23.4.09

पेचीदे नियमों में उलझी सेज की रौनक

स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) में मिलने वाली टैक्स सुविधाओं से जुड़े नियमों के पेचीदा होने का खमियाजा सेज डेवलपर्स और वहां जाने की तैयारी कर रही कंपनियों को भुगतना पड़ रहा है। एक तो आर्थिक संकट के चलते सेज में जगह की मांग कम है, दूसरे सेज में जाने के फायदों को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। इसी का नतीजा है कि तेजी के दौर में सेज की होड़ मचाने वाले डेवलपर्स अब इन परियोजनाओं को घाटे का सौदा मान रहे हैं। देश भर में 274 सेज नोटिफाइड हैं, लेकिन सिर्फ 88 सेज में ही उत्पादन शुरू हुआ है। इन 88 में भी जमीन का बड़ा हिस्सा खाली है। सेज में जगह की मांग में कमी देख डेवलपर्स अब सेज प्रोजेक्ट सरेंडर करने का रास्ता चुन रहे हैं। अंसल एपीआई के कार्यकारी निदेशक (मार्केटिंग) आरके जैन ने बिजनेस भास्कर को बताया कि सेज से जुड़े कानूनी प्रावधान पेचीदा हैं। सेज इलाकों में उद्योगों की स्थापना के बाद मिलने वाले फायदों के मामले में भी स्थिति उलझी हुई है। कई मामलों में तो इंजीनियरिंग इकाइयों को सेज में मिलने वाली सहूलियतें सेज के बाहर पहले से मिल रही सुविधाओं से भी कम हैं। जैन के मुताबिक, अंसल के सोनीपत, गुड़गांव और ग्रेटर नोएडा में करीब 140 हेक्टेअर क्षेत्रफल के तीन सेज नोटिफाई हो चुके हैं, लेकिन अभी तक एक भी औद्योगिक इकाई या कंपनी यहां नहीं आई है। सेज को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा और राज्य सरकारों से जरूरी मदद न मिलने की वजह से भी डेवलपर्स को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सेज मामलों से जुड़े कानूनी विशेषज्ञ हितेंद्र मेहता का कहना है कि सेज में टैक्स रियायतों को लेकर स्थिति स्पष्ट कर पाने में सरकार नाकाम रही है। खासतौर पर सर्विस टैक्स को लेकर कंपनियों में असमंजस की स्थिति है। मार्च 2009 में आए सर्विस टैक्स नोटिफिकेशन के तहत सेज यूनिट को मिलने वाली सर्विस टैक्स में छूट के प्रावधान को समाप्त कर इसकी जगह टैक्स रिफंड की व्यवस्था की गई है। यह रिफंड सेज यूनिट को स्थानीय एक्साइज कमिश्नर कार्यालय के जरिए मिलेगा। ऐसे प्रावधान सेज की मूल अवधारणा के खिलाफ हैं और सेज के प्रति लोगों को हतोत्साहित करते हैं। हालांकि इस बीच सेज यूनिट के कांट्रैक्टर को मिलने वाली सुविधाओं का विस्तार कर इसे सब-कांट्रैक्टर तक बढ़ाने जैसे कदम भी सरकार ने उठाएं हैं। मेहता मानते हैं कि छूट के प्रावधानों में कुछ उलझन होने के बावजूद अब भी निर्यातोन्मुख उद्योगों के लिए सेज के ज्यादा किफायती कोई दूसरा क्षेत्र या योजना नहीं है। देश की प्रमुख रियल एस्टेट परामर्शदाता कंपनी जॉन लांग लाशैल मेघराज से जुड़े दिविक ओसवाल का कहना है कि वैश्विक आर्थिक स्थितियों की वजह से भी सेज में जगह लेने वालों की तादाद काफी कम है। बड़ी संख्या में सेज प्रोजेक्ट रोके भी गए हैं। स्थिति यह है कि सेज में जगह पाने की इच्छुक इकाइयों के पास भी बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं। दिविक के मुताबिक, उलझे नियमों के मुकाबले आर्थिक स्थितियों ने सेज को ज्यादा प्रभावित किया है। मध्य प्रदेश में अभी तक 21 सेज प्रोजेक्ट स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन सिर्फ एक में कंपनियों के द्वारा उत्पादन शुरू हो पाया है। मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम इंदौर लिमिटेड के 1113 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित हो रहे मल्टी प्रोडक्ट सेज में अब तक 42 कंपनियों को जमीन आबंटित की गई है और 12 इकाइयों में उत्पादन शुरू हुआ है। इसके अलावा चार प्रोजेक्ट के आधारभूत ढांचे का निर्माण कार्य चल रहा है। ये हैं एमपीएसआईडीसी, मेडीकेप आई.टी. पार्क, पाव्श्र्रनाथ डेवलपर्स का इंदौर स्थित सेज और म.प्र. औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड का जबलपुर स्थित सेज। इनमें अब तक किसी भी कंपनी ने रुचि नहीं दिखाई है। इंदौर क्रिस्टल आईटी पार्क के लिए दो बार टेंडर हो चुके हैं लेकिन बोली लगाने वाली कंपनियां अभी तक आगे नहीं आई हैं। जयपुर के निकट अजमेर रोड पर महापुरा में महिंद्रा एण्ड महिंद्रा द्वारा विकसित किए जा रहे राजस्थान के पहले सेज महिंद्रा वल्र्ड सिटी पर भी पर आर्थिक संकट का साया दिखाई दे रहा है। सेज में विकसित किए जा रहे हैंडीक्राफ्ट जोन में इकाई लगाने के लिए जमीन बुक कराने वाले उद्यमी विश्व बाजार में मंदी और निर्यात में कमी को देखते हुए अब परियोजनाओं को अगले साल तक टालने का मन बना रहे हैं। महिंद्रा वल्र्ड सिटी के बिजनेस डेवलपमेंट हेड अशीष माथुर का दावा है कि इस सेज में आईटी, लाइट इंजीनियरिंग और हैंडीक्राफ्ट जोन में 26 कंपनियों ने इकाई लगाने के लिए अनुंबंध किया है और इन्फोसिस समेत चार कंपनियों ने काम भी शुरू कर दिया है। लेकिन दूसरी तरफ हैंडीक्राफ्ट जोन में इकाई के लिए जमीन बुक कराने वाले संकल्प हैंडीक्राफ्ट के निदेशक गिरीश अग्रवाल का कहना है कि आर्थिक संकट के कारण हैंडीक्राफ्ट निर्यात में गिरावट को देखते हुए मौजूदा इकाइयों को चलाना भी आसान नहीं है। ऐसे में अब वो अगले वर्ष ही सेज में इकाई का काम शुरू करने के बार में सोचेंगे। इसी तरह सेज में हैंडीक्राफ्ट इकाई के लिए दो एकड़ भूमि लेने वाले लक्ष्मी इंटरनेशनल के निदेशक रवि उत्मान का कहना है कि मंदी के मौजूदा दौर में सेज में नई इकाई स्थापित करने की योजना को हमने फिलहाल अगले वर्ष तक के लिए टाल दिया है। (साथ में नई दिल्ली से शशि झा, जयपुर से प्रमोद शर्मा और भोपाल से धर्मेद्र भदौरिया) पर सरकार की नजर में सब कुछ ठीक है नई दिल्ली। सेज को लेकर भले ही सैकड़ों सवाल उठ रहे हों, लेकिन सरकार की नजर में सब कुछ ठीक है। वाणिज्य मंत्रालय के अधीनस्थ सेज और निर्यातोन्मुख इकाइयों के महानिदेशक डा. एल बी सिंघल के मुताबिक सेज के नियमों में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। उनका कहना है कि नए सेज में लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है। सिंघल ने कहा कि सार नियमों का सेज अधिनियम में उल्लेख किया जा चुका है और इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अस्पष्ट कहा जाए। उन्होंने कहा, अगर किसी को ऐसा लगता है कि नियमों या प्रावधानों में कोई बात अस्पष्ट है तो उसे तत्काल मुझसे या वाणिज्य मंत्रालय से संपर्क करना चाहिए।त्न सिंघल ने इसे भी गलत बताया कि सेज में अधिसूचित कई कंपनियां अब गैर-अधिसूचित (डी-नोटिफाई) होने के लिए आवेदन कर रही हैं। उन्होंने कहा, त्नमेरी जानकारी में कहीं से भी ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है। यह जरूर है कि किसी अधिसूचित सेज में अगर कोई गतिविधि शुरू नहीं हुई है या उससे कर छूट का लाभ हासिल नहीं किया गया है तो उसकी ओर से डी-नोटिफाई करने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

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