21.2.09

दून स्कूल की रजिस्ट्रेशन फीस 36 हजार रुपये

अजीत सिंह सरकार ने स्कूलों से मुनाफा कमाने पर पाबंदी भले ही लगा रखी हो लेकिन कई नामचीन स्कूल शिक्षा के कारोबार से पैसा कूटने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल में कक्षा सात की प्रवेश परीक्षा की रजिस्ट्रेशन फीस के तौर पर 36,000 हजार रुपये वसूले जाने का मामला सामने आया है। दून स्कूल के इस कारनामे की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्रालय को की गई है। शिक्षा के अधिकार पर सक्रिय संस्था सोशल ज्यूरिस्ट से जुड़े अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने दून स्कूल की ओर से दाखिले में भी आर्थिक आधार पर भेदभाव की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्री अजरुन सिंह से की है। जल्द ही इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर किए जाने की तैयार चल रही है। अजरुन सिंह को भेजे शिकायती पत्र में अशोक अग्रवाल ने लिखा है कि दून स्कूल कक्षा सात और आठ में दाखिले के इच्छुक छात्रों से प्रवेश परीक्षा की रजिस्ट्रेशन फीस के तौर पर 36,000 रुपये वसूल रहा है और 1000 रुपये स्कूल प्रोस्पेक्टस के नाम पर लिए जा रहे हैं। यानी 37000 रुपये की रकम सिर्फ स्कूल की प्रवेश परीक्षा के लिए है। इसमें सफल पाए जाने पर छात्र को इंटरव्यू से गुजरना होता है। इंटरव्यू में सफल करार दिए जाने के बाद ही दाखिले पर मुहर लगती है। आगामी सत्र में कक्षा सात और आठ में दाखिले के लिए करीब 950 छात्रों ने दून स्कूल में एंट्रेंस का रजिस्ट्रेशन कराया था, जिसमे से कक्षा आठ में सिर्फ 22 छात्रों को दाखिला मिला है। इस प्रकार दाखिला न मिल पाने वाले छात्रों से ही दून स्कूल ने करीब 3.25 करोड़ रुपये की कमाई कर ली। उल्लेखनीय है कि प्रवेश परीक्षा की इस फीस के अलावा दून स्कूल की सालाना फीस तीन लाख रुपये से ज्यादा है। बिजनेस भास्कर से बातचीत में इस बाबत शिकायत करने वाले अशोक अग्रवाल ने कहा है कि दून स्कूल की ओर से वसूली जा रही यह मोटी फीस आर्थिक आधार पर छात्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने वाला काम है। हैरानी की बात यह है कि दून स्कूल एक नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड है। अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने के लिए सरकार ने कोई स्पष्ट नियम-कानून नहीं बनाया है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। इस मामले पर शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर जयंती राजन का कहना है कि शिक्षा में जहां भी ज्यादा मुनाफा कमाने की गुजाइश है जैसे प्ले स्कूल और रेजीडेंशियल स्कूल, उनके लिए सरकार ने नियम-कायदे ही तय नहीं किए हैं। आर्थिक आधार पर समाज में वर्ग भेद बढ़ाने वाला दून स्कूल देश का अकेला स्कूल नहीं है, तमाम दूसरे स्कूल भी वर्षे से यही करते आ रहे हैं।

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