2.8.10

तरानों की नगरी बसाने वालों के घर सूने

- देश के सबसे लोकप्रिय एफएम रेडियो स्टेशनों में शामिल ऑल इंडिया रेडियो का एफएम गोल्ड पूरी तरह अस्थायी प्रस्तोताओं के हवाले है जिन्हें साल भर से भुगतान नहीं हुआ है और काम की शर्तें जिल्लत से भरी हैं। - वर्ष 2010 के पहले दिन, दुनिया भर में 4.5 लाख श्रोताओं वाला वल्र्ड स्पेस रेडियो अचानक पूरी तरह खामोश हो गया। साल भर पहले दिवालिया हुए इस सैटलाइट रेडियो की यह स्थायी खामोशी थी। - पिछले पांच सालों में देश के कई छोटे शहरों में प्राइवेट एफएम चैनलों के आगाज के साथ वर्ष 2010 नया मोड़ लेकर आया। रिलायंस के एडलैब्स और सन ग्रुप ने 40 एफएम चैनलों के लाइसेंस सरकार को वापस कर दिए। - वर्ष 2009 में देश के 268 प्राइवेट रेडियो एफएम चैनलों ने 800 करोड़ रुपये के मुनाफे के मुकाबले 2400 करोड़ रुपये का घाटा झेला। झीनी बारिश के माहौल की मस्ती हो या दफ्तर में बॉस से नोकझोंक के बाद दिमाग की नसों को फाड़ता तनाव, सर्पीली सड़कों पर कार ड्राइव करते वक्त म्युजिक सिस्टम में बजते गोल्ड एफएम में गुजरे जमाने के गीत, आप एकाएक सुर और संगीत के रस में बह जाते हैं। पर कभी स्पीड ब्रेकर या रेड लाइट पर ठहर कर सोचा है कि जो लोग चुन-चुन कर आपके दिलों को छूते गाने पहुंचाते हैं, आपको हर मुश्किल में तसल्ली और हौसला देने वाली बातें करते हैं, खुद किन मुश्किलों से जूझ रहे हैं। प्राइवेट एफएम चैनलों की चुनौतियों से पहले बात सरकारी एफएम की, जो कई मायनो में अनूठा है और इसके भीतर के हालत उतने ही अजीब। वर्ष 2010 में पुराने नग्मों और दिलचस्प जानकारियों के मेल वाला एफएम गोल्ड पूरी तरह से अस्थायी प्रेजेंटरों के कंधों पर टिका है। सात-आठ साल तक एफएम गोल्ड को लोगों के दिलों में बैठाने की जी तोड़ कोशिशों के बाद आज हालात यह है कि एक-दो नहीं बल्कि 72 लोगों को चुन-चुनकर आजमाया जाता है और जिन को मौका मिलता है, उन्हें बरसों तक भुगतान नहीं होता। जिन्हें भुगतान किया जाता है उन्हें अप्रैल का भुगतान नवंबर की तारीख पर होता है। हालात यहां तक बिगड़े कि ऑल इंडिया रेडियो में पहली बार अस्थायी प्रस्तोता लामबंद होकर विरोध पर उतारू हुए और अपना रेडियो बचाओ अभियान शुरू कर डाला। एफएम गोल्ड के शुरुआती प्रेजेंटर और जाने-माने रेडियो कलाकार इरफान बताते हैं कि भुगतान में देरी उतनी बड़ी वजह नहीं है, जितनी कई बाकी मुश्किलें। ऑल इंडिया रेडियो के ऐतिहासिक आर्काइव का कोई इस्तेमाल एफएम गोल्ड के प्रसारण में नहीं होता। प्रसारण में जिस तरह की अनुपयोगी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है उससे हालत यह है कि प्रेजेंटर को अपने पास से गाने लाकर बजाने पड़ते हैं। यानी ऑल इंडिया रेडियो की विरासत बेकार पड़ी है। इतना ही नहीं, गजल के प्रोग्राम में कुश्ती की कमेंटरी और जवाब दे चुकी मशीनों की तकनीकी खामियां, बचा-खुचा हौसला छिनने में कसर नहीं छोड़तीं। एफएम चैनल पर लंबे समय गजल का लोकप्रिय कार्यक्रम देने वाले और पिछले छह महीने से तौबा कर चुके एक रेडियो कलाकार कहते हैं कि चैनल के आला अधिकारियों के रवैये के चलते गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और रचनात्मक माहौल खत्म हो रहा है। ऑल इंडिया रेडियो में बेपरवाही का आलम यह है कि पूरा आकाशवाणी महानिदेशालय कूड़े के ढेर में तब्दील कर दिया गया है। पुराने रिकॉड्र्स और पुरानी स्क्रिप्ट सब कुछ बर्बाद हो रही है। चैनल की ऊर्जा चूक सी गई है, वह बस घिसट रहा है। लगातार घाटे में चलते निजी एफएम चैनल्स के प्रेजेंटर जहां लाखों में कमा रहे हैं वहीं सरकारी गोल्ड एफएम के प्रेजेंटरों को चार-पांच हजार रुपये के लिए आकाशवाणी के अफसरों के रहमो-करम में खासी घंटों की मशक्कत करनी पड़ती है। उस पर तुर्रा यह कि महीने में छह से ज्यादा प्रोग्राम नहीं कर सकते और भुगतान के लिए साल भर इंतजार करना पड़ता है। प्रेजेंटरों पर दबाव बनाकर एक ड्राफ्ट पर दस्ताखत करवाना शुरू कर दिया है, जिसमें शर्त रखी गई है कि प्रेजेंटर महीने में छह से ज्यादा प्रोग्राम आकाशवाणी के किसी भी विभाग, या चैनल में नहीं करेंगे। इस पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि प्रस्तोता अपनी मर्जी से छह से ज्यादा कार्यक्रम नहीं करना चाहते हैं जबकि इन छह कार्यक्रमों की मजूरी से दिल्ली महानगरी में सामान्य जिंदगी भी नहीं घिसट सकती। प्रेजेंटर को एक कार्यक्रम के लिए 1600 रुपये मिलते हैं, और महीने के छह के हिसाब से यह राशि बैठती है 9,600 रुपये। वह भी तब जबकि सभी छह कार्यक्रम झोली में गिरें। राजधानी या इंद्रप्रस्थ चैनल में यह राशि मात्र 400 रुपये है। एफएम गोल्ड के प्रेजेंटरों की दिक्कतों के बारे में प्रसार भारती के सीईओ बी.एस. लाली का कहना है कि अपना रेडियो बचाओ अभियान के लोगों की परेशानियों से वह वाकिफ हैं और इस बारे में आकाशवाणी की महानिदेशक नौरीन नकवी से आख्या मांगी गई है। पूरे मामले को संवेदनशीलता से निबटाने का वादा करते हुए लाली कहते हैं कि कलाकारों को पूरा सम्मान और माहौल देने की कोशिश की जाएगी। तकनीकी रूप से बात करें तो देशभर में चलनेवाले प्राइवेट एफएम चैनलों को प्रसारण सुविधा देने का काम स्वयं आकाशवाणी के ट्रांसमिटर से होता है। लेकिन बिडंबना देखिए कि निजी चैनलों के लिए जहां 20 किलोवाट का ट्रांसमिटर है वहां एफएम गोल्ड मात्र ढाई किलोवाट के ट्रांसमिटर पर चल रहा है। आधिकारिक रूप से इसे 5 किलोवाट पर चलाने का प्रावधान है। एफएम गोल्ड डिजिटल रूप में है फिर भी रेडियो सिटी या मिर्ची की तुलना में उसकी आवाज में स्पष्टता कम है। दिक्कतें अन्य प्राइवेट चैनलों की भी कम नहीं हैं। साल भर में करीब 2400 करोड़ रुपये खर्च कर सिर्फ 800 करोड़ रुपये कमाई करने वाले प्राइवेट एफएम चैनल अब मदद के लिए सरकार का मुंह ताक रहे हैं। एक ओर जहां दूसरे चरण के 248 प्राइवेट एफएम चैनलों की यह हालत है, वहीं सरकार तीसरे चरण में 800 नए चैनलों को लाइसेंस जारी करने की तैयारी में है। रेडियो इन्वेस्टर फोरम से जुड़े तारीक अंसारी कहते हैं कि प्राइवेट चैनलों में एक स्टेशन, जो मार्केट लीडर है, को छोड़कर कोई भी अपना खर्चा निकालने की स्थिति में नहीं है। प्राइवेट एफएम ने हालांकि बड़ा श्रोता वर्ग बनाया है लेकिन उसकी वित्तीय स्थिति चिंता का विषय है। दरअसल, प्राइवेट और सरकारी दोनों ही तरह के एफएम चैनल की रीढ़ लोकप्रिय संगीत ही इसकी सबसे बड़ी कमजोर नस है। सरकारी चैनलों में जहां लालफीताशाही के चलते संगीत की विरासत धूल फांस रही है, वहीं प्राइवेट चैनलों की कमाई का 10 से 50 फीसदी हिस्सा संगीत खरीदने यानी गानों की रॉयल्टी पर खर्च हो रहा है। इस मोर्चे पर प्राइवेट चैनल लामबंद होकर सरकार से राहत पाने की आस लगा रहे हैं। भाषाई भेदभाव भी कम नहीं ये लोग भाषाई भेदभाव से भी नाराज हैं। ऑडिशन की लंबी प्रकिया के बाद पास हुए लोगों को वाणी सर्टिफिकेट कोर्स के नाम पर पांच दिन की जरूरी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए पांच हजार रुपये लिए जाते हैं। लेकिन दिलचस्प यह कि ट्रेनिंग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों के लिए है, नेपाली, फ्रेंच, अरबी और विदेशी भाषाओं के लिए नहीं है। आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा में भी भाषाई भेदभाव की गंभीर स्थिति है। भारतीय भाषाओं में काम करने वालों के लिए जरूरी योग्यता और मानदेय विदेशी भाषाओं के मुकाबले बहुत कम है। हैरानी की बात यह है कि नेपाली भाषा के कर्मचारियों को अब भी विदेशी भाषा के कर्मचारियों की तरह ही माना जा रहा है जबकि नेपाली सिक्किम की आधिकारिक भाषा है और 1992 से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में से एक है।

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