23.4.09

रिटेल कंपनियों पर भारी पड़ रहा महंगा कर्ज

वित्त वर्ष 2008-09 की आखिरी तिमाही के लिए रिटेल कंपनियों के वित्तीय नतीजे इस कारोबार की मुश्किलों की तस्वीर पेश करेंगे। साल की चौथी तिमाही में रिटेल कंपनियां भले ही स्टोर किराये कम करवाने में कामयाब रही हों, लेकिन इसका असर बैलेंस शीट पर दिखने में वक्त लगेगा। विशाल रिटेल जैसी रिटेल कंपनियों के सामने तो शुद्ध मुनाफे के बजाय शुद्ध घाटा झेलने का संकट है, जबकि शॉपर्स स्टॉप पिछली तीन तिमाहियों से लगातार घाटा दिखा रही है। बिक्री में बढ़ोतरी और किराये समेत कई दूसरे खर्चे में कटौती के बावजूद उत्तर भारत की प्रमुख रिटेल कंपनी विशाल रिटेल का शुद्ध मुनाफा लगातार कम हो रहा है। मार्केट रिसर्च फर्म एंजल ब्रोकिंग के रिटेल विशेषज्ञ राघव सहगल का आकलन है कि विशाल रिटेल को महंगे कर्ज के चलते शुद्ध घाटा उठाना पड़ सकता है। 31 मार्च को समाप्त तिमाही में विशाल रिटेल की बिक्री से हुई आमदनी तकरीबन 340 करोड़ रुपये के आसपास रह सकती है, लेकिन कर्ज के ब्याज के तौर पर कंपनी को जो भुगतान करना है उससे वह शुद्ध मुनाफे के बजाए शुद्ध घाटे की स्थिति में पहुंच सकती है। इस बारे में विशाल रिटेल के सीईओ अंबिक खेमका का कहना है कि आर्थिक सुस्ती के दौर में कंपनी अगर घाटा दर्ज करती है तो इसमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए। गत दिसंबर माह में समाप्त तीसरी तिमाही में विशाल रिटेल ने 29.57 करोड़ रुपये ब्याज के तौर पर खर्च किए थे जिस वजह से उसका शुद्ध मुनाफा साल भर पहले के 15.5 करोड़ रुपये से घटकर सिर्फ 2.15 करोड़ रुपये रह गया था। सहगल का मानना है कि स्टोर किराये में कमी का असर कंपनी की वित्तीय सेहत पर नजर आने में दो-तीन तिमाहियों का समय लग सकता है। किराये में 20 फीसदी तक की कमी करने वाले रिटेलर को इसके बूते शुद्ध मुनाफे में कुल बिक्री के मुकाबले आधा फीसदी से ज्यादा का फायदा नहीं मिल पाएगा। पिछली तीन तिमाहियों से शुद्ध घाटा झेल रही शॉपर्स स्टॉप की ओर से क्रॉसवर्ड जैसे कई स्टोर बंद किए जाने के बावजूद उसके सामने घाटे को बढ़ने से रोकने की चुनौती है। गत दिसंबर माह में समाप्त तिमाही में कंपनी 20.45 करोड़ रुपये के घाटे में थी, जबकि उसकी कुल बिक्री में बढ़ोतरी देखी गई थी।

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