2.8.10
सदन में आनन फानन
महंगाई को लेकर संसद में चर्चा किस नियम के तहत की जाए इस मुद्दे पर भले ही संसद में घंटों काम-काम ठप्प रहे लेकिन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करना यहां सेकंडो का खेल है। अंदाजा लगाईए, 60 सेकंड में क्या-क्या हो सकता है? संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में लोकसभा ने 60 सेकंड में 3 विधेयको को पारित करने का कारनामा कर दिखाया। इनमें से एक कानून तो मंत्रियों की तनख्वाह और भत्तों में संशोधन के बारे में था तो जाहिर है वक्त कहां लगना था। इस फुर्ती को देखकर तो शायद 2 मिनट में तुरंत नूडल्स बनाने का दावा भी हल्का पड़ जाए। अहम कानूनों पर सार्थक बहस के घटते वक्त और हावी होते शोरगुल, विरोध की भेंट चढ़ती संसद की कार्रवाई के चलते लोकतंत्र की अहम रवायत औपचारिता बनती जा रही है।
पिछले शीतकालीन सत्र में 8 विधेयक ऐसे थे जो 3 मिनट से भी कम समय में पारित हो गए। इनमें उच्च न्यायालयों के व्यवसायिक प्रभागों की स्थापना, राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कानून में विशेष प्रावधान शामिल करने और ट्रेड मार्क संंबंधी कानून में संशोधन से जुड़े विधेयक शामिल थे। संसद की कार्यवाही पर शोध करने वाले नीति शोध संस्थान पीआरएस के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1956 के बाद से संसद सत्र के दिनों की संख्या लगातार घटती जा रही है। वर्ष 1956 में जहां रिकॉर्ड 151 दिन लोकसभा चली वहीं पिछले दो दशक में यह आंकड़ा 100 दिन भी नहीं छू पा रहा है। तारांकित सवालों के जवाब देने के मामले में तो लोकसभा का प्रदर्शन बेहद बुरा रहा है। वर्ष 2009 के दौरान लोकसभा में करीब 1100 सवाल पूछे गए जिनमें से सदन में सिर्फ 266 यानी 24 फीसदी ही समय पा सके। इन 266 सवालों का जब सदन में नंबर आया तो इनमें से 57 सवालों को पूछने वाले सांसद ही नदारद थे। इस तरह सिर्फ 209 यानी करीब 19 फीसदी सवालों का जवाब ही दिया जा सका। पिछले पांच साल से लोकसभा में पूछ जाने वाले सवालों की संख्या भी तेजी से गिरी है। वर्ष 2005 में जहां लोकसभा में करीब 1600 सवाल पूछे गए थे जबकि वर्ष 2008 में करीब 900 सवाल ही दाखिल किए गए। हाल ही में राज्यसभा ने ऐसा नियम बनाया है कि सांसद की गैरमौजूदगी के बावजूद कोई भी तारांकित सवाल बगैर जवाब के न रह जाए।
हालांकि आनन-फानन में महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने का सिलसिला नया नहीं है लेकिन सरकार और प्रशासन के कामकाज में सुधार की कवायतो के दौर में इस मोर्चे पर बद से बदतर होती स्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्यसभा सदस्य और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी कहते हैं कि यह बहुत अलोकतांत्रिक और पिछड़ेपन को दर्शाने वाला रूझान है। संसद में सार्थक बहस के गैर मौजूदगी पर येचुरी का मानना है कि इससे सांसदों के प्रभुत्व को नुकसान पहुंच रहा है।
लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का मानना है कि तकनीकी तौर पर किसी विधेयक के बगैर चर्चा पारित होने में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है। लेकिन यह स्वस्थ परंपरा नहीं है। लोकसभा के एक अन्य पूर्व महासचिव योगेंद्र नारायण सिंह कहते हैं कि अगर किसी विधेयक पर चर्चा नहीं होती तो इससे बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह यह है कि संसद की स्थायी समिति हर विधेयक का बारीकी से अध्ययन करती है। विभिन्न पार्टियों के सांसदों वाला यह दल विधेयक का गहन विश्लेषण कर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपता है।
हालांकि संसद में पेश होने वाले सभी विधेयकों पर हमेशा बहुत ज्यादा बहस की गुजाइंश नहीं होती। जैसे की राष्टï्रीय रोजगार गांरटी योजना के नाम में पहले महात्मा गांधी शब्द जोडऩे संबंधी विधेयक। लेकिन कई भी ऐसे जरूरी विधेयक हैं जो संसदीय पैनल के पास विचार के लिए नहीं जाते। उदाहरण के तौर पर नागरिक सुरक्षा संशोधन विधेयक 2009 संसदीय पैनल के पास नहीं गया था। इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है जो सांसद किसी खास विधेयक पर विचार करने वाली स्थायी समिति के सदस्य नहीं हैं, उनकी विधेयक पर अलग राय रखना चाहते हों। इसके अलावा सरकार विधेयक पर संसद की स्थायी समिति की सभी सिफारिशों को मानने के लिए भी बाध्य नहीं होती। येचुका का कहना है कि विधेयक पर अगर स्थायी समिति के सुझाव का स्वीकार नहीं किया जाता तब भी इसकी वजह पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।
विधेयकों के लंबे-चौड़े ड्राफ्ट और पेंचीदा नीतिगत मामलों की गहराई में जाना सभी संसद सदस्यों के लिए भी आसान नहीं होता। नीतिगत शोध के लिए सांसदों को मदद करने के अभियान डेमोक्रेसी कनेक्ट की निधि प्रभा तिवारी कहती हैं कि जन नेता सामाजिक बदलाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं लेकिन अक्सर विकास के मुद्दों में उनकी रूचि के बावजूद जरूरी जानकारियां और तथ्य जुटाकर संसद के अंदर और बाहर तार्किक बहस को आगे बढ़ा पाने में नाकाम रहते हैं। लोकसभा का एक सांसद 10-20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, विकास के मुख्य मुद्दों पर उसकी जानकारी का स्तर बढ़ाए बिना हमें संसद में रचनात्मक माहौल नहीं दिखेगा।
राष्टï्रीय लोकदल के युवा सांसद और लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ग्रेजुएट जयंत चौधरी कहते हैं कि विधेयकों और नीतिगत मामलों को गहराई से समझने के लिए समर्थक व्यवस्था जैसे रिसर्च टीम का होना एक बड़ी जरूरत है। इसके अभाव में कई ऐसे सांसद जो स्थानीय लोगों और मुद्दों से बखूबी जुड़े हैं संसद के अंदर वैसा योगदान नहीं कर पाते। जयंत कहते हैं कि अपनी पार्टी में ऐसी व्यवस्था स्थापित करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल इस बात से सहमति जताते हैं कि जल्दबाजी में विधेयकों का पारित होना कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन साथ ही तर्क देते हैं कि वैधानिक कामकाज के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या विधेयकों को पारित करने में जल्दबाजी शोर शराबे और हल्ले-गुल्ले में व्यर्थ गए समय का उचित जवाब है? जाहिर है कि संसद में कामकाज के दिनों की संख्या बढ़ाना पहली जरूरत है। इसके अलावा सत्ता और विपक्षी दलों को भी यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि उनके ज्यादा से ज्यादा सांसद संसद की कार्यवाही को गंभीरता से ले और सक्रिय भूमिका निभाए।
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