2.8.10
ग्लोबल कबाड़ से हादसों का सौदा
चमकीली सी दिखने वाली चीज ने जब कहर ढाया तो जान आन पड़ी। ना धमका ना नश्तर सी चुभन पर जो हुआ वो किसी भयावह फिल्म के दृश्य से कमतर ना था। पहले चमड़ी काली पड़ी फिर सिर के बाल उतरने लगे और थोड़ी देर में होश पस्त। यह था आठ अप्रैल को दिल्ली के मायापुरी इलाके में अजीबो-गरीबो किस्म कबाड़ की दुकान का मंजर। मौत का यह सामान उस कबाड़ से निकला, जिसे गलाना-काटना उनका रोज का काम है। जब दुकान का मालिक इसकी चपेट में आया और उसकी तत्वा का रंग बदला, बाल उड़ गए तब मामला उजागर हुआ। यह रेडियोधर्मी कबाड़ का असर था, जिसका खौफ अगले कई सप्ताह तक मायापुरी में छाया रहा। यह वही रेडियोधर्मी खतरा है जिसका असर राजस्थान के रावतभाटा में परमाणु उर्जा केंद्र के आसपास के हजारों निवासी पिछले कई बरसों से अब तक झेल रहे हैं। राजधानी के भीतर रेडियोधर्मी कचरे की जो विकिरण यानी रेडिएशन हफ्ते भर तक सुर्खियां बनी, उससे कहीं ज्यादा जहर तो झारखंड के जादूगुडा इलाके की फिजा मे घुल चुका है, जो भारत का यूरेनियम खनन का प्रमुख स्रोत है। रावतभाटा के लोगों पर हुए रेडियोएक्टिव विकिरण के असर पर संघमित्रा और सुरेंद्र गाडेकर की शोध बताती है कि परमाणु संयंत्र के आसपास रहने वाले लोगों में त्वचा संबंधी रोग, ट्यूमर, अंधापन, जोड़ों का दर्द जैसी समस्याएं बाकी इलाकों से दो-तीन गुनी ज्यादा हैं। इसी तरह जादूगोड़ा में किए गए सर्वे बताते हैं कि करीब 30 फीसदी महिलाएं गर्भधारण करने से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्ति हैं। वहीं पर बड़ी तादाद में लोग टीबी, कैंसर, ब्रेन डेमेज, कीडनी डेमेज और स्नायु तंत्र में गड़बडिय़ों के शिकार हैं। लेकिन अब इस भयानक और लाइलाज खतरे ने महानगरों में दस्तक दे दी है और दिल्ली में हुई विकिरण की हालिया घटना इसका ताजा सबूत है।
हालंाकि दिल्ली की घटना की वैज्ञानिकों जांच अब भी जारी है इस घटना ने जहरीली कचरे के खतरे की वह तस्वीर पेश की है जिसे नजरअंदाज कर भारत को विदेशी कचरे का कूड़ेदान बनाया जा रहा है। खुद सरकार के आंकडे कहते हैं कि वर्ष 2003-04 में जहां भारत में करीब 11 करोड़ टन इस्पात कचरे के तौर पर लाया गया, वहीं 2007-08 में इसकी मात्रा बढ़कर करीब 34 करोड़ टन हो गई। पूंजी और संसाधनों के वैश्वीकरण के साथ-साथ कूड़े-कचरे के ग्लोबल होकर विकसित देशों से गरीब मुल्कों की ओर जाने के इस दौर ने भारत जैसे देश को मायापुरी जैसे हादसों के ढ़ेर पर खड़ा कर दिया है। इस प्रकार विदेश से बड़ी मात्रा में आने वाले कचरे में न सिर्फ जहरीले और विस्फोट पदार्थ होने की आशंका बनी हुई है बल्कि दिल्ली की तरह रेडियो सक्रिय पदार्थों से विकिरण यानी रेडिएशन का खतरा भी है। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इस कचरे से जुड़ा पूरा उद्योग पुख्ता सुरक्षा उपायों और इंतजामों की बदहाल स्थिति के बीच शहरों की गरीब बस्तियों में पनप रहा है। इन हालात को जानने के बावजूद जिस तेजी से सरकार खतरनाक कचरे का आयात दिनों-दिन बढ़ा रही है वह और भी चौंकाने वाला है। भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2004-05 में 10111 किलो मेडिकल कचरा, वर्ष 2007-08 में 500 किलोग्राम खतरनाक रेडियोधर्मी कोबाल्ट का कूड़ा और 27 लाख किलोग्राम बैटरी का कूड़ा आयात हो चुका है। यही हाल इलेक्ट्रिॉनिक कचरे में मामले में भी है। पिछले साल सितंबर में ही भारत ने उत्तरांचल स्थित एक रिसाइक्लिंग फर्म को 8000 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे के आयात की कानूनी मंजूरी दी। दुनिया भर के कूड़े-कबाड़े से भारत का यह मोह तब दिख रहा है जब खुद का घरेलू कचरा अपने आप में बड़ी चुनौती है। पर्यावरण से जुड़े कई अध्ययन बताते हैं कि भारत में सालाना निकलने वाले करीब 4 लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे में से करीब 60 फीसदी का कोई शोधन नहीं होता। पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर सक्रिय संस्था टॉक्सिक लिंक्स के सहायक निदेशक सतीश सिन्हा सवाल उठाते हैं कि भारत में इतनी बड़ी तादाद में विदेशों से कचरा मांगाने का क्या औचित्य है। सरकार पर्यावरण और लोगों की जान जोखिम में डालकर देश को कचरे के इस खतरनाक कारोबार को शह दे रही है। इस प्रकार आने वाले कचरे की पूरी जांच के लिए न तो बंदरगाहों पर पर्याप्त इंतजाम हैं और न ही रेडिएशन जैसे हादसे से मुकाबले की तैयारी। बाहर से आने वाले खतरनाक कचरे में से सिर्फ 10 फीसदी की ही औचक जांच हो पाती है और इस कचरे में किसी विस्फोट या अन्य जहरीले पदार्थ के आने की पूरी-पूरी आशंका रहती है।
सरकारी एजेंसियों,्र खासकर केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग ने जिस तरीके से मायापुरी के हादसे का मुकाबला किया, उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। हफ्ते भर से ज्यादा चली शुरुआती छानबीन के बावजूद सरकार यह बताने में नाकाम है कि जिस कूड़े से मायापुरी में रेडिएशन फैला वह घरेलू कूड़ा था अथवा विदेश से आयातित। जिस कोबाल्ट60 को इस रेडिएशन की वजह करार दिया गया उसका इस्तेमाल आमतौर पर मेडिकल उपकरणों में होता है। लेकिन हादसे की वजह बने पदार्थ के स्रोत का रहस्य खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा यह भी मालूम नहीं चल पाया कि इस रेडियोधर्मी स्क्रैप का इस्तेमाल कहीं इस्पात बनाने में तो नहीं किया गया।
परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड(एईआरबी) ने दिल्ली पुलिस को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें कहा गया है कि कोबॉल्ट -60 एक से ज्यादा स्रोत से आया हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि औद्योगिक या अस्पतालों के कचरे के रूप में इसकी देश के बाहर से भी आने की संभावना है। दो दुकानों को छोड़कर, जहां रेडियोधर्मी पदार्थ मिला था, पूरे बाजार को रेडिएशन मुक्त घोषित कर दिया गया है। लेकिन इस बीच, अजय नाम के एक व्यक्ति ने अनजाने में कोबाल्ट-60 की एक पिन अपने पर्स में पैंट के पीछे की जेब में रख ली थी। इसके घटना साथ विकिरण से प्रभावित होने वालों की संख्या बढ़कर 8 हो गई है।
केंद्रीय परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में कहा कि मायापुरी में जिस उपकरण से रेडियोधर्मी विकिरण हुआ वह बायोमेडिकल कचरा नहीं, बल्कि मेडिकल उपकरण था। उस उपकरण में गामा चैंबर था। उपकरण पुराना भी था और रजिस्टर्ड भी नहीं था। उन्होंने कहा कि एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा रहा है कि यह विदेश से आया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा का कहना है कि मायापुरी में रेडिएशन की घटना से साबित हो गया कि हम ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं।
मायापुरी की घटना से पहले भी कोबाल्ट-60 से रेडिएशन का एक ऐसा मामला सामाने आया था जिसने भारत में कबाड़ की रिसाइक्लिंग की पोल खोल दी थी। वर्ष 2008 में फ्रांस ने भारत में बनी लिफ्ट के स्विच यह कहते हुए वापस भेज दिए कि इसमें रेडियोधर्मी तत्व कोबाल्ट-60 पाया गया है। बाद में मालूम चला कि ये स्विच पुणे की एक कंपनी ने विदेशों से मंगाए गए कबाड़ को गलाकर बनाए थे। वर्ष 2003 के बाद से अमेरिका ने तो अपने यहां भारत जैसे देशों से आने वाले नए सामान का भी रेडियोधर्मी परीक्षण करना शुरू कर दिया है। भारत से गए इस्पात के 67 कंटेनरों को इस प्रकार के प्रदूषण के चलते वापस किया जा चुका है।
बेबस पुलिस और अस्पताल
मायापुरी की घटना ने उजागर कर दिया है कि भारत की पुलिस रेडिएशन के खतरों को भांपने में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है। यही हाल अस्पतालों का है। दिल्ली के अधिकांश अस्पतालों को यह समझने में खासा वक्त लग गया कि मायापुरी का मामला रेडिएशन से जुड़ा है। प्रमुख बंदरगाहों तक पर अभी रेडिएशन मॉनिटर नहीं लगे हैं। मायापुरी में कोबाल्ट-60 से उपन्न रेडिएशन ने एक तरफ पूरी दिल्ली में कोहराम मचा रखा है तो दूसरी तरफ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टर रेडिएशन के प्रभाव से अनभिज्ञ हैं। एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डा. रणदीप गुलेरिया के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया है। डा. गुलेरिया ने बताया कि एक्सरे और सीटी स्कैन करने वाले ज्यादातर डॉक्टर विकिरण के संपर्क में होने वाले खतरनाक प्रभावों से अनजान हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान के 100 सीनियर और जूनियर रेजीडेंट डाक्टरों के बीच अध्ययन के दौरान पाया गया कि 70 से 80 प्रतिशत डॉक्टर विकिरण के खतरनाक प्रभावों से अनजान हैं। दिल्ली के किसी भी अस्पताल के पास रेडिएशन की चपेट में आए मरीज के उपचार के लिए इंतजाम नहीं है।
रेडियोसक्रियता और परमाणु कचरा
प्रकृति में कुछ तत्व अस्थायी होते हैं जिनके परमाणु टूटते और बिखरते रहते हैं और साथ ही इस प्रक्रिया में विकिरण यानी रेडिएशन के रूप में ऊर्जा निकालते हैं। इस गुण को रेडियोधर्मिता कहा जाता है। किसी तत्व के इस प्रकार विघटित होने और विकिरण निकालने के गुण को उनकी अद्र्घ-आयु के तौर पर पहचाना जाता है। अद्र्घ-आयु वह समय है जिमसे कोई रेडियोधर्मी तत्व विघटित होकर आधी मात्रा में रह जाता है। यह अवधि कुछ सेकेंडों से लेकर लाखों वर्ष तक हो सकती है। रेडियोधर्मी तत्वों के विकिरण संबंधी गुणों के बूते ही परमाणु तकनीक का इस्तेमाल ऊर्जा के उत्पादन से लेकर चिकित्सा, खाद्य संरक्षण और रक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है। लेकिन इस तरह का इस्तेमाल अपने साथ रेडियोधर्मी कचरे का खतरा लेकर आया है। रेडियोधर्मी गुणों के चलते इस तरह के कबाड़ के खतरे सामान्य कबाड़ के खतरों से बहुत ज्यादा हैं।
रेडिएशन के खतरे
विकिरण से मानव और पर्यावरण को होने वाला नुकसान उसके संपर्क में आए तत्व की मात्रा और उसकी रेडियोधर्मी प्रकृति पर निर्भर करता है। मानव शरीर पर विकिरण का प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है। पहला- जिसमें असर सिर्फ त्वाचा और रक्त पर पड़ता है और जिसके अत्याधिक प्रभाव से कैंसर भी हो सकता है। दूसरे प्रकार का असर अनुवांशिक होता है, जिसमें विकिरण का असर आने वाली कई पीढिय़ों तक जा सकता है। दूसरे विश्व युद्घ में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम से मारे गए लाखों लोग ऐसी ही घातक विकिरण का शिकार हुए और जो बच गए ,उनके दुष्प्रभाव भी कई पीढिय़ों तक चलते रहे।
बाहरी तौर पर प्रभाव पडऩे से त्वचा के जलने की समस्या होती है, ज्यादा रेडिएशन की चपेट में आने से कमजोरी और यहां तक कि मृत्यु होने की संभावना होती है। रेडियोधर्मी विकिरण से लिवर, किडनी और हड्डियों के ऊतकों द्वारा अवशोषण करने से कैंसर होने की संभावना रहती है।
रेडिएशन के परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं, इसका अंदाजा 1983 में मेक्सिको में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है। वहां एक बेकार रेडियोथेरपी मशीन से लीक होने वाला कोबाल्ट-60 करीब 600 टन स्टील में जा पहुंचा। इस स्टील का इस्तेमाल मेक्सिको, कनाडा और अमेरिका के 23 राज्यों में हुआ। नतीजा यह निकला कि रेडियोधर्मी प्रदूषण को रोकने के लिए मेक्सिको के करीब 100 मकान नष्ट करने पड़े।
अमेरिका के परमाणु नियमन आयोग को हर साल रेडियोऐक्टिव पदार्थों के गायब होने, चुराए जाने या लावारिस छोड़े जाने की दो सौ रिपोर्टें मिलती हैं। कड़े नियम-कानूनों के बावजूद वहां इतने बड़े पैमाने पर रेडियोऐक्टिव पदार्थों का गुम होना सचमुच आश्चर्यजनक है। इन सब स्थितियों के मद्देनजर आंतकी गतिविधियों के लिए रेडियोधर्मी पदार्थों की चोरी-तस्करी अंतराष्टï्रीय चिंता का विषय बन चुका है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रतीक कुमार के अनुसार जब चिकित्सा में विकिरण का इस्तेमाल होता है तो यह मात्रा एक मिली सीवर्ट से बहुत कम रखी जाती है। रोगी को उपचार के लिए सिर्फ एक माइक्रो सीवर्ट रेडिएशन दिया जाता है जो बेहद मामूली होता है लेकिन किसी हादसे के दौरान वही मात्रा अनियंत्रित हो सकती है।
अंतर्राष्टï्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के मुताबिक, दुनिया के 110 से अधिक देश ऐसे हैं, जिनके पास रेडियोऐक्टिव पदार्थों को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम साधन भी नहीं हैं।
प्रमुख हादसे
1986- उक्रेन (तत्कालीन सोवियत संघ)में नाभिकीय रिएक्टर के फटने से तकरीबन छह लाख लोग रेडिएशन के प्रभाव में आ गए थे। करीब 4 हजार लोग कैंसर के चलते मौत के मुंह में गए और साढ़े तीन लाख लोगों को अपना घर छोडऩा पड़ा।
1992- चीन में गायब हुए कोबाल्ट-60 के रेडिएशन से तीन लोगों की मौत
1996- कोस्टारिका में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 7 लोगों की मौत
2000- थाईलैंड में कोबाल्ट 60 के रेडिएशन से तीन लोगों की मृत्यु
2000- पनामा में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 5 लोगों की मौत
2009- भारत में कैगा परमाणु बिजली संयंत्र में रेडियोएक्टिव पदार्थ पानी में मिला दिए जाने की घटना के बाद वहां के 50 कर्मचारी बीमार पड़ गए थे।
बॉक्स: जरूरी है परमाणु हादसों की जवाबदेही
विदेश से आने वाला कबड़ा ही रेडियोधर्मी कचरे का अकेला स्रोत नहीं है। इस तरह के हादसे की बड़ी आंशका विद्युत उत्पादन के लिए चल रहे परमाणु रिएक्टरों से भी है। इसके अलावा रेडियोधर्मी पदार्थों के खनन और शोधन की लंबी प्रक्रिया में भी कई जगह हादसे होने की आंशका रहती है। वर्तमान में भारत में विद्युत उत्पादन के लिए कुल 17 परमाणु रिएक्टर चल रहे हैं जबकि 6 निर्माण की प्रक्रिया में हैं। अमेरिका से परमाणु समझौता होने के बाद भारत की योजना वर्ष 2020 तक अपनी परमाणु उर्जा उत्पादन क्षमता को चार हजार मेगावाट से बढ़ाकर 20 हजार मेगावट करने की है। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार नए परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की दिशा में तेजी से बढ़ेगी और उसी अनुपात में रेडियोधर्मी हादसों का खतरा भी बढ़ेगा। इसे देखते हुए ही सरकार पर परमाणु हादसों की स्थिति में जवाबदेही तय करने और पीडि़तों को मुआवजा देने संबंधी प्रावधान करने का दबाव भी बढ़ा है। लेकिन सरकार परमाणु हादसों के जन दायित्व से जुड़ा जो कानून लाना चाहती है, उसके प्रावधानों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस विधेयक के प्रावधानों के खिलाफ अभियान चला रही संस्था ग्रीनपीस की करुणा रैना का कहना है,'जिस तरह का रेडिएशन दिल्ली के मायापुरी इलाके में पैदा हुआ और लोगों पर जो असर पड़ा, किसी परमाणु रिएक्टर में हादसे की स्थिति में वह इससे कई गुना ज्यादा भीषण हो सकता है।Ó रैना के मुताबिक, प्रस्तावित कानून में सारी जवाबदेही परमाणु रिएक्टर चलाने वाले पर डाली जा रही है जबकि इसके लिए तकनीक मुहैया कराने वालों को जवाबदेही से मुक्त रखा गया है। इसके अलावा इस विधेयक में मुआवजे की रकम भी यूरोप और अमेरिका में इस तरह के कानूनों के मुकाबले काफी कम है। जबकि भारत में जनसंख्या घनत्व ज्यादा होने की वजह से दुर्घटना होने की सूरत में उसका असर कहीं ज्यादा भयावह होगा।
शांति एवं परमाणु निशस्त्रीकरण अभियान से जुड़े अनिल चौधरी कहते हैं, 'परमाणु हादसों की जवाबदेही कम करके सरकार विदेशी कंपनियों खासकर अमेरिका की परमाणु क्षेत्र की कंपनियों के लिए भारत में जमीन तैयार कर रही है।Ó
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें