2.8.10
राजस्थान में नरेगा के पैसे से लैपटॉप
गरीबों को रोजगार की गारंटी पर खर्च होने वाले पैसा भ्रष्टïाचार के रास्ते रिसता हुआ कंप्यूटर और लैपटॉप तक पहुंच गया है। नियमों को ठेंगा दिखाकर राजस्थान में अफसरों ने महात्मा गांधी राष्टï्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के पैसे का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कंप्यूटर और लैपटॉप खरीदने में कर डाला। इसके अलावा भी सामग्री की खरीद में कई तरह धंाधलियां उजागर हुई हैं। खुद राज्य सरकार की जांच में इस योजना में भ्रष्टïाचार का नया रूप समाने आया है, जो योजना के निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े करता है।
राजस्थान सरकार की जांचमें उजागर हुआ है कि पांच जिलों में भवऐण के पैसे से कंप्यूटर, लैपटॉप और एयर कंडीशनर आदि खरीदे गए और इनकी खरीद में कई गड़बडिय़ां हुईं। कई जिलों में कंप्यूटरों की खरीद पूरी तरह से सरकारी नियमों की अनदेखी कर हुईं। न टेंडर मंगाए गए और न ही अधिकृत फर्मों से खरीद हुई। टोंक में 1 करोड 11 लाख, दौसा में 78 लाख, डूंगरपुर में 85 लाख और हनुमान गढ़ में 79 लाख रुपये की कंप्यूटर खरीद में अनियमितता की बात खुद राज्य सरकार की जांच में सामने आई है। करौली जिले में तो पंचायतों के लिए 150 लैपटॉप खरीदे गए जबकि बांसवाड़ा में मनेरगा के पैसे का इस्तेमाल एयर कंडीश्नर खरीदने में हुआ। मनरेगा में 60 फीसदी पैसा मजदूरी और 40 फीसदी निर्माण सामाग्री आदि पर खर्च के लिए दिया जाता है। अब भ्रष्टï तंत्र का निशाना सामग्री मद है।
सूचना के अधिकार के तहत इन गड़बडिय़ों की जानकारी हासिल करने वाले सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान के निखिल डे कहते हैं कि मनरेगा में अभी तक मजदूरी से जुड़े भ्रष्टïाचार के मामले सामने आते थे लेकिन अब सामग्री में ज्यादा भ्रष्टïाचार हो रहा है। जिला स्तर पर कलेक्टर ही योजना का कार्यक्रम समन्वयक होता है और सारी खरीद उसी की देखदेख में होती है। सामग्री की खरीद में बड़े पैमाने पर धांधलियों के बावजूद बड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, राजस्थान के मनरेगा कमिश्नर राजेंद्र भानावत ने अपनी जांच में कंप्यूटर खरीद में धांधली के लिए डंूगरपुर की तत्कालीन जिला कलेक्टर डॉ. आरुषी मलिक को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें बर्खास्त करने की सिफारिश की है। लेकिन किसी भी अधिकारी के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
राजस्थान केंद्र सरकार की रोजगार गांरटी योजना के तहत सबसे ज्यादा धन हासिल करने वाला राज्य है। इस खर्च की जमीनी हकीकत जांचने के लिए हुए सोशल ऑडिट यानी सामाजिक अंकेक्षण को स्थानीय दबंगों और नेताओं के विरोध का सामाना करना पड़ा था जिसके बाद सरकार ने सोशल ऑडिट पर ही रोक लगा दी। लेकिन राज्य के 18 जिलों की जिन 18 पंचायतों को मनरेगा के तहत सामग्री के लिए सबसे ज्यादा पैसा मिला, उनकी विशेष जांच करवाई गई तो मालूम पड़ा कि करीब 4 करोड़ रुपये की सामग्री का कहीं नामो-निशान नहीं है। यह सीधे गबन का मामला है, लिहाजा सरकार ने पंचायतों से यह पैसा वापस वसूलने का फैसला किया है। डंंूगरपुर जिले की झरनी ग्राम पंचायत में 63 लाख रुपये सामग्री मद में खर्च किए गए लेकिन मौके पर पाया गया कि करीब 58 लाख रुपये का भुगतान बिना सामग्री खरीदे ही कर दिया गया है। अजमेर जिले में मालतो की बेर पंचायत से 1 करोड़ 31 लाख रुपये की वसूली की जानी है, क्योंकि यह पैसा सिर्फ कागजों में खर्च किया गया। इन गड़बडिय़ों के बाद सिर्फ पांच जिलों में सरपंच और नरेगा से जुड़े स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, जबकि अन्य मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
राजस्थान के पंचायती राज मंत्री भरत सिंह मानते हैं कि इन गडग़डिय़ों के लिए निगरानी करने वाली एजेंसी भी जिम्मेदार है और भ्रष्टïाचार के इन मामलों में शामिल बड़े अधिकारियों को भी बख्शा नहीं जाएगा।
मनरेगा में भ्रष्टïाचार के इस नए रूप से चिंतित निखिल डे कहते हैं कि पंचायत स्तर पर करोड़ों की लूट के लिए मौका मिल रहा है जो स्थानीय स्तर पर नेताओं और अधिकारियों के सरंक्षण में पल रहे गुंडा तंत्र को खाद-पानी देने का काम करेगा। यह और भी ज्यादा खतरनाक है।
निखिल की चिंता झारखंड के पलामू में यांकी क्षेत्र की घटना से भी समझ में आती है। तेरह मई 2010 को ग्राम स्वराज अभियान के तीन कार्यकर्ताओं लाडले सिंह, दामोदर सिंह, रवींद्र ओरांव और बांसीखुर्द गांव के सुदामा को एक गुंडों ने बुरी तरह पीटा और बंधक बनाकर एक विधायक के घर ले आए।
स्थानीय जनसंगठन ग्रामीण स्वराज अभियान के कार्यकर्ता पिछले एक साल से इस इलाके में मनरेगा सहायता केंद्र चला रहे हैं, जो स्थानीय मजूदरों को योजना के तहत काम लेने तथा समय पर भुगतान हासिल करने में मदद करता है और गड़बड़ी की स्थिति में शिकायत भी करता है। मनरेगा से पैसा बनाने वाले ठेकेदारों को अभियान की यही सक्रियता नागवार गुजरी। ऐसा समझा जाता है कि ये स्थानीय ठेकेदार विधायक के आदमी हैं। एक बार जब ठेकेदार सबल खान उर्फ मुन्ना खान मजदूरों के बजाय मशीन का इस्तेमाल कर रहे थे तो सहायता केंद्र ने इसकी शिकायत डिप्टी कमिश्नर से की और मशीन का इस्तेमाल रुकवाया। इस केंद्र की कोशिशों ने जहां ठेकेदारों के लिए फर्जीवाड़ा करना मुश्किल कर दिया वहीं मजदूर योजना का पूरा फायदा उठाने लगे। फिर क्या था, गुंडों ने अभियान के कार्यकर्ताओं को धमकाना और इलाका छोडऩे की धमकियां देनी शुरू कर दीं।
हालिया मामला पांकी के विधायक विदेश सिंह के भाई की जमीन पर तालाब के निर्माण का है। मजदूरों ने नियमों के उल्लंघन और भुगतान न मिलने के डर से यहां काम करने से मना कर दिया और मामले की शिकायत जिला कलेक्टर से की। इसके बाद आंगनबाड़ी केंद्र में सेविका के चयन को लेकर भी गुंडों और बंसीखुर्द गांव की महिलाओं के बीच विवाद हुआ और गुंडों ने इन महिलाओं की पिटाई कर दी। इन्हीं लोगों ने ग्रामीण स्वराज अभियान के कार्यकर्ताओं को भी मारा-पीटा। मामले की जानकारी मिलने के बाद प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और मनरेगा राष्ट्रीय परिषद सदस्य जां द्रेज समेत अभियान के कई लोग मौके पर पहुंचे और कार्यकर्ताओं को छुड़ाकर 11 गुंडों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जो विधायक विदेश सिंह के आस-पास देखते जाते हैं।
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