2.8.10

पानी पर तैरता रेतीला शहर

रेगीस्तान, सूखे और पानी की किल्लत वाले राजस्थान में भूजल को लेकर उलटबांसी सरकार के लिए सिरदर्द बन चुकी है। जहां एक ओर पूरे प्रदेश में भूजल का गिरता स्तर समस्या है वहीं पानी में डूबी जोधपुर के पुराने शहर की इमारतों की नींव नई नई मुसीबत बनकर खड़ी हैं। हैरानी की बात यह है कि यह स्थिति किसी बारिश या बाढ़ की वजह से नहीं बल्कि जमीन से अचानक निकलते पानी की वजह से हुई है। जोधपुर में भूगर्म की यह गुत्थी हॉलीवुड फिल्म 2012 की याद दिलाती है जिसमें भूगर्भ की परतों के गर्म होकर पिघलने दुनिया का हुलिया ही बदलने लगात है, लेकिन इस फिल्म के मुकाबले काफी छोटे पैमाने पर भूजल स्तर में हुए इस बड़े बदलाव को काबू करने के सरकारी प्रयास भी कम दिलचस्प नहीं हैं। जलस्तर बढ़ता दिखा तो सरकार ने ट्यूबवैल लगाकर दिन-रात पानी जमीन से बाहर निकाल फेंकने का काम छेड़ दिया। और नतीजा, पानी से लबालब रेतीला शहर। जोधपुर में जलस्तर के बढऩे का यह सिलसिला करीब एक दशक से चल रहा है। शहर के करीब आधे इलाके में पानी भूमि से महज कुछ ही सेंटीमीटर नीचे है। हालात यह है कि शहर में कई इलाके तो ऐसे हैं जहां हल्की सी खुदाई पर पानी निकल आता है। राजस्थान के बाकी इलाकों में जहंा जलस्तर 2-3 मीटर सालाना की दर से नीचे जा रहा है वहीं जोधपुर में सालाना 1 से 1.5 मीटर जलस्तर बढ़ रहा है। इस अजीब घटना की वजह की पड़ताल में जुटे राष्टï्रीय जलविज्ञान संस्थान एनईएच रूड़की के डॉ. एन.सी. घोष ने आउटलुक को बताया कि अभी इस पूरे मामले पर शोध चल रहा है और फिलहाल किसी नतीजे तक नहीं पहुंचे हैं। जोधपुर के विभिन्न इलाकों से भूजल संबंधी आंकड़े लिए जा रहे हैं जिनके गहन विश्लेषण के बाद ही पता चलेगा कि आखिर वजह क्या है। जोधपुर में एक भूजल स्तर में बढ़ोतरी की बात को स्वीकार करते हुए डॉ. घोष बताते हैं कि जिस जोधपुर में पहले भूजल का स्तर 20 से 30 फीट था वहां अब 2 फीट पर भी पानी निकल रहा है। इसकी वजह से लोगों को बेसमेंट में पानी आने जैसे दिक्कतें आ रही हैं। भूजल स्तर बढऩे की संभावित वजह के बारे में डॉ. घोष कहते हैं कि पहले जोधपुर की जनता पेयजल के लिए भूजल पर निर्भर थी लेकिन सन 1997 के बाद जब से दांयी राजीव गांधी नहर का पानी जोधपुर पहुंचा है भूजल का इस्तेमाल बंद हो गया है और पेयजल के लिए बाहरी स्रोतों से आने वाला पानी इस्तेमाल हो रहा है। हो सकता है कि इससे भूगर्म में पानी का संतुलन बिगड़ा और पानी पहले की तरह बाहर न निकलने की वजह से बढ़ता गया। मौजूदा समय में शहर को पेयजल आपूर्ति करने वाली कायझाना और ताख्तसागर झील में बाहर से पानी की आपूर्ति कई गुना बढऩा भूजल स्तर बढऩे की मुख्य वजह माना जा रहा है। दरअसल जमीन के भीतर पानी विभिन्न भू-परतों के बीच तालाब की तरह इक_ïा रहता है और इसकी आपूर्ति व निकासी के बीच संतुलन बिगडऩे से इस प्रकार जलस्तर बढऩा संभव है। नहर के आसपास के क्षेत्रों में भी इसी तरह से जल स्तर बढ़ता है। लेकिन फिर भी जोधपुर जैसा मामला आम बात नहीं है। कई विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए सूखे इलाके के इस शहर में अचानक बढ़ी जल आपूर्ति, पानी की लाइनों में लीकेज और पर्याप्त जलनिकासी के इंतजाम न होने को भी जिम्मेदार मानते हैं। इसे देखते हुए जोधपुर विकास प्राधिकरण ने शहर में जमीन के भीतर निर्माण यानी बेसमेंट आदि पर पहले ही रोक लगा दी है। जोधपुर के भूर्गशास्त्री बी.एस. पालीवाल का कहना है कि इमारतों के बेसमेट में दिख रहा यह पानी भूगर्भ की परतों से ऊपर आया पानी नहीं बल्कि पुरानी पड़ चुकी पानी की लाइनों के रिसाव का नतीजा है। दरअसल जोधपुर में सन 1936 से घरों तक पानी पहुंचाने के लिए लाइनें बिछाने का काम शुरू हुआ था और पूरे शहर में करीब 1600 किलोमीटर लंबाई की पानी ले जाने वाले पाईपों का जाल बिछा है। कई लोगों का मानना है कि पुरानी पड़ चुकी इस लाइन में रिसाव के चलते ही पानी जमीन की ऊपरी परत में इक_ïा हो रहा है। मकानों की बुनियाद तक आ पहुंचे पानी से निबटने के लिए तमाम तरह की मशक्कतें की जा रही है। जोधपुर की प्रमुख झील कायझाना झील और प्रमुख तालाबों तख्त सागार, गुलाव सागार, फतेह सागार और लाल सागर के अलावा समेत करीब 60 कुएं-बावडिय़ों से ट्यूबवैल के जरिए पानी बाहर निकाला जा रहा है। इस तरह रोजाना निकलने वाले करीब 20 एमएलडी यानी करीब 2 करोड़ लीटर पानी को संभालना भी चुनौती साबित हो रहा है। इस 20 एमएलडी पानी को शुरू में किसी तरह सीवर लाइन के जरिए शहर से बाहर निकाला गया। लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल खेती और शहर के बागीचों को हरा-भरा करने की कवायदे शुरू हुई। इस बीच सीमा सुरक्षा बल और रेलवे ने इसमें से कुछ पानी लेने लगे हैं। इस स्थिति से हैरान स्थानीय व्यपारी हरीश कुमार बताते हैं कि ऐसा लगता है जैसे शहर पानी के ऊपर तैर रहा हो। इमारतों की नींव पानी की वजह से कमजोर पड़ रही हैं और हादसे का खतरा खड़ा है। हरीश के मुताबिक, मैंने अपनी दुकान के बेसमेंट से पानी निकालने के लिए 4-5 पंप लगाए वरना वहां 5 फीट पानी जमा हो गया था। मुझे लाखों का नुकसान हो गया। हालांकि नींव में पानी कई साल से रिस रहा है लेकिन पिछले साल अचानक पानी की मात्रा बढ़ गई। जमीन से निकल आए पानी के चलते अदालत परिसर में वकीलों के 40 चेंबरों को छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। पुराने शहर के इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। मेहरानगढ़ किले के पास पुजारी को पानी में खड़े होकर पूजा करने की नौबत आ गई। भूजल विभाग के मुख्य अभियंता उपदेश करन माथुर कहते हैं कि जहां भूजल का स्तर बहुत ज्यादा है वहां ट्यब वैल लगाकर पानी निकालने के अलावा यूकेलिप्टस जैसे पेड़ भी लगाए जा रहे हैं जो पानी को ज्यादा सोखते हैं। हालांकि इस बढ़े जलस्तर ने जल्द ही हरित राजस्थान की उम्मीदें भी जगा दी हैं्र। लगातार पंपिंग के जरिए पानी बाहर निकालने की कोशिशों का थोड़ा बहुत असर भी देखने को मिला है। स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि खरबूजा बाव$ड़ी क्षेत्र में 90 सेंटीमीटर, बाईजी का तालाब क्षेत्र में 55 सेंटीमीटर, फतेहसागर क्षेत्र में 13 सेंटीमीटर तथा लक्ष्मीनगर क्षेत्र में 7 सेंटीमीटर तक पानी नीचे उतरा है। जैसा कि पी. साईनाथ अपनी किताब का शीर्षक दे चुके है-अच्छा सुखाड़ सबको पसंद है। जोधपुर के इस संकट में भी सरकारी अधिकारियों ने करोड़ों की लागत वाली लंबी-चौड़ी योजनाएं बना ली हैं। मामले की वैज्ञानिक पड़ताल के लिए करीब 88 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। जमीन से पानी बाहर निकलाने के लिए 12.27 करोड़ रुपये की योजना बनी थी जिसमें से करीब 4 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। राष्टï्रीय जलविज्ञान संस्थान को इस मामले पर अपनी रिपोर्ट राजस्थन सरकार को मार्च में सौंपनी है। बाड़मेर की बाढ़ के बाद अब जोधपुर की जड़ों का पानी राजस्थान में बरसों की प्यास को किसी अजूबे की तरह बुझाता रहेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें