजनक और सुधार की जरूरत दर्शाने वाले ई1 और ई2 ग्रेड के रिजल्ट से पैदा हताशा और कुंठा के बाद बोर्ड नहीं बल्कि स्कूल और टीचर खलनायक बनेंगे। 1993 में लर्निंग विदआउट बर्डन रिपोर्ट के देने वाले प्रोफेसर यशपाल नई कवायद का समर्थन करते हुए कहते हैं-सारे इम्तिहान खत्म कर देने चाहिए। एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण कुमार कहते हैं कि बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने का सुझाव 2005 में बनी राष्टï्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा एनसीएफ की प्रमुख सिफारिशों में से एक है। अगर यह पहल ठीक से लागू हो सकी तो बेशक परीक्षा का मनोवैज्ञानिक दबाव कम हो सकेगा। साल में सिर्फ एक बार परीक्षा हो तो ज्यादा हौव्वा बनता है लेकिन अगर पढ़ाई और परीक्षा साल भर साथ-साथ चलें तो माहौल बदलेगा। लेकिन दसवीं बोर्ड का हौव्वा खत्म करने की यह कोशिशें जिन परिस्थितियों और जितनी विविधता व विषमताएं वाले स्कूल सिस्टम में हो रही है। शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय अधिवक्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि दसवीं बोर्ड परीक्षा समाप्त करने के बाद संभव है कि छात्र बगैर किसी सार्वजनिक परीक्षा के छात्र 12वीं की दहलीज पर पहुंच जाए और तब पहली दफा बोर्ड परीक्षा देना कहीं ज्यादा दबाव पैदा करे। अग्रवाल के मुताबिक, अध्यापक ने साल भर क्या सीखाया इसका मूल्यांकन भी बेहद जरूरी है, जिसे नजरअंदाज किया गया है। जोधपुर के शिक्षाशास्त्री डॉ. जितेंद्र शर्मा तर्क देते हैं कि अब मूल्यांकन में शिक्षकों की भूमिका बढ़ जाएगी। छात्रों को लगातार सीखने और उनके ज्ञान के अलावा समझ को विभिन्न गतिविधियों के जरिए परखने के लिए ज्यादा तादाद में कुशल शिक्षकों की जरूरत होगी। अलबत्ता, परीक्षा प्रणाली में बदलाव से पहले ही शिक्षकों को प्रशिक्षण देने जैसी तैयारियां होनी चाहिए थी। नई व्यवस्था के बारे में सीबीएसई चेयरमैन विनीत जोशी बताते हैं कि उसी शैक्षणिक सत्र को दो छमाही यानी सेमेस्टर में बांटकर पूरा मूल्यांकन स्कूल स्तर पर होगा। इसमें विषयों की पढ़ाई के अलावा खेलकूद, अन्य शैक्षिणक गतिविधियों में भागीदारी और छात्र के नजरिए जैसी कई अहम पहलूओं को भी शामिल किया जाएगा। हरेक सेमेस्टर में दो बार पढ़ाई-लिखाई के दौरान मूल्यांकन होगा जबकि एक बार सेमेस्टर के आखिर में क्या सीखा इसकी परख की जाएगी। अक्सर अपनी उम्मीदों का बोझ बच्चों पर डालने के दोषी अभिभावकों में बोर्ड परीक्षा की जगह लेने वाले नए सिस्टम को लेकर खासी उत्सुकता है। दसवीं के छात्र के पिता और पेशे से आर्किटेक्ट गाजियाबाद के अरविंद भटनागर कहते हैं, जमाना कॉपीटिशन का है और नवीं-दसवीं से उसी के हिसाब से बच्चे तैयारी में जुटते हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के सलेबस और नवीं से बाहरवीं की पढ़ाई के बीच अगर तालमेल नहीं रहा तो भी बच्चों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अग्रवाल क्लासेज में दसवीं के बच्चों को विज्ञान पढ़ाने वाले राधाकृष्ण 10वी के बजाए 12वी की बोर्ड परीक्षा में राहत को ज्यादा जरूरी मानते हैं। राधाकृष्ण के मुताबिक, बोर्ड परीक्षा का डर कम करने की कोशिश में सलेबस को छोटा करने जैसे उपाय भी शामिल होते तो ज्यादा बेहतर रहता। सिब्बल के इन सुधारों के मुखर आलोचक और राष्टï्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा से जुड़े रहे अनिल सदगोपाल के शब्दों में यह सब सतही कवायदें हैं। बोर्ड परीक्षा के बजाए सतत व समग्र मूल्यांकन का विचार 1986 में नई शिक्षा नीति के समय का है। सतत मूल्यांकन का विचार तो अच्छा है लेकिन भारत में बड़ी तादाद ऐसे स्कूलों की है जहां सतत मूल्यांकन के लिए पर्याप्त शिक्षक व संसाधन मौजूद नहीं हैं। अब जिस तरह से इसे लागू कराया जा रहा है उससे महंगे प्राइवेट और अच्छे सरकारी स्कूल ही इसका फायदा उठा पाएंगे। सदगोपाल सवाल उठाते है कि जिस देश में दो-तिहाई हाईस्कूल ऐसे हो जहां 12वीं की पढ़ाई नहीं होती। अगर इतनी बड़ी तादाद में छात्रों को दूसरे स्कूल में दाखिले की वजह से ऑन डिमांड परीक्षा देने पड़े तो बोर्ड परीक्षा खत्म करने का क्या फायदा। सीबीएसई के 11000 से ज्यादा स्कूलों के करीब 8 लाख से ज्यादा छात्र इस चर्चित बदलाव से गुजरने जा रहे हैं। छात्रों और उनके अभिभावकों में बोर्ड परीक्षा से निजात से ज्यादा बैचेनी इस बात को लेकर भी है कि अब क्लास में अव्वल आने के लिए उन्हें क्या-क्या करना होगाï? होनहार, होशियार और समझदार अच्छे बच्चे कहलाने के नए मापदंड क्या होंगे? सफलता और हताशा के बीच 90.1 और 90.2 फीसदी जितनी संकरा फासला खड़ा कर चुके पेरेंट्स, टीचर और एडमिशन कट ऑफ के सामने 81 से लेकर 90 फीसदी अंक लाने वालों को एक ही कटेगरी में देखना नया तजुर्बा होगा।

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