23.4.09

खातों में हैं करोड़ों रुपये फिर भी बढ़ा दी फीस

छठे वेतन आयोग के बहाने भारी फीस वृद्धि करने वाले कई स्कूलों के खातों में करोड़ों रुपये जमा हैं। नामी प्राइवेट स्कूलों के खातों में जमा धन से पर्दा उठाने की तमाम कोशिशें अभी तक नाकाम रही हैं। बिजनेस भास्कर की खोजबीन में यह बात सामने आई कि खातों में करोड़ों रुपये होने के बावजूद इन स्कूलों ने बच्चों के मां-बाप पर फीस वृद्धि का बोझ लाद दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट में फीस वृद्धि मामले पर दायर जनहित याचिका में 14 स्कूलों की बैलंेस शीट का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, वर्ष 2004-05 में जी.डी. गोयनका स्कूल के खातों में नेट सरप्लस के तौर पर करीब 2.84 करोड़ रुपये की रकम दिखाई गई है। स्कूल का कुल बैंक बेलेंस भी 2.04 करोड़ रुपये है। इसी तरह अहलोन पब्लिक स्कूल का नेट सरप्लस 6.12 करोड़ व फिक्सड डिपोजिट 1.05 करोड़ रुपये है। बिड़ला विद्या निकेतन का नेट सरप्लस 1.24 करोड़ और फिक्सड डिपोजिट 5.80 करोड़ रुपये है। जनहित याचिका में इनके अलावा जिन स्कूलों के खातों का जिक्र किया गया है उनमें डीएवी पब्लिक स्कूल सरिता विहार, बाल भवन पब्लिक स्कूल मयूर विहार, न्यू एरा पब्लिक स्कूल मायापुरी आदि शामिल हैं। इन सभी के बैंक बैलेंस और सरप्लस के तौर पर बड़ी धनराशि दिखाई गई है। खातों में मौजूद पर्याप्त फंड के बावजूद इन स्कूलों ने छठे वेतन आयोग के मुताबिक अध्यापकों को वेतन देने के नाम पर फीस 500 रुपये महीने तक बढ़ा दी है। दो साल के एरियर का भुगतान करने की वजह से हरक छात्र के अभिभावक पर औसतन 5,000 से 10,000 रुपये का भार पड़ रहा है। मामले पर स्कूलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि स्कूल अपने खातों में मौजूद करोड़ों रुपये के फंड का इस्तेमाल करने के बजाए शिक्षकों के बढ़े वेतन का बोझ अभिभावकों पर डाल रहे हैं। स्कूलों के एकाउंटिंग सिस्टम को गैरकानूनी करार देते हुए अग्रवाल कहते हैं कि कई स्कूल कैपिटल एक्सपेंडिचर और डेप्रीसिएशन के मामले में हाईकोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं। 30 अक्टूबर 1998 को दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संस्थाएं अथवा ट्रस्ट कैपिटल एक्सपेंडिचर और डेप्रीसिएशन के मद में छात्रों से फीस नहीं वसूल सकते। लेकिन जीडी गोयकना स्कूल ने वर्ष 2004-05 में इसी मद में करीब 3.29 करोड़ रुपये चार्ज किए हैं।

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