12.5.09
केंद्र-राज्यों की रस्साकशी में फंसी बसों की खरीद
केंद्र सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश के 54 शहरों में 14 हजार नई बसें चलाने में देरी हो रही है। केंद्र सरकार के जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) कार्यक्रम के तहत होने वाली बसों की इस खरीद को राज्य सरकारों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार की ओर से पहली किस्त जारी हो जाने के बाद भी ज्यादातर राज्यों ने बसों की खरीद के ऑर्डर नहीं दिए हैं। जिन चार राज्यों ने ऑर्डर दिए हैं वहां की सरकारों ने बस निर्माताओं को अग्रिम भुगतान नहीं किया है।
केंद्रीय शहरी विकास सचिव एम. रामाचंद्रन ने राज्य के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा है कि दूसरे राहत पैकेज में घोषित 14,240 बसों की खरीद की योजना सिर्फ 30 जून 2009 तक खुली है। इसके लिए खरीद के ऑर्डर 31 मार्च 2009 तक दिए जाने थे। उधर, बस निर्माता कंपनियों के संगठन सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (सियाम) का कहना है कि बंगलुरू जैसे एक-दो शहरों को छोड़कर 20 मार्च तक किसी भी शहर के लिए बसों का ऑर्डर नहीं मिला था।
ऐसी स्थिति में बस निर्माताओं के लिए 30 जून 2009 तक 14,000 बसों की आपूर्ति कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय मेंविशेष कार्याधिकारी (एमआरटीएस) एस.के. लोहिया की ओर से राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में साफ कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से बसों की खरीद के लिए फंड की पहली किस्त जारी हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकारों के हिस्से का पैसा जारी नहीं किया जा रहा है। बस निर्माता कंपनियों को किसी भी ऑर्डर में अग्रिम राशि का भुगतान नहीं हुआ है। गौरतलब है कि दूसरे राहत पैकेज के तहत इन 14,240 बसों की खरीद के लिए तकरीबन 5000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज दिए गया था।
केंद्र सरकार के दबाव के बावजूद अभी तक सिर्फ चार राज्यों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल ने बसों की खरीद के ऑर्डर दिए हैं। वहीं, दूसरी ओर दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात ने अभी तक बसों के ऑर्डर नहीं दिए हैं। कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में जेएनएनयूआरएम को अपनी अहम उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। हालांकि, जेएनएनयूआरएम के तहत केंद्र सरकार सिर्फ 50 फीसदी पैसा ही खर्च करती है। बाकी पैसा राज्य सरकारों और स्थानीय निकाय को खर्च करना पड़ता है।
कई राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय कांग्रेस के फ्लैगशिप यानी मुख्य कार्यक्रम में आधा या आधे से ज्यादा पैसा देने से हिचकचा रहे हैं। जिस आक्रामक रुख के साथ कांग्रेस ने भारत निर्माण कार्यक्रम का प्रचार किया है उस वजह से भी कई राज्यों से समर्थन मिलने की गुंजाइश कम हो गई है। इसके अलावा कई स्थानीय निकायों की आर्थिक स्थिति भी आड़े आ रही है।
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