2.8.10

अमूल पर भाजपा का वर्चस्व

एशिया और प्रशांत क्षेत्र की सबसे बड़ी डेयरी अमूल में वर्चस्व की जंग चार साल बाद ठीक उसी मोड़ पर आ पहुंची जहां से इसके संस्थापक और तीन दशक तक सर्वेसर्वा रहे डॉ. वर्गीज कुरियन की विदाई हुई थी। इस बार भी अमूल के ब्रांड नाम से दूध-उत्पादों की मार्केटिंग करने वाली संस्था गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) के अध्यक्ष पार्थी भाई भाटोल पर इस्तीफे का दबाव था लेकिन एक दिन के भीतर पलटी बाजी में अमूल की सत्ता पर भाजपा ने अपना दबदबा साबित कर दिया। भाजपा नेताओं की मदद से पार्थी भाटोल अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे और प्रबंध निदेशक बीएम व्यास को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। प्रबंध निदेशक और चेयरमैन के बीच चली रस्साकशी में अमूल ब्रांड ख्याति के इस सहकारी संघ में राजनीतिकरण का नया अध्याय शुरू हो गया है। अमूल नाम के जिस सहकारी आंदोलन की बुनियाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और मोरारजी देसाई ने रखी और डॉ. वर्गीज कुरियन ने जिसे आकार दिया,उसमेंं सत्ता की चाबी अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में जा पहुंची है। अमूल में हालिया रस्साकशी की शुरुआत तब हुई जब इसके 13 बोर्ड सदस्यों, जो गुजरात की 13 जिला डेयरी यूनियनों के अध्यक्ष भी हैं, ने फेडरेशन चेयरमैन पार्थी भाई भाटोल पर पद छोडऩे का दबाब बनाना शुरू किया। डॉ. कुरियन को भी ठीक ऐसे ही हालात में फेडरेशन का अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ा था और बनास डेयरी यूनियन के अध्यक्ष भाटोल चेयरमैन बने थे। भाटोल के इस्तीफे की शर्त रखते हुए ज्यादातर सदस्यों ने 8 मई और 25 मई को हुई बोर्ड बैठकों का बहिष्कार तक किया। इस बीच अमूल के खातों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से ऑडिटर की नियुक्ति का विरोध करते हुए फेडरेशन के प्रबंधन निदेशक बी.एम. व्यास ने इस्तीफा दे दिया। हांलाकि ब्यास का कार्यकाल 30 नवंबर को पूरा होने वाला था लेकिन समय से पहले दिए इस इस्तीफे ने भाटोल की मुश्किलें और बढ़ा दीं। व्यास के इस्तीफे के फैसलों को साजिश करार देते हुए भाटोल ने इसे उनके तख्तापटल की कोशिश करार दिया। भाटोल ने आरोप लगाया कि व्यास का इस्तीफा उस साजिश का हिस्सा है जिसके तहत वह गुजरात के पूर्व गृहमंत्री विपुल चौधरी को फेडरेशन अध्यक्ष बनवाकर बदले में अपने कार्यकाल का विस्तार करना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि विपुल चौधरी भाजपा के केशुभाई पटेल के मंत्रिमंडल में रहे और फिर शंकर सिंह वाघेला के साथ भाजपाई बागियों में भी शामिल थे। विपुल चौधरी फिलहाल फेडरेशन के तहत आने वाली प्रमुख डेयरी दुग्धासागर डेयरी यूनियन के अध्यक्ष हैं और अमूल की राजनीति के प्रमुख किरदार हैं। इससे पहले कि भाटोल पर पद छोडऩे का दबाव बढ़ता उन्होंने बड़ा दांव खेला। भाटोल ने व्यास के इस्तीफे को फेडरेशन बोर्ड से स्वीकृति हासिल किए बगैर ही खुद मंजूर कर उन्हें कार्यमुक्त कर दिया। इस तरह आपत्ति जताते हुए कांग्रेस विधायक और खेडा जिला डेयरी यूनियन के अध्यक्ष राम सिंह परमार समेत कई सदस्यों ने इस मुद्दे पर बोर्ड की बैठक बुलाने की मांग की। भाटोल 30 जून को बोर्ड बैठक बुलाने को तैयार भी हुए लेकिन इससे पहले ही उन्होंने तमाम आरोप लगाते हुए ब्यास के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस बैठक में व्यास के इस्तीफे के साथ-साथ भाटोल की किस्मत का फैसला भी होना था। लेकिन इस बीच सभी 13 जिला डेयरी यूनियनों के अध्यक्षों को पत्र लिखकर भाटोल ने ब्यास की कारगुजारियों का कच्चा-चि_ïा खोल माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश की। इस पत्र में भाटोल ने व्यास पर आरोप लगाया कि वर्ष 2006 में डॉ वर्गीज कुरियन को जीसीएमएमएफ के अध्यक्ष पद से हटाने की साजिश व्यास ने ही बोर्ड के सदस्यों के साथ मिलकर रची थी। बोर्ड के कुछ सदस्यों को लामबंद कर इसी तरह का तख्तापलट व्यास भाटोल के खिलाफ भी करना चाहते थे। इसके अलावा उन्होंने व्यास पर कई वित्तीय गड़बडिय़ों और भ्रष्टïाचार के आरोप भी लगाए। इससे पहले कि 30 जून को जीसीएमएमएफ बोर्ड की बैठक में व्यास और भाटोल की किस्मत का फैसला होता, राजनीतिज्ञों की शह पर पूरी बाजी ही पलट गई। अभी तक बोर्ड सदस्यों का जो बहुमत भाटोल के खिलाफ दिख रहा था, वही उनके समर्थन में आ गया। इस बैठक से एक दिन पहले ही 13 में से 8 सदस्यों ने इस बैठक को गैर जरूरी करार देते हुए भाटोल को बड़ी राहत दे दी। इसके बाद 30 जून की बैठक नहीं हुई। इस बीच भाटोल ने व्यास की जगह आर एस सोढ़ी को कार्यकारी प्रबंध निदेशक नियुक्त कर दिया है। माना जा रहा है कि इस भंवर में फंसने के बाद भाटोल ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की शरण ली। उधर, भाटोल विरोधी खेमे और व्यास को प्रमुख समर्थन खेडा जिला डेयरी यूनियन के अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक रामजी परमार और विपुल चौधरी से मिल रहा था। सवाल यह है, जो अधिकांश बोर्ड सदस्य एक महीना पहले तक भाटोल पर पद छोडऩे का दबाव बना रहे थे अचानक इनके समर्थन में कैसे मुड़े? यहीं राजनीति में गुंथ चुकी सहकारिता की तस्वीर देखने को मिलती है। भाटोल के बेटे भाजपा विधायक हैं और जानकारों का मानना है कि भाटोल भाजपा की मदद से अपने 4 पुराने समर्थक सदस्यों के अलावा 4 दूसरे सदस्यों का समर्थन जुटाने में कामयाब रहे। जानकारों का मानना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भाटोल की बैठक के बाद भाजपा के प्रभाव वाले सदस्य भाटोल के पक्ष में झुकने शुरू हुए। जीसीएमएमएफ बोर्ड सदस्यों को भाटोल के पक्ष में करने में गुजरात के सहकारी मंत्री दिलीप सांगवानी ने भी अहम भूमिका निभाई। इस घटनाक्रम को जीसीएमएमएफ पर भाजपा के वर्चस्व के तौर पर देखा जा रहा है भाटोल को जिन 4 बोर्ड सदस्यों से निर्णायक मदद मिली वे हैं- सूरत डेयरी के मनु भाई पटेल, साबरकांठा डेयरी के जेठा भाई पटेल गांधीनगर डेयरी के शंकर सिंह राणा और सुरेंद्र नगर डेयरी के बाबा भाई पंवार। अमूल से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने अपनी पार्टी से जुड़े बोर्ड सदस्यों को भाटोल के खिलाफ न जाने का निर्देश दिया और भाटोल को राहत मिली। इसके अलावा भाटोल ने अपने स्तर पर भी सदस्यों का समर्थन जुटाने का इंतजाम किया। उल्लेखनीय है कि पिछले साल ही भाटोल अपने दूसरे कार्यकाल के लिए तीन साल के लिए फिर से निर्विरोध चुने गए थे। वर्ष 2006 में डा. वर्गीज कुरियन को बोर्ड सदस्यों के एकजुट विरोध के बाद पद छोडऩा पड़ा था और भाटोल चेयरमैन चुने गए थे। उस वक्त उन्हें भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों का समर्थन हासिल था। पिछले साल उपचुनाव में भाटोल के बेटे के भाजपा विधायक बनने के बाद से भाटोल पर भाजपा समर्थक होने के आरोप लगने शुरू हुए। करीब 8,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले अमूल पर हावी होती राजनीति के पीछे गुजरात के करीब 28 लाख दुग्ध उत्पादक और करीब 1 करोड़ से ज्यादा का वोट बैंक भी बड़ी वजह है। अमूल में तेज हुई राजनीति का असर अमूल के उत्पादों पर कीमतों और इस कॉपरेटिव की बाकी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है। दरअसल, डॉ. कुरियन के वक्त अमूल और केंद्र सरकार के बीच सौहार्दपूर्ण स्थिति थी और दुग्ध उत्पादों के आयात और पशु चारे की कीमतों को प्रभावित करने वाली नीतियों में अमूल के हितों का ख्याल रखा जाता था। इसका सबसे बड़ा फायदा अमूल को अपने उत्पादों की कीमतें कम रखने में मिलता था और कम कीमतों के चलते निजी कंपनियां इसे टक्कर नहीं दे पाती थीं। लेकिन अमूल पर भाजपा के बढ़े वर्चस्व से अब यह स्थिति नहीं रही। अमूल के उत्पादों के दाम गत फरवरी से अब तक दो बार बढ़ चुके हैं और दिल्ली जैसे महानगरों में यह वृद्घि करीब 15 फीसदी की है। डॉ. कुरियन के बाद अब जिस नाटकीय तरीके से अमूल से बी.एम. व्यास की विदाई हुई उसे अमूल की सहकारी संरचना को लेकर शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। कुरियन के बाद व्यास ही अमूल का चेहरा थे और अमूल को करीब 1,100 करोड़ रुपये से 8,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंचाने और दूध बेचने वाली डेयरी से इसका दायरा बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका थी। अमूल से डा. कुरियरन ओर व्यास जैसे डेयरी दिग्गजों की विदाई के बाद कई देसी-विदेशी कंपनियां, जो पहले क्षेत्र में आने से कतराती थी, अमूल में मौजूदा रस्साकशी का फायदा उठा सकती है।

1 टिप्पणी:

  1. It is good to see ur work here, but I wish u could have written some light issues apart from news. B'coz news don't show ur creative part or ur thoughts. Yours Rahul

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