23.4.09

फर्जी डिग्रियों पर ढीला है कानून का शिकंजा

फर्जी यूनिवर्सिटी खोलकर देश के लाखों नौजवानों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले की सजा क्या है? जवाब है- सिर्फ एक हजार रुपये। देश में उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने फर्जी विश्वविद्यालय खोलकर शिक्षा का गोरखधंधा करने वालों के लिए बस इतनी ही सजा का इंतजाम किया है। हैरानी की बात तो यह है कि पिछले करीब 55 साल से छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर जुर्माने की रकम में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ रहा फर्जीवाड़ा और छात्रों से धोखाधड़ी का धंधा ऐसे ही लचर नियम-कायदों की वजह से फल-फूल रहा है। देशभर में कथित तौर पर बगैर-मान्यता प्राप्त कॉलेज खोलने के मामले में इक्फाई यूनिवर्सिटी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे एडवोकेट पी.एस. सिंह बताते हैं कि 1956 में बने यूजीसी एक्ट में फर्जी यूनिवर्सिटी संचालित करने वालों के खिलाफ सजा के तौर पर सिर्फ एक हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। सिंह के मुताबिक उच्च शिक्षा में छात्रों से धोखाधड़ी रोकने के जितने लचर कानून हैं उससे ज्यादा ढील तो नियामक संस्थाओं की ओर से बरती जा रही है। यूजीसी की ओर से जारी की जाने वाली फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची पर सवाल उठाते हुए सिंह कहते हैं कि देशभर से सिर्फ 21 संस्थानों को इसमें शामिल किया गया है। गौरतलब है कि बंगलुरू, हैदराबाद और देहरादून समेत कई शहरों में छात्रों की ओर से इक्फाई यूनिवर्सिटी के खिलाफ गैर-कानूनी तरीके से कॉलेज चलाने को लेकर विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इक्फाई यूनिवर्सिटी पर आरोप है कि वह देशभर में यूजीसी व एआईसीटीई से मान्यता न रखने वाले इंजीनियरिंग और एमबीए के कॉलेज चला रही है। इस बारे में इक्फाई के रजिस्ट्रार को बिजनेस भास्कर की ओर से भेजे गए ई-मेल का सप्ताह भर बाद भी कोई जवाब नहीं मिला है। इक्फाई के अलावा आईएएसई राजस्थान, इलाहाबाद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम-देहरादून भी नियामक संस्थानों से मान्यता को लेकर विवादों में रहे हैं। ऐसे संस्थानों की तादाद सैकड़ों में है जो एआईसीटीई से मान्यता के बगैर एमबीए-बीटेक जैसे कोर्स चला रहे हैं। तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा की नियामक संस्था ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के ढुलमुल रवैये का नतीजा यह है कि तीन साल पहले गैर मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची जारी होने के बावजूद इसमें शामिल 200 से ज्यादा संस्थान धड़ल्ले से चल रहे हैं। हर साल ऐसे फर्जी संस्थाओं के हाथों देशभर के हजारों छात्र का कैरियर बर्बाद होता है। तकनीकी शिक्षा की नियामक संस्था एआईसीटीई सिर्फ संस्थाओं की काली सूची जारी करने और नए संस्थानों को मान्यता देने तक सीमित है। फर्जी विश्वविद्यालयों के मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का रवैया भी सवालों के घेरे में रहा है। गत वर्ष जून में यूजीसी की ओर से आईआईपीएम को फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल किया गया, लेकिन मामला हाईकोर्ट में पहुंचा तो यूजीसी अपना पक्ष भी ठीक से नहीं रख पाई और बाद में संस्थान का नाम फर्जी सूची से हटाना पड़ा। भी टैक्स चुका रही थी। राजू बंधुओं ने वास्तव में खाता-खतौनी प्रणाली में मौजूद खामियों का फायदा उठाया है। उनके काम करने का ढंग यह था कि पहले राजू यह तय करता था कि कितनी झूठी रकम दिखानी है उसके बाद वी श्रीनिवास और अन्य मिलकर उसके लिए फर्जी इनवाइस दिखाते थे। जब इनवाइस तैयार हो जाती थी तब वे उसके लिए रसीद भी फर्जी बनाते थे। श्रीनिवास की कोशिश रहती थी कि यह मामला दूसरों की नजर में न आए। वाईटूके के दौर में भारी मुनाफा कमाने वाली कंपनी सत्यम ने 2002-03 के बाद शेयर बेचना शुरू कर दिया था। 2006 में प्रमोटरों की हिस्सेदारी घटकर 8.5 फीसदी पर आ गई थी।

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