2.8.10
अमर प्रेम या छोटी सी लव स्टोरी
- विश्व कप हॉकी के पहले ही मुकाबले में भारत की पाकिस्तान पर 4-1 से शानदार जीत के बाद अमिताभ बच्चन की प्रतिक्रिया देखिए- काफी समय बाद क्रिकेट को छोड़ हॉकी मैच देखने की इच्छा हुई है।
- स्पेन के हाथों 5-2 की करारी शिकस्त देखकर नेशनल स्टेडियम के करीब 15 हजार भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया देखिए- शानदार हॉकी दिखाने के लिए जोरदार तालियों से स्पेन की टीम का शुक्रिया।
- अब देखिए सातवें और आठवें स्थान के मुकाबले में हॉकी को दिल देने पहुंची प्रियंका चोपड़ा का तर्जुबा- भारतीय टीम के तीन गोल खाने के बाद वह मैच अधूरा छोड़कर चल देती हैं।
ठेट हॉकी प्रेमी इस के आधी हो चुके हैं लेकिन हफ्तों तक हॉकी को दिल देने की मुहिम चलाने वाली इस अदाकारा के लिए यह नए-नए इश्क में चोट खाने जैसा था। यह सब उस भारतीय हॉकी के साथ हो रहा है जिसे गुमनामी और नाकामी गहरे गर्त में धकेल रही है। यह टीम विश्व कप की तैयारी के बजाए भुगतान के लिए हड़ताल पर थी और हॉकी की तकदीर लिखने वाले काफी पहले ही घूस लेते दिख चुके हैं। दो साल से भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को संभालने वाली फेडरेशन ही वजूद में नहीं है। इन दो सालो में हॉकी टीम के कोच लगातार बदलते रहे। इन सब के बावजूद दिल्ली में हुआ विश्व कप हॉकी प्रेमियों के नए वर्ग को खींचने में कामयाब रहा। पैसा, प्रशंसक और पहचान हॉकी इंडिया की पुरानी प्यास थी जिसे बुझाने कॉरपोरेट जगत, बॉलीवुड और अचानक हॉकी प्रेमी बनी संभ्रात युवाओं की भीड़ नेशनल स्टेडियम पर जुटी। हैरत तो यह देखकर होती है कि भले ही सबसे सस्ते स्टैंड पर कुछ जगह खाली पड़ी हो समाज का दीन-हीन सा दिखने वाले वर्ग हॉकी प्रेमियों की इस भीड़ से तकरीबन नदारद है। देश की सबसे बड़ी दुपहिया कंपनी आयोजन पर करीब 10-12 करोड़ रुपये खर्चती है और पहला मैच जीतने के बाद ही प्रायजकों की तादाद बढऩे लगती है।
वास्तव में हॉकी के साथ हो क्या रहा है? खुद कभी जिंदगी में हॉकी न खेलने वाले कुलीन वर्ग का रूझान बिना ग्लैमर वाली, नाकामी से दबी हॉकी की ओर अचानक कैसे बढ़ा। वह भी इस खेल में भारत का दबदबा खत्म होने के करीब चार दशक बाद। शायद हॉकी की कुडंली अब मार्केटिंग और विज्ञापन पंडितों के हत्थे चढ़ गई है, जो तगड़े उपाय लेकर आए हैं। खासकर मध्य वर्ग के युवाओं में इस खेल को मंनोरंजन के तौर पर बेचने में कामयाब रहे। संदेश साफ है-भले ही आप इस खेल का न खेलें, न समझे और न पढ़े, बस दोस्तों के साथ अच्छा टाइम बीताने स्टेडियम पहुंच जाईये, अपनी टीम के लिए चीखिये-चिल्लाइए, ब्रेक में स्टेडियम के अहाते में सजे खान-पान बाजार के हवाले हो जाएं और चाहे तो मैच के खत्म होने से पहले दिल की र बढ़ी धड़कनें भी नाप लें। इस बीच राष्ट्रीय गीत गाने, राष्ट्रीय खेल के प्रति वफादारी दिखाने और हॉकी बचाओ के नेक खयाल से खुद को जोड़े रखने के भी पर्याप्त मौके हैं। खासकर उस वक्त जब ऐसी हवा बन चुकी हो कि बेचारे हॉकी वाले तो एक-एक पैसे से मोहताज हैं।
पूर्व भारतीय कप्तान जफर इकबाल स्वीकार करते हैं कि जब अस्सी के दशक में वह खेला करते थे, तब से दर्शक वर्ग के चरित्र में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। वह मानते हैं कि कुलीन वर्ग इस खेल को सहारा उस भावना के चलते दे रहा है जो उसे देशभक्त होने, रक्षक की भूमिका निभाने और किसी मकसद में जुटने को प्रेरित करती है। हॉकी के हालात चाहे जो भी हो लेकिन हॉकी की ओर वापस मुड़ते इतने सारे लोगों को देखकर इकबाल गदगद हैं।
हॉकी विश्वकप में बढ़ी उच्च और मध्य वर्ग के लोगों की तादाद में अहम भूमिका आयोजन की मार्केटिंग ने भी निभाई। इस बार टिकट इंटरनेट, यूनियन बैंक की शाखाओं और कैफे कॉफी डे के आउटलेट्स के जरिए बेचे गए। किस तरह की भीड़ को इस बार हॉकी तक लाया जाए इस मामले में रणनीति काफी स्पष्ट थी। भारत टीम के डॉक्टर पी.एस.एम. चंद्रन कहते हैं, 'उच्च मध्यम वर्ग सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि यह विश्व कप था। यह मैच हॉकी के बजाए रग्बी का होता तब भी इनमें से कई लोग आते। भारतीय हॉकी को प्रशंसकों की बढ़ी तादाद कायम रखने के लिए सफलता और सितारों की दरकार है।Ó
इन नए दर्शकों और खेल की बढ़ी पहचान को कायम रखना भारतीय हॉकी के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। कई मायनों में यह साल भारतीय हॉकी के लिए अहम है। पिछले महीने हुए विश्व कप के अलावा इस साल राष्टï्रमंडल खेल और चीन में एशियाई खेल होने हैं। राष्टï्रमंडल खेलों में भारत ने कभी भी पुरुष हॉकी में पदक नहीं जीता है और अगर नाकामयाबी का सिलसिला इस साल भी नहीं टूटता तो हॉकी के प्रति जगे नए जोश और प्रायोजकों के उत्साह को थामना मुश्किल हो जाएगा।
पिछली बार भारत ओलंपिक में क्वालिफाई तक नहीं कर पाया था
पिछले दो साल से बर्खास्त हॉकी फेडरेशन की जगह बनी हॉकी इंडिया के चुनाव होने बाकी हैं। इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन-एफआईएच ने चुनाव कराने के लिए हॉकी इंडिया को 31 मई तक का समय दिया है। गौरतलब है कि राज्य हॉकी संघों के साथ मुकदमेबाजी के चलते यह चुनाव 3 बार स्थगित किया जा चुका है।
अब सवाल है कि हॉकी में कभी नंबर -एक की टीम की रैकिग जब 12 है तो इस स्थिति के बावजूद भारत में विश्वकप का आयोजन क्यों हो रहा है। तो, इसका फैसला फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल हॉकी करता है। ऐसे में एफआईएच ने यह भी माना लिया है कि क्रिकेट के जरिये बेशुमार कमाई का ठिकाना बना बाजार बना भारत विश्व हॉकी के लिए भी अलादीन का चिराग के खिलाडिय़ों का भी जीर्णोद्धार हो सकता है। दरअसल, भारत में हॉकी को फिर से जिंदा करने की जितनी ललक भारत में हॉकी के कर्ताधर्ताओं में है उससे कहीं ज्यादा उत्साह इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन-एफआईएच दिखा रहा है। इसकी वजह भी साफ है। इस विश्व कप में फेडरेशन ने करीब 25 करोड़ रुपये की कमाई की। फेडरेशन इतनी कमाई आमौतर पर तीन विश्व कप के आयोजन से भी नहीं कर पाता है। वर्ष 2016 तक अपनी आमदनी को तीन गुना बढ़ाने के लक्ष्य को देखते हुए एफआईएच ने हर साल एक टूर्नामेंट भारत में कराने का फैसला किया है।
लेकिन इस विश्वकप से यह अहसास हो रहा है कि हॉकी ने एक बार फिर वापसी कर ली है। भारत का पहला ही मैच चिर प्रतिद्वंद्वीं पाकिस्तान से था, जिसे देखने स्वाभाविक तौर पर भीड़ उमड़ी। इस मैच में पाकिस्तान को हराकर भारतीयों की होली की खुशियां खिलाडिय़ों ने दोगुनी कर दीं। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और इंग्लैंड से भारत हारता गया, बावजूद इसके दर्शकों की संख्या और उत्साह में कमी नहीं आयी। लोग भारत के बाहर होने के बावजूद अच्छी हॉकी देखने के लिए स्टेडियम में जुटे।
वर्ष 1975 विश्व कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक खोल दागने वाले मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार कहते हैं कि इस विश्व कप में जो माहौल बना वह शुभ संकेत है लेकिन हॉकी इंडिया अभी भी कामचलाऊ व्यवस्थाओं के हवाले है। प्रदर्शन न सुधरा तो माहौल ठंडा होने में समय नहीं लगेगा। देखना है कि कब टीम इंडिया हॉकी के प्रति नई दिवानगी को अमर प्रेम में बदल पाती है या फिर यह 'छोटी सी लव स्टोरीÓ यहीं खत्म हो जाएगी।
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